पीएम मोदी के गिफ्ट से ट्रेंड हुई पारले मेलोडी, जानिए कैसे शुरू हुआ था मेलोडी टॉफी सफर
पारले कंपनी सिर्फ बिस्किट ही नहीं बल्कि और भी कई बेहतरीन प्रोडक्ट्स का निर्माण करती है। इन्हीं प्रोडक्ट्स में से एक मशहूर मेलोडी टॉफी इस समय सबसे ज्यादा चर्चा में है। ऐसा इसलिए क्योंकि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस टॉफी का पैकेट गिफ्ट किया है।
पीएम मोदी ने यह मीठी चॉकलेटी टॉफी इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को तोहफे में दी है। पीएम मेलोनी ने सोशल मीडिया पर इसका वीडियो शेयर करके पीएम मोदी को थैंक्यू कहा। इसके बाद से ही मेलोडी टॉफी एक बार फिर सोशल मीडिया पर ट्रेंड करने लगी।
Melody टॉफी ने बाजार दोनों पर मचाई धूम
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इटली दौरे पर गए और उन्होंने इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी को Parle की Melody कैंडी का एक पैकेट गिफ्ट में दिया। मेलोनी ने इस गिफ्ट की तारीफ की और धन्यवाद कहा। उनका यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया।
भारत में भी भारतीय कंज्यूमर्स Melody टॉफी खरीदने के लिए क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर उमड़ पड़े। देखते ही देखते दुकानों से यह टॉफी गायब हो गई। ब्लिंकइट, Zepto और इंस्टामार्ट जैसे प्लेटफॉर्म पर भी मेलोडी टॉफी फिलहाल स्टॉक से बाहर है। एक रुपये से कम कीमत वाली इस टॉफी के लिए खासी होड़ लग गई।
चलिए आज जानते हैं मेलोडी टॉफी के सफर के बारे में....
क्या है मेलोडी टॉफी का सफर
मेलोडी बनाने वाली कंपनी पारले का गौरवशाली इतिहास हमारे देश की आजादी से भी पुराना है। इतने लंबे समय से यह स्वदेशी कंपनी भारतीय बाजार में अपना मजबूत दबदबा बनाए हुए है। भले ही आज पारले की सबसे बड़ी पहचान उसके मशहूर पारले-जी बिस्किट से होती है।
लेकिन आपको जानकर हैरानी होगी कि इस कंपनी का सफर असल में कैंडी से शुरू हुआ था। मेलोडी टॉफी का वो विज्ञापन बहुत पॉपुलर हुआ, जिसमें ग्राहकों से ही सवाल पूछा गया था। विज्ञापन का वह मशहूर सवाल था कि आखिर यह मेलोडी इतनी चॉकलेटी क्यों है?
कब लॉन्च हुई थी मेलोडी चॉकलेटी टॉफी
पारले कंपनी ने इस टॉफी को साल 1983 में बाजार में लॉन्च किया था। उस समय कैडबरी एक्लेयर्स समेत कई ब्रांड बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना रहे थे। तभी पारले ने मेलोडी को लॉन्च करके इन विदेशी कंपनियों को बहुत तगड़ी टक्कर दी।
मेलोडी असल में महज एक टॉफी नहीं बल्कि 80 के दशक का बड़ा इमोशन है। 80 के दशक में यह टॉफी अपनी कीमत की वजह से आम बच्चों से दूर थी। बहुत ज्यादा महंगी होने के कारण आम बच्चे इसे रोज नहीं खरीद पाते थे।
जादुई टैगलाइन, फिल्म छिछोरे में भी इस्तेमाल
इस सुपरहिट विज्ञापन के अंत में लोगों को एक बहुत ही अधूरा सा जवाब दिया गया। विज्ञापन में कहा गया था कि मेलोडी खाओ.. खुद जान जाओ।
कंपनी का यह अनोखा मार्केटिंग फॉर्मूला बाजार में पूरी तरह से सुपरहिट साबित हुआ था। लोगों के मन में इसके स्वाद को लेकर हमेशा एक बड़ी जिज्ञासा बनी रहती थी। इसी वजह से बच्चे और बड़े सभी ने इस चॉकलेटी टॉफी को खूब खरीदा था। मेलोडी की यह टैगलाइन दशकों बाद भी सबसे यादगार विज्ञापनों में शामिल की जाती है।
इस क्लासिक डायलॉग का इस्तेमाल सुशांत सिंह राजपूत की फिल्म छिछोरे में भी किया गया था। आज बाजार में भले ही सैकड़ों तरह की नई चॉकलेट और टॉफियां मौजूद हैं। लेकिन पारले की मेलोडी अपनी पुरानी यादों की वजह से दिलों में राज कर रही है।
दूसरी टॉफियों से कैसे अलग है मेलोडी का स्वाद
पारले का मुख्य मकसद था कि कम कीमत में बच्चों को असली चॉकलेट का मजा मिले। आज के समय में यह चॉकलेटी टॉफी खुदरा बाजार में सिर्फ 1 रुपए में मिलती है। ऑनलाइन बाजार में मेलोडी का 176 ग्राम का पैकेट 49 रुपए में बेचा जाता है।
गोल्डन और ब्राउन रैपर वाली इस टॉफी का स्वाद मुंह में जाते ही घुल जाता है। मेलोडी का अनोखा डबल लेयर स्वाद ही इस टॉफी को दूसरों से बिल्कुल अलग बनाता है। इसे बहुत ही खास तरीके से दो स्वादिष्ट परतों में तैयार किया गया है।
इसकी बाहरी परत में कैरेमल की एक बहुत ही मुलायम और मीठी कोटिंग होती है। इसके साथ ही टॉफी की अंदरूनी परत में चॉकलेट की थिक फीलिंग भरी होती है। इस टॉफी को चबाते ही कैरेमल और चॉकलेट का मुंह में घुलने वाला स्वाद मिलता है।
मात्र 12 लोगों के साथ साल 1929 में हुई थी पारले
इस कंपनी की स्थापना गुजरात के वलसाड के रहने वाले मोहनलाल दयाल चौहान ने की थी। उन्होंने अपने परिवार के 12 लोगों के साथ मिलकर साल 1929 में शुरुआत की थी। जानकारी के अनुसार मोहनलाल चौहान का पुराना पारिवारिक पेशा मुख्य रूप से सिलाई-कढ़ाई का था। लेकिन जीवन में कुछ बड़ा करने का सपना लेकर वे मुंबई शहर आ गए थे। उस समय भारत देश में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की बड़ी जंग चल रही थी। पूरे देश में महात्मा गांधी के नेतृत्व में स्वदेशी आंदोलन का जोर चल रहा था।
उसी दौर में मोहनलाल दयाल ने मुंबई के विले पारले में फैक्टरी शुरू की थी। उन्होंने वहां एक पुरानी फैक्टरी खरीदकर अपनी पहली कन्फेक्शनरी यूनिट की स्थापना की थी। इस फैक्टरी में बनने वाला सबसे पहला प्रोडक्ट असल में एक 'ऑरेंज कैंडी' ही था। इस स्वादिष्ट ऑरेंज कैंडी को बाद में बाजार में पारले कैंडी नाम दिया गया था। आज देश के मार्ट और मॉल में हर जगह यह टॉफी आसानी से मिल जाती है।
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