सबरीमाला सुनवाई: SC ने कहा- धर्म की आड़ में सार्वजनिक रास्ते नहीं रोके जा सकते
News In Short
- धर्म के नाम पर सड़कें ब्लॉक करना असंवैधानिक।
- सेक्युलर काम प्रभावित हो तो सरकार दखल दे सकती है।
- आर्टिकल 25 धार्मिक रीति-रिवाजों की भी रक्षा करता है।
- AIMPLB बोला- मस्जिद में महिलाओं पर रोक नहीं।
- सबरीमाला केस में 7 अप्रैल से सुनवाई जारी है।
News In Detail
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सबरीमाला केस (Sabarimala Case) की 9वीं सुनवाई में स्पष्ट किया कि धार्मिक प्रथाओं की आड़ में सड़कें नहीं रोकी जा सकतीं।
कोर्ट ने कहा कि यदि किसी धार्मिक गतिविधि से सेक्युलर काम बाधित होता है, तो सरकार को दखल देने का पूरा अधिकार है। यह टिप्पणी आस्था और संविधान के बीच संतुलन की बड़ी बहस छेड़ गई।
सड़कें नहीं रोक सकते धर्म के नाम पर
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) ने सबरीमाला मामले की सुनवाई में एक अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने साफ कहा कि धार्मिक कामों की आड़ में सार्वजनिक सड़कें नहीं रोकी जा सकतीं।
यह सुनवाई केरल के सबरीमाला मंदिर (Sabarimala Temple) सहित अन्य धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश से जुड़ी याचिकाओं पर हो रही है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी संप्रदाय को अपनी पूजा पद्धति में स्वायत्तता जरूर है, लेकिन अगर उससे कोई सेक्युलर काम (Secular Activity) प्रभावित होता है, तो राज्य सरकार दखल दे सकती है।
आर्टिकल 25 पर बड़ी बहस
हिंदू धर्म आचार्य सभा की ओर से पेश वकील अक्षय नागराजन ने संविधान के आर्टिकल 25 (Article 25) का हवाला देते हुए दलील दी। उन्होंने कहा कि सरकार इस आधार पर किसी धार्मिक पंथ के अधिकारों में दखल नहीं दे सकती।
संविधान का आर्टिकल 25(2)(a) राज्य को धार्मिक रीति-रिवाजों से जुड़ी आर्थिक, वित्तीय और राजनीतिक गतिविधियों को नियंत्रित करने का अधिकार देता है।
नागराजन ने यह भी तर्क दिया कि आर्टिकल 25 की सुरक्षा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है। इसमें पूजा से जुड़े रीति-रिवाज, समारोह और परंपराएं भी शामिल हैं।
जस्टिस नागरत्ना की अहम टिप्पणी
इन दलीलों पर जस्टिस नागरत्ना ने महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि कोई सेक्युलर गतिविधि धार्मिक कार्यों से बाधित होती है, तो राज्य को दखल देने का अधिकार है।
यह टिप्पणी धर्म और संविधान (Religion and Constitution) के बीच की सीमा रेखा को और स्पष्ट करती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि वह किसी संप्रदाय के आंतरिक धार्मिक मामलों पर फैसला नहीं देगा। लेकिन सार्वजनिक हितों को नुकसान पहुंचाना किसी भी दशा में स्वीकार्य नहीं होगा।
मस्जिद और हिजाब पर दलीलें
मस्जिद और दरगाह में महिलाओं के प्रवेश के विरोध में दलीलें दे रहे एडवोकेट निजाम पाशा ने एक दिलचस्प तर्क रखा। उन्होंने कहा कि कोई व्यक्ति हिजाब (Hijab) को धार्मिक रूप से अनिवार्य मान सकता है, लेकिन स्कूल के नियम उससे अलग हो सकते हैं।
यानी धार्मिक विश्वास हमेशा संस्थागत नियमों से ऊपर नहीं होता। उन्होंने यह भी कहा कि यदि किसी मोहल्ले की मस्जिद सबके लिए खुली हो, तो भी कोई वहां जाकर घंटी नहीं बजा सकता क्योंकि हर धार्मिक स्थल की अपनी मर्यादा होती है।
AIMPLB और केंद्र सरकार का पक्ष
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) ने 23 अप्रैल की सुनवाई में कहा था कि इस्लाम महिलाओं को नमाज के लिए मस्जिद आने से नहीं रोकता। लेकिन बोर्ड का मत है कि घर पर इबादत करना बेहतर विकल्प है।
वहीं केंद्र सरकार ने महिलाओं की सबरीमाला में एंट्री के विरोध में दलीलें दीं। सरकार ने कहा कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों का प्रवेश भी वर्जित है। इसलिए धार्मिक परंपराओं (Religious Traditions) का सम्मान होना चाहिए।
7 अप्रैल से जारी है सुनवाई
सबरीमाला मंदिर मामले (Sabarimala Temple Case) पर सुप्रीम कोर्ट में 7 अप्रैल से सुनवाई चल रही है। यह मामला केवल एक मंदिर तक सीमित नहीं है। इसमें विभिन्न धर्मों के धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव से जुड़ी कई याचिकाएं शामिल हैं।
यह मामला आस्था, संविधान और महिला अधिकारों (Women Rights) के बीच की जटिल बहस को सामने लाता है। आने वाली सुनवाइयों में कोर्ट का रुख और स्पष्ट होने की उम्मीद है।
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