महिलाओं के मंदिर में प्रवेश का मामला: 7 अप्रैल से 9 जजों की संविधान पीठ करेगी सबरीमाला केस में सुनवाई

Sanjay Dhiman | Apr 04, 2026, 22:19 IST
Photograph: (the sootr)
सबरीमाला मंदिर विवाद पर 7 अप्रैल से सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच बड़ी सुनवाई करेगी। इसमें धार्मिक आजादी और संवैधानिक अधिकारों के टकराव पर फैसला होगा।

7 अप्रैल 2026 से सुप्रीम कोर्ट में एक ऐतिहासिक सुनवाई होने जा रही है। सुनवाई में सबरीमाला केस के संवैधानिक मुद्दों पर चर्चा होगी। इस सुनवाई का संबंध भारतीय युवा वकील संघ (Indian Young Lawyers Association) द्वारा केरल राज्य के खिलाफ दायर याचिका से है। यह मामला सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश को लेकर पिछले कुछ वर्षों से चल रहा विवाद है। जो 2018 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए फैसले के बाद और अधिक जटिल हो गया था।



9 जजों की संविधान पीठ करेगी सुनवाई

इस मामले की सुनवाई के लिए 9 जजों की एक संविधान पीठ गठित की गई है, जिसकी अध्यक्षता चीफ जस्टिस सूर्यकांत करेंगे। इस बेंच में जस्टिस बी.वी. नागरत्ना, एम.एम. सुंद्रेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी. वराले, आर. महादेवन और जॉयमाल्या बागची शामिल हैं। बेंच की संरचना को ‘मल्टीफेथ बेंच’ कहा जा रहा है क्योंकि इसमें विभिन्न पृष्ठभूमियों के न्यायाधीश शामिल हैं।



संविधान के महत्वपूर्ण अनुच्छेदों पर चर्चा

इस सुनवाई में संविधान के अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 26 पर खास ध्यान दिया जाएगा। अनुच्छेद 25 धार्मिक स्वतंत्रता से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों के अधिकारों को सुरक्षित करता है। इसके अलावा, समानता और गरिमा के अधिकार पर भी चर्चा होगी, जो महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। कोर्ट धार्मिक प्रथाओं पर न्यायिक समीक्षा की सीमा को भी निर्धारित करेगा।



2018 का ऐतिहासिक फैसला

सितंबर 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच के फैसले में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को हटा दिया था। कोर्ट ने यह माना कि धार्मिक भक्ति को लैंगिक भेदभाव के आधार पर रोकना संवैधानिक रूप से गलत है। हालांकि, इस फैसले के खिलाफ कई धार्मिक और सामाजिक संगठनों ने विरोध किया, जिसके बाद मामले को एक बड़ी बेंच के पास भेजा गया।



सुनवाई में किन मुद्दों पर विचार होगा?

इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कुल 7 अहम संवैधानिक सवालों को तय किया है:



  1. अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता का दायरा क्या है?
  2. अनुच्छेद 25 और 26 के अधिकारों के बीच संतुलन कैसे होगा?
  3. क्या धार्मिक संप्रदायों के अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं?
  4. नैतिकता के असल मायने क्या हैं?
  5. धार्मिक प्रथाओं की न्यायिक समीक्षा का दायरा क्या हो सकता है?
  6. हिंदुओं में 'सेक्शन' शब्द का अर्थ क्या है?
  7. क्या एक बाहरी व्यक्ति किसी धार्मिक प्रथा को अदालत में चुनौती दे सकता है?

इस सुनवाई का प्रभाव

इस सुनवाई का प्रभाव सिर्फ सबरीमाला केस तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह अन्य धार्मिक मामलों जैसे मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश, दाऊदी बोहरा समुदाय में प्रथाओं और पारसी महिलाओं के अधिकारों पर भी असर डाल सकता है। कई धार्मिक संगठनों ने इस मामले में अपनी याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर की हैं, जिसमें ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जैन संगठनों का हस्तक्षेप शामिल है।



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