अब नहीं फटेंगे 100, 200 और 500 के नोट, जानिए RBI का नया प्लान
समझें क्या है पूरा मामला
- भारतीय रिजर्व बैंक देश में अब प्लास्टिक के नए नोट चलाने पर विचार कर रहा है।
- ये नए नोट कागज के मुकाबले काफी मजबूत होंगे और लंबे समय तक चलेंगे।
- बाजार में नोट छापने और उन्हें बार-बार बदलने का सरकारी खर्च बहुत बढ़ गया है।
- शुरुआत में प्रायोगिक तौर पर 100, 200 और 500 रुपए के प्लास्टिक नोट आ सकते हैं।
- दुनिया के करीब 60 से ज्यादा देशों में इस तरह की करेंसी पहले से चल रही है।
भारतीय रुपए का रंग-रूप एक बार फिर पूरी तरह बदलने वाला है। नोटबंदी के बाद अब आपकी जेब में रखे नोटों में बड़ा बदलाव दिख सकता है। देश में कैश यानी नकदी की मांग दिन-प्रतिदिन बहुत तेजी से बढ़ रही है। इसे देखते हुए रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया यानी आरबीआई एक अनोखी योजना पर काम कर रहा है। बैंक अब कागज की जगह प्लास्टिक के नोट छापने की तैयारी में है।
इन नोटों को तकनीकी भाषा में पॉलिमर बैंकनोट कहा जाता है। सूत्रों की मानें तो आरबीआई की हालिया बैठकों में इस पर गंभीर चर्चा हुई है। यह कदम देश की अर्थव्यवस्था और आम जनता दोनों के लिए बड़ा बदलाव साबित होगा। अगर सब कुछ तय योजना के मुताबिक रहा, तो जल्द ही नए नोट बाजार में आ जाएंगे।
क्या होते हैं प्लास्टिक या पॉलिमर बैंकनोट
पॉलिमर नोट असल में एक खास किस्म के सिंथेटिक प्लास्टिक से तैयार किए जाते हैं। इन्हें बनाने में BOPP नाम के बेहद पतले और लचीले प्लास्टिक का इस्तेमाल होता है। ये नोट हाथ में लेने पर बिल्कुल सामान्य कागज की तरह ही मुड़ सकते हैं। लेकिन ये आम नोटों की तरह पानी में गलते नहीं हैं और न ही आसानी से फटते हैं।
इस वजह से इन्हें प्लास्टिक मनी भी कहा जाता है। इन नोटों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन पर सुरक्षा फीचर्स ज्यादा बेहतर होते हैं। नकली नोट बनाने वाले चाहकर भी इनकी आसानी से नकल नहीं कर पाएंगे। हमारी मौजूदा एटीएम मशीनें भी बिना किसी बदलाव के इन नोटों को आसानी से निकाल सकेंगी।
क्यों बढ़ रहा है प्लास्टिक नोटों पर जोर
कागज के नोट छापने में सरकार का हर साल करोड़ों रुपया खर्च होता है। आरबीआई की रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छपाई पर 6 हजार 372.8 करोड़ रुपए खर्च हुए। इससे पिछले साल यह खर्च केवल 5 हजार 101.4 करोड़ रुपए के आसपास था। लगातार बढ़ती छपाई की यह लागत रिजर्व बैंक के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुकी है।
इसके अलावा कागज के नोट बहुत जल्दी गंदे होकर खराब हो जाते हैं। पिछले साल ही केंद्रीय बैंक को करोड़ों रुपए के पुराने नोट रद्दी मानकर नष्ट करने पड़े थे। नष्ट किए गए नोटों में सबसे ज्यादा संख्या 500 और 100 रुपए के नोटों की थी। इस बर्बादी को रोकने के लिए प्लास्टिक नोट सबसे बढ़िया और टिकाऊ विकल्प हैं।
कागजी नोट बनाम प्लास्टिक नोट की तुलना ग्रैफिक से समझें
दुनिया के कई देशों में पहले से सफल है यह सिस्टम
भारत में प्लास्टिक के नोट लाने की कोशिश पहली बार नहीं हो रही है। इससे पहले साल 2012 में तत्कालीन सरकार ने भी ऐसी एक योजना बनाई थी। मगर कुछ तकनीकी दिक्कतों के कारण उस समय इसे लागू नहीं किया जा सका था। अब टेक्नोलॉजी बेहतर होने के बाद इस पर दोबारा तेजी से काम शुरू किया गया है।
दुनिया भर के 60 से ज्यादा अमीर और विकासशील देशों में प्लास्टिक नोट सफल रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया ने साल 1988 में सबसे पहले अपने यहाँ पॉलिमर नोटों की शुरुआत की थी। आज कनाडा, सिंगापुर, थाईलैंड, इंडोनेशिया और मलेशिया जैसे देश इसी करेंसी का उपयोग कर रहे हैं। अब भारत भी इसी आधुनिक राह पर आगे बढ़ने के लिए तैयार है।
FAQ
- प्लास्टिक या पॉलिमर बैंकनोट क्या होते हैं और ये किससे बनते हैं?
पॉलिमर बैंकनोट एक विशेष प्रकार के मजबूत और लचीले प्लास्टिक से बनाए जाते हैं। इन्हें तैयार करने में मुख्य रूप से बायअक्शियली ओरिएंटेड पॉलीप्रोपाइलीन (BOPP) नामक सिंथेटिक प्लास्टिक का उपयोग होता है। ये नोट दिखने और मुड़ने में सामान्य कागज के नोटों जैसे ही होते हैं, लेकिन ये पानी में भीगने से गलते नहीं हैं और इन्हें आसानी से फाड़ा नहीं जा सकता है। - आरबीआई भारत में प्लास्टिक के नोट लाने पर विचार क्यों कर रहा है?
इसका सबसे बड़ा कारण नोटों की छपाई पर होने वाला भारी खर्च और उनका जल्दी खराब होना है। वित्त वर्ष 2024-25 में नोट छापने की लागत बढ़कर 6,372.8 करोड़ रुपए तक पहुंच गई है। कागजी नोट जल्दी फट जाते हैं, जिससे हर साल करोड़ों नोटों को रद्दी घोषित करना पड़ता है। प्लास्टिक नोट लंबे समय तक चलते हैं, जिससे सरकार के करोड़ों रुपए बचेंगे। - शुरुआत में कौन-से नोट बदले जाएंगे और क्या इसके लिए एटीएम बदलने होंगे?
आरबीआई शुरुआत में एक पायलट प्रोजेक्ट के तहत 100 रुपए, 200 रुपए और 500 रुपए के प्लास्टिक नोट बाजार में उतार सकता है। राहत की बात यह है कि इन नोटों के आने के बाद देश की मौजूदा ATM मशीनों को बदलने की कोई जरूरत नहीं होगी। ये मशीनें बिना किसी तकनीकी बदलाव के नए नोटों को आसानी से बांट सकेंगी।
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