पीएम मोदी ही नहीं, इंदिरा गांधी ने भी रोकी सोने की खरीद! जानें क्या हैै इसका सच?
भारत में सोना (Gold) महज एक धातु नहीं, बल्कि एक अटूट भावना और सुरक्षा का प्रतीक है। इसके बावजूद, इतिहास गवाह है कि जब-जब देश की अर्थव्यवस्था पर संकट के बादल मंडराए हैं, तब-तब सत्ता की बागडोर संभालने वालों ने भारतीयों के इस स्वर्ण-मोह को कम करने की कोशिश की है।
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पश्चिम एशिया के तनाव और गहराते वैश्विक संकट के बीच देशवासियों से कम से कम एक साल तक सोना न खरीदने की अपील की है।
हालांकि, यह पहली बार नहीं है जब दिल्ली की कुर्सी से ऐसी आवाज उठी हो। आज से दशकों पहले इंदिरा गांधी ने भी यही रास्ता चुना था। आइए, इतिहास के पन्नों और अर्थशास्त्र के आंकड़ों के जरिए समझते हैं कि आखिर सरकारें हमें सोना खरीदने से क्यों रोकती हैं। आखिर क्या है इसकी सच्चाई...
विदेशी मुद्रा भंडार पर पीला संकट
सोना खरीदने का सीधा कनेक्शन हमारे देश की तिजोरी यानी विदेशी मुद्रा भंडार से होता है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्वर्ण उपभोक्ता है। वहीं, विडंबना यह है कि हम अपनी जरूरत का अधिकांश सोना विदेशों से आयात करते हैं।
इस सोने की कीमत हमें डॉलर में चुकानी पड़ती है। वित्त वर्ष 2025-26 के आंकड़े बताते हैं कि भारत ने करीब 72 बिलियन डॉलर का सोना आयात किया, जो पिछले साल के मुकाबले 24% ज्यादा है। देश की कुल आयात सूची में अकेले सोने की हिस्सेदारी 10% है।
जब हम डॉलर बाहर भेजते हैं, तो हमारा चालू खाता घाटा (Current Account Deficit - CAD) बढ़ जाता है। आईएमएफ (IMF) का अनुमान है कि 2026 में यह घाटा 84.5 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकता है।
क्या इंदिरा गांधी ने भी रोकी सोने की खरीद?
सोशल मीडिया पर द हिंदू की एक पेपर कटिंग वायरल हो रही है। इसके मुताबिक, 06 जून, 1967 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश की डगमगाती अर्थव्यवस्था को संभालने के लिए राष्ट्रीय अनुशासन का नारा दिया था। उस वक्त भारत भीषण विदेशी मुद्रा संकट से जूझ रहा था।
इंदिरा गांधी ने सार्वजनिक रूप से नागरिकों से किसी भी रूप में सोना न खरीदने का आग्रह किया था। डॉलर बचाने के लिए उस समय गोल्ड कंट्रोल ऑर्डर्स जैसे कड़े कदम भी उठाए गए थे ताकि लोग निजी तौर पर सोना जमा न कर सकें।
अब जानें इंदिरा गांधी के अपील की क्या है सच्चाई?
द हिंदू ने वायरल हो रही इंदिरा गांधी की अपील वाली पेपर कटिंग से इनकार कर दिया है। द हिंदू ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर ट्वीट कर लिखा है कि एक फोटो सोशल मीडिया पर चल रही है। इसमें 6 जून, 1967 के द हिंदू का फ्रंट पेज दिखाया गया है। इसे डिजिटल रूप से बदला गया है। हम यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह हमारे जरिए प्रामाणिक पृष्ठ नहीं है। द हिंदू ने पाठकों से अपील है कि वे इसे साझा करने से पहले इसकी सत्यता जांच लें।
मेरी इच्छा है कि सोना न खरीदें- पी. चिदंबरम
समय बदला, लेकिन चुनौती वही रही। 14 जून 2013 को तत्कालीन वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने बेबाकी से कहा था कि यदि देशवासी मेरी एक इच्छा पूरी कर सकें, तो वो ये है कि वे सोना न खरीदें। उस समय CAD रिकॉर्ड 6.7% पर था और रुपया डॉलर के मुकाबले दम तोड़ रहा था। सरकार ने तब आयात शुल्क बढ़ाकर 8% कर दिया था।
अरुण जेटली का डिजिटल गोल्ड
वहीं, 2015 में अरुण जेटली ने एक अलग रणनीति अपनाई। उन्होंने सोने को तिजोरी से निकालकर अर्थव्यवस्था में लाने के लिए गोल्ड मोनेटाइजेशन स्कीम और सॉवरेन गोल्ड बॉन्ड पेश किए था। मकसद साफ था- लोग फिजिकल सोना खरीदने के बजाय कागजों या डिजिटल रूप में निवेश करें ताकि विदेशों से सोना न मंगाना पड़े।
अब पीएम मोदी ने भी की अपील
10 मई 2026 की शाम, प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी ने एक बार फिर भारतीयों से आर्थिक देशभक्ति का आह्वान किया है। पश्चिम एशिया में युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतें 126 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं। भारत अपनी जरूरत का 88% तेल आयात करता है। अप्रैल 2026 में हमारा विदेशी मुद्रा भंडार गिरकर 691 बिलियन डॉलर रह गया है।
पीएम का गणित सीधा है कि यदि देश एक साल सोना न खरीदे, तो 72 बिलियन डॉलर (करीब 6.84 लाख करोड़ रुपए) बचेंगे। यह बड़ी राशि डॉलर के मुकाबले रुपए को मजबूती देगी। साथ ही, तेल की बढ़ती कीमतों के बीच देश को दिवालिया होने से बचाएगी।
तिजोरी में बंद सोना: अर्थव्यवस्था के लिए फ्रीज पैसा
आर्थिक विशेषज्ञ मानते हैं कि सोना खरीदना अर्थव्यवस्था के पहिये को धीमा कर देता है। यदि आप एक लाख रुपए बैंक में रखते हैं, तो वह किसी को लोन के रूप में मिलता है। इससे घर बनते हैं या फैक्ट्रियां चलती हैं।
वहीं, सोने के रूप में तिजोरी में पड़ा पैसा डेड इन्वेस्टमेंट है। वह न रोजगार पैदा करता है और न ही जीडीपी (GDP) में योगदान देता है। भारतीय घरों में आज लगभग 50 हजार टन सोना जमा है। इसकी कीमत 10 ट्रिलियन डॉलर है। यह दुनिया के टॉप-10 केंद्रीय बैंकों के कुल भंडार से भी ज्यादा है।
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