सोनिया गांधी का बड़ा खुलासा: प्रधानमंत्री बनने से क्यों किया था इनकार? राहुल-प्रियंका की इच्छा भी बताई
इससे पहले उन्होंने 'द हिंदू' को इंटरव्यू दिया। इसमें राजीव गांधी, इमरजेंसी, मनमोहन सिंह, RSS और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर अपनी राय रखी।
2004 में क्यों ठुकराया था पीएम पद?
नई दिल्ली। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी अपनी नई किताब को लेकर चर्चा में हैं। उन्होंने 2004 में प्रधानमंत्री पद ठुकराने के फैसले का जिक्र किया है। सोनिया ने बताया कि राहुल और प्रियंका भी उनके प्रधानमंत्री बनने के पक्ष में नहीं थे। उस समय यह फैसला भारतीय राजनीति में चर्चा का बड़ा विषय बना था।
इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि प्रधानमंत्री बनने पर क्या सरकार की नीतियां अलग होतीं। सोनिया ने कहा कि ऐसा विचार कभी उनके मन में नहीं आया। डॉ. मनमोहन सिंह के साथ काम करने का उनका अनुभव सकारात्मक रहा। दोनों ने एक टीम के रूप में काम किया।
2004 में क्या हुआ था?
लोकसभा चुनाव 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को सफलता मिली थी। इसके बाद सोनिया गांधी प्रधानमंत्री पद की प्रमुख दावेदार बनी थीं। हालांकि, उन्होंने सरकार का नेतृत्व करने से इनकार कर दिया था। उनकी जगह डॉ. मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया गया। वह देश के पहले सिख प्रधानमंत्री बने। सोनिया ने बताया कि दोनों की जिम्मेदारियां स्पष्ट थीं। मनमोहन सिंह सरकार चला रहे थे, जबकि वह कांग्रेस संगठन की जिम्मेदारी संभाल रही थीं।
राहुल-प्रियंका की क्या राय थी?
सोनिया गांधी ने अपनी किताब में परिवार की भूमिका का भी जिक्र किया है। उनके मुताबिक, राहुल और प्रियंका भी नहीं चाहते थे कि वह प्रधानमंत्री बनें। हालांकि, उन्होंने इंटरव्यू में इस फैसले की वजह विस्तार से नहीं बताई। उन्होंने मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के साथ अपने अनुभव को सकारात्मक बताया।
किताब लिखने में लगे पांच साल
सोनिया गांधी की किताब का नाम 'बिलॉन्गिंग: ए जर्नी ऑफ लव' है। इसका अंग्रेजी शीर्षक 'Belonging: A Journey of Love' है। किताब का विमोचन 10 नवंबर को प्रस्तावित है। सोनिया ने बताया कि उन्होंने एक दशक पहले लिखना शुरू किया था। हालांकि, गंभीरता से लेखन का काम करीब पांच साल पहले शुरू किया। इस दौरान कई बार लिखने में परेशानी भी हुई। कभी विचार आसानी से आते थे, तो कभी शब्द नहीं मिलते थे। ऐसे समय में उन्हें निराशा भी होती थी।
अपने जीवन पर लिखी 75 किताबों पर क्या कहा?
इंटरव्यू में सोनिया से उनके जीवन पर लिखी किताबों को लेकर सवाल हुआ। उन्हें बताया गया कि उनके जीवन पर कम से कम 75 किताबें लिखी जा चुकी हैं। सोनिया ने कहा कि उन्हें इतनी किताबों की जानकारी नहीं थी। उन्होंने कभी अपने बारे में लिखी किताबें पढ़ने की इच्छा नहीं जताई। राजीव गांधी के साथ उन्होंने काफी पहले इस बारे में फैसला कर लिया था। दोनों को लगता था कि अपने बारे में लिखी बातें पढ़ते रहना व्यर्थ है। हालांकि, बाद में सोनिया को अपनी कहानी खुद बताने की जरूरत महसूस हुई।
राजीव गांधी से प्रेम और भारत से जुड़ाव
सोनिया ने किताब में राजीव गांधी के साथ अपनी प्रेम कहानी का जिक्र किया है। उन्होंने इसे केवल दो लोगों की प्रेम कहानी नहीं बताया। उनके मुताबिक, यह राजीव के परिवार और भारत से जुड़ने की कहानी भी है।
शादी के बाद भारत आने पर उन्हें इस देश के बारे में जानकारी नहीं थी। धीरे-धीरे वह राजीव के परिवार और भारत से जुड़ती गईं। इसी लगाव ने उन्हें सार्वजनिक जीवन में आने के लिए प्रेरित किया।
सोनिया ने बताया कि कांग्रेस कमजोर होने पर उन्हें जिम्मेदारी निभाना जरूरी लगा। उन्हें परिवार के बलिदानों से जुड़े उद्देश्यों के खतरे में पड़ने का अहसास हुआ। इसके बाद उन्होंने राजनीति में आने का फैसला किया।
राजीव से मुलाकात के 60 साल बाद क्या बदला?
सोनिया गांधी से उनके इटली में बीते बचपन के बारे में सवाल पूछा गया। उनसे पूछा गया कि बचपन के कौन-से संस्कार आज भी उनके व्यक्तित्व में हैं। सोनिया ने कहा कि उनका मूल स्वभाव आज भी पहले जैसा है। राजीव से करीब 60 साल पहले मुलाकात के समय भी वह ऐसी ही थीं। हालांकि, उस समय वह आज के मुकाबले ज्यादा हंसती और मुस्कुराती थीं।
इंदिरा और राजीव गांधी से क्या सीखा?
सोनिया गांधी ने इंदिरा और राजीव गांधी को अपनी प्रेरणा बताया। उनके मुताबिक, दोनों ने उनके व्यक्तित्व और भारत को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने दोनों के साहस, संवेदनशीलता और कर्तव्य के प्रति समर्पण का जिक्र किया। दोनों लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते थे। सोनिया ने कहा कि उनके लिए जिम्मेदारी निभाना सबसे महत्वपूर्ण था। इन्हीं गुणों ने मुश्किल परिस्थितियों में उन्हें मजबूती दी।
इमरजेंसी पर क्या बोलीं सोनिया?
सोनिया गांधी ने आपातकाल के दौरान हुई ज्यादतियों पर भी बात की। उन्होंने कहा कि उस समय की पूरी गंभीरता उन्हें बाद में समझ आई। आपातकाल के दौरान लोकतांत्रिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाए गए थे। बंदी प्रत्यक्षीकरण के अधिकार को भी निलंबित कर दिया गया था। सोनिया के मुताबिक, यह सब संवैधानिक प्रक्रिया के तहत किया गया था। हालांकि, उन्होंने उस दौरान हुई कई घटनाओं पर असहमति जताई। उन्होंने कहा कि इंदिरा गांधी तेजी से बिगड़ती परिस्थितियों से निपटने की कोशिश कर रही थीं। उन पर कुछ वरिष्ठ सहयोगियों का भी दबाव था। सोनिया के मुताबिक, आपातकाल की ज्यादतियों के लिए केवल संजय गांधी जिम्मेदार नहीं थे।
इंदिरा गांधी की माफी का भी जिक्र
सोनिया ने मार्च 1977 में चुनाव कराने के फैसले का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि चुनाव कराने का निर्णय खुद इंदिरा गांधी ने लिया था। सोनिया के मुताबिक, इंदिरा गांधी ने बाद में आपातकाल की ज्यादतियों पर खेद जताया था। उन्होंने सार्वजनिक रूप से माफी भी मांगी थी।
प्रधानमंत्री मोदी की सोच पर क्या कहा?
सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विचारधारा को अपनी सोच से अलग बताया। उन्होंने मोदी के साधारण सामाजिक परिवेश से सत्ता तक पहुंचने की बात भी स्वीकार की। सोनिया ने कहा कि राजनीति में सफलता हासिल करने के कई रास्ते होते हैं। उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे का उदाहरण दिया। सोनिया ने यह भी कहा कि उन्हें RSS से कुछ सीखने की जरूरत नहीं लगती।
RSS और BJP को लेकर क्या बोलीं?
सोनिया गांधी ने RSS और BJP को संवैधानिक मूल्यों के लिए चुनौती बताया। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र और बंधुत्व को महत्वपूर्ण बताया। सोनिया ने कहा कि कांग्रेस हमेशा धर्मनिरपेक्षता पर स्पष्ट रुख रखती आई है। हालांकि, पार्टी में कुछ नेता इस मुद्दे पर नरम रुख अपनाने के पक्ष में थे। लेकिन यह कांग्रेस का आधिकारिक नजरिया नहीं था।उन्होंने कहा कि हर नागरिक को बिना डर के अपना धर्म मानने का अधिकार है। कांग्रेस इस संवैधानिक अधिकार का समर्थन करती रही है।