महास्नान के बाद भगवान जगन्नाथ को आया बुखार, अब 15 दिन एकांतवास में गए प्रभु
Puri Jagannath Dham: ओडिशा का विश्व प्रसिद्ध पुरी जगन्नाथ धाम अपनी बेहद अनोखी और चमत्कारी परंपराओं के लिए पूरी दुनिया में जाना जाता है। इस समय पावन श्रीमंदिर परिसर के भीतर एक बहुत ही रहस्यमयी और गहरी आध्यात्मिक खामोशी पसरी हुई है।
एक तरफ जहां आगामी वार्षिक रथयात्रा को लेकर मंदिर के बाहर तैयारियां बहुत ही जोरों-शोरों से चल रही हैं। वहीं दूसरी तरफ मुख्य मंदिर का गर्भगृह पूरी तरह से मौन हो चुका है।
अब आगामी 15 दिनों तक मंदिर के वातावरण में किसी भी तरह का कोई शोरगुल या वाद्य यंत्र सुनाई नहीं देने वाला। श्रीमंदिर में रोज सुबह और शाम को होने वाला पावन शंखनाद भी अब पूरी तरह बंद रहेगा।
पूजा-आरती के समय बजने वाले बड़े घंटे और घड़ियां भी शांत रहेगी। देश-विदेश से आने वाले भक्तों को भी अगले दो हफ्तों तक अपने आराध्य भगवान जगन्नाथ के सार्वजनिक दर्शन नहीं मिल सकेंगे।
क्या है ये रहस्यमयी अनासरा विधान
इस पूरी खामोशी के पीछे एक बहुत ही प्राचीन और पवित्र धार्मिक विधान है। इस विशेष धार्मिक परंपरा को मंदिर की भाषा में अनासरा विधान कहा जाता है। अनासरा का सीधा और सरल अर्थ होता है भगवान का एकांत में रहना।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इस समय भगवान जगन्नाथ बीमार पड़ जाते हैं। उनके साथ उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भी बीमार होती हैं। यह एकांतवास भाई-बहनों के स्वास्थ्य लाभ और आराम के लिए होता है। इसीलिए मंदिर के वातावरण को पूरी तरह शांत और मौन रखा जाता है।
ज्यादा आम खाने और नहाने से हुए बीमार
भगवान के बीमार होने के पीछे भी एक बहुत ही दिलचस्प कहानी है। ज्येष्ठा एकादशी के बाद से ही भगवान को स्वादिष्ट आम का भोग लगता है। देवताओं को बहुत चाव से रसीले आम का रस पिलाया जाता है। इसके बाद ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन एक बड़ा महास्नान उत्सव आयोजित होता है।
इस दिन तीनों पवित्र मूर्तियों को गर्भगृह से बाहर आंगन में लाते हैं। वहां उन्हें 108 कलशों में भरे सुगंधित जल से नहलाया जाता है। तेज गर्मी में इतने पानी से नहाने के कारण उन्हें बुखार आ जाता है।
इस तरह बंटा है 108 कलश का जल
महास्नान के दौरान हर देवता के लिए पानी की संख्या तय होती है। भगवान जगन्नाथ को सबसे ज्यादा 35 घड़ों के पानी से नहलाया जाता है। भाई बलभद्र महाराज को स्नान कराने के लिए 33 घड़े पानी चाहिए। बहन सुभद्रा देवी को 22 घड़ों के सुगंधित जल से स्नान कराते हैं।
बाकी बचे 18 घड़ों से सुदर्शन चक्र और गरुड़ जी को नहलाते हैं। इतने भारी स्नान के कारण ही इस दिन को स्नान पूर्णिमा कहते हैं। नहाने के बाद भगवान के शरीर का तापमान बहुत ज्यादा बढ़ जाता है।
राजवैद्य की देखरेख में चलेगा विशेष इलाज
बीमार होने के बाद देवताओं को तुरंत एक गुप्त कमरे में ले जाते हैं। वहां दइतापति सेवक बहुत ही लगन से भगवान की सेवा-सुश्रूषा करते हैं। इस दौरान राजवैद्य की देखरेख में भगवान का आयुर्वेदिक उपचार किया जाता है।
देवताओं को ठीक करने के लिए खास जड़ी-बूटियों का काढ़ा दिया जाता है। दवा के रूप में मुख्य रूप से नीम की पत्तियों का चूर्ण मिलता है। साथ ही नीम की छाल का चूर्ण भी भगवान को खिलाया जाता है। कमरे में ठंडक बनाए रखने के लिए चंदन का गाढ़ा लेप लगाते हैं।
फुलुरी तेल से होती है मालिश की क्रिया
एकांतवास के दौरान भगवान को कोई भी भारी छप्पन भोग नहीं लगाया जाता। उन्हें केवल सादा भोजन और जड़ी-बूटियों का रस ही दिया जाता है। इस इलाज के दौरान भगवान का कोई नया या भारी शृंगार नहीं होता।
बीमारी के समय उन्हें विशेष रूप से तैयार सुगंधित फुलुरी तेल लगाते हैं। यह तेल कई तरह के फूलों और इत्र को मिलाकर बनाया जाता है। इस तेल की मालिश से भगवान का बदन दर्द दूर होता है। यह पूरी प्रक्रिया बहुत ही गुप्त तरीके से संपन्न की जाती है।
जब भगवान जगन्नाथ बने गजानन नाथ
स्नान पूर्णिमा के दिन भगवान का एक बहुत ही सुंदर रूप दिखता है। स्नान के बाद मूर्तियों को मलमल के सूती कपड़ों से पोंछा जाता है। फिर उन्हें बड़े-बड़े कपड़ों की मदद से अच्छी तरह लपेटा जाता है। कपड़े लपेटने के बाद भगवान का आकार बिल्कुल हाथी जैसा दिखने लगता है।
इस बेहद सुंदर और चमत्कारी शृंगार को गजाबेशा या गजवेश कहते हैं। इस खास रूप में भगवान जगन्नाथ अपने भक्तों को गणेश रूप में दिखते हैं। गणपति रूप के दर्शन के बाद ही भगवान सीधे एकांतवास में जाते हैं।
गणपति भट्ट की अटूट भक्ति की लोककथा
इस गजवेश को शुरू करने के पीछे 16वीं शताब्दी की कहानी है। महाराष्ट्र के एक गांव में गणपति भट्ट नाम के गणेश भक्त रहते थे। वे हर जगह सिर्फ अपने ईष्ट देव गणेश जी को ढूंढते थे।
एक बार वे यात्रा करते हुए ओडिशा के पुरी धाम पहुंच गए। वहां उन्हें पता चला कि जगन्नाथ मंदिर में गणेश जी नहीं हैं। इससे वे बहुत दुखी हुए और बिना दर्शन किए ही लौटने लगे। उन्होंने पुरी का प्रसिद्ध महाप्रसाद खाने से भी साफ मना कर दिया।
ब्राह्मण के वेश में खुद आए भगवान जगन्नाथ
रास्ते में निराश गणपति भट्ट को एक अनजान ब्राह्मण युवक मिला। उस युवक ने भट्ट जी से उनकी उदासी का कारण पूछा। भट्ट जी ने कहा कि यहां मेरे गणेश जी का मंदिर नहीं है।
ब्राह्मण ने हंसकर कहा कि आप एक बार मंदिर जाकर तो देखिए। शायद आपके गणेश जी आपको वहीं जगन्नाथ के रूप में मिल जाएं। भट्ट जी मान गए और ठीक स्नान पूर्णिमा के दिन मंदिर पहुंचे। वहां भगवान का सूती कपड़ों से सूंड जैसा गजवेश बनाया गया था।
ठीक होने के बाद शुरू होगी भव्य रथयात्रा
गजवेश देखकर गणपति भट्ट खुशी से रो पड़े और उन्हें दर्शन मिल गए। जब वे पीछे मुड़े तो वह ब्राह्मण युवक वहां से गायब था। माना जाता है कि खुद भगवान जगन्नाथ ही उनका भ्रम दूर करने आए थे।
अब 15 दिनों के इस लंबे एकांतवास के बाद भगवान जगन्नाथ स्वामी ठीक होंगे। जिस दिन भगवान पूरी तरह स्वस्थ होंगे, वहां नैनासार उत्सव मनेगा। उस दिन भगवान का फिर से एक सुंदर नया शृंगार किया जाएगा। इसके दो दिन बाद ही प्रसिद्ध भगवान जगन्नाथ रथयात्रा (Jagannath Puri Temple) शुरू होगी।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। Bhagwan Jagannath
FAQ
- पुरी जगन्नाथ मंदिर में अनासरा विधान क्या होता है?
स्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा जी 15 दिनों के लिए एकांतवास में चले जाते हैं। इसे अनासरा विधान कहते हैं। मान्यता है कि इस दौरान भगवान बीमार रहते हैं और उनका इलाज चलता है। - एकांतवास के दौरान जगन्नाथ जी को दवा में क्या दिया जाता है?
बीमार भगवान जगन्नाथ को ठीक करने के लिए राजवैद्य की देखरेख में नीम की पत्तियों और छाल का चूर्ण दिया जाता है। साथ ही उनके शरीर पर चंदन और विशेष फुलुरी तेल का लेप लगाया जाता है। - जगन्नाथ जी के 'गजवेश' या गजानन रूप की क्या मान्यता है?
ज्येष्ठ पूर्णिमा पर महास्नान के बाद भगवान को सूती कपड़ों से हाथी के आकार में सजाया जाता है। इसे गजवेश कहते हैं। 16वीं शताब्दी में गणेश भक्त गणपति भट्ट को दर्शन देने के लिए प्रभु ने यह रूप धरा था।
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