राज्यसभा सांसद रंजन गोगोई का कार्यकाल समाप्त: 6 साल में न पूछा कोई सवाल, केवल एक बहस में लिया हिस्सा
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (Ranjan Gogoi) का राज्यसभा में नामित सदस्य के रूप में छह वर्ष का कार्यकाल समाप्त हो गया है। सोमवार को जब सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन (C.P. Radhakrishnan) ने उन्हें औपचारिक विदाई दी और उनके योगदान की सराहना की।
सभापति ने कहा कि एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता के रूप में गोगोई ने सदन में अपने कानूनी अनुभव और समझ के आधार पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए। हालांकि उनके पूरे कार्यकाल की समीक्षा करने पर यह भी सामने आया कि राज्यसभा में उनकी सक्रियता (Rajya Sabha Participation) सीमित रही।
रंजन गोगोई राज्यसभा नियुक्ति
सेवानिवृत्ति के चार महीने बाद मिला नामांकन
पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई (Former Chief Justice of India) को 16 मार्च 2020 को केंद्र सरकार ने राज्यसभा के लिए नामित किया था। यह नियुक्ति उनके CJI पद से सेवानिवृत्त होने के मात्र चार महीने बाद हुई थी।
इस निर्णय ने उस समय देश में व्यापक राजनीतिक और कानूनी बहस को जन्म दिया था। कई आलोचकों ने इसे “क्विड प्रो क्वो” (Quid Pro Quo) का मामला बताया, यानी सरकार के पक्ष में दिए गए फैसलों के बदले यह पद दिया गया।
हालांकि, उस समय बार काउंसिल ऑफ इंडिया (Bar Council of India) के अध्यक्ष ने इस नियुक्ति का स्वागत करते हुए कहा था कि गोगोई न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच एक सेतु (Bridge between Judiciary and Executive) का काम कर सकते हैं।
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छह साल में केवल एक बहस में हिस्सा
पीआरएस (PRS Legislative Research) के आंकड़ों के अनुसार रंजन गोगोई की राज्यसभा उपस्थिति (Rajya Sabha Attendance) लगभग 53 प्रतिशत रही। राज्यसभा की आधिकारिक वेबसाइट के आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि छह वर्षों के कार्यकाल के दौरान उन्होंने केवल एक बार बहस में भाग लिया। यह बहस अगस्त 2023 में दिल्ली सेवा विधेयक (Delhi Services Bill) से संबंधित थी।
इस दौरान उन्होंने बेसिक स्ट्रक्चर सिद्धांत (Basic Structure Doctrine) की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इस सिद्धांत की न्यायशास्त्रीय आधारशिला विवादास्पद है और इसे लेकर अलग-अलग मत हैं। यह टिप्पणी इसलिए भी चर्चा में रही क्योंकि अपने ही एक पुराने फैसले में (जब वे मुख्य न्यायाधीश थे) उन्होंने रोजर मैथ्यू केस (Roger Mathew Case) में इसी सिद्धांत का समर्थन किया था।
पहले दिए फैसले से अलग बयान
रोजर मैथ्यू मामले में गोगोई की अध्यक्षता वाली पीठ ने ट्रिब्यूनल नियम 2017 (Tribunal Rules 2017) को रद्द कर दिया था। उस समय अदालत ने कहा था कि यह नियम न्यायिक स्वतंत्रता (Judicial Independence) को कमजोर करते हैं। लेकिन राज्यसभा में दिए गए उनके बयान ने इस मुद्दे पर नई बहस को जन्म दिया क्योंकि यह उनके पुराने निर्णय से अलग प्रतीत हुआ।
रंजन गोगोई का राज्यसभा प्रदर्शन
- कुल कार्यकाल: 6 वर्ष
- उपस्थिति: लगभग 53%
- बहस में भागीदारी: 1 बार
- पूछे गए प्रश्न: 0
- निजी सदस्य विधेयक: 0
कई महत्वपूर्ण बहसों से दूरी
गोगोई के कार्यकाल के दौरान संसद में कई महत्वपूर्ण विधेयकों और मुद्दों पर चर्चा हुई, जिनमें शामिल हैं:
- कृषि कानून (Farm Laws)
- नए आपराधिक कानून (New Criminal Laws)
- ट्रिब्यूनल सुधार अधिनियम (Tribunal Reforms Act)
- वक्फ संशोधन अधिनियम (Waqf Amendment Bill)
- महिला आरक्षण विधेयक (Women Reservation Bill)
इन सभी मुद्दों पर संसद में व्यापक बहस हुई, लेकिन रंजन गोगोई ने इनमें भाग नहीं लिया। अपने पूरे छह साल के कार्यकाल में रंजन गोगोई ने एक भी प्रश्न नहीं पूछा, कोई निजी सदस्य विधेयक पेश नहीं किया। यह तथ्य उनके संसदीय प्रदर्शन को लेकर चर्चा का विषय बना रहा।
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कम उपस्थिति पर गोगोई का जवाब
दिसंबर 2021 में एक साक्षात्कार के दौरान पत्रकार श्रीनिवासन जैन (Srinivasan Jain) ने उनसे उनकी कम उपस्थिति के बारे में सवाल पूछा था। इस पर गोगोई ने कहा कि कोविड महामारी के दौरान सदन की बैठने की व्यवस्था उन्हें सहज नहीं लगती थी।
उन्होंने कहा:
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वे किसी राजनीतिक दल से जुड़े नहीं हैं और किसी पार्टी के व्हिप (Party Whip) से बंधे नहीं हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि रंजन गोगोई का राज्यसभा कार्यकाल कई कारणों से चर्चा में रहा। एक ओर उनकी नियुक्ति को लेकर विवाद हुआ। वहीं, दूसरी ओर उनकी सीमित सक्रियता ने भी कई सवाल खड़े किए। हालांकि समर्थकों का कहना है कि गोगोई जैसे विधिवेत्ता का संसद में होना अपने आप में महत्वपूर्ण है, भले ही वे नियमित रूप से बहस में भाग न लें।