कंटेनर की कमी और युद्ध से मप्र के सोयामील निर्यात पर संकट, एक्सपोर्ट 93K से 40K टन पर
समझें क्या है पूरा मामला
- पश्चिम एशिया युद्ध से भारत के सोयामील निर्यात पर सीधा असर पड़ा है।
- कंटेनर की कमी और बढ़ती शिपिंग लागत ने स्थिति को और बिगाड़ा है।
- ईरान और खाड़ी देशों ने खरीद घटाई, जिससे घरेलू स्टॉक बढ़ रहा है।
- मध्यप्रदेश की मंडियों में माल की आवाजाही सुस्त पड़ गई है।
सोयामील एक्सपोर्ट में भारी गिरावट
भारत का सोयामील निर्यात मार्च में करीब आधा रह गया। फरवरी में जहां 93 हजार टन एक्सपोर्ट हुआ था, वहीं मार्च में यह आंकड़ा घटकर 40 से 50 हजार टन के बीच आ गया है। निर्यातकों का कहना है कि अप्रैल में हालात और बिगड़ सकते हैं। नए ऑर्डर नहीं आ रहे और कंटेनरों की भारी कमी बनी हुई है।
पश्चिम एशिया युद्ध से टूटी सप्लाई चेन
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने शिपिंग रूट को बुरी तरह प्रभावित किया है। जहाजों की आवाजाही बाधित हो गई है और युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम बढ़ गया है। माल ढुलाई की लागत भी ऊपर गई है। इन सब कारणों से भारतीय सोयामील प्रतिस्पर्धी बाजारों में टिक नहीं पा रहा। खासकर उन देशों में जो दाम को लेकर बेहद संवेदनशील हैं।
सोयाबीन प्रोसेसर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (SOPA - Soybean Processors Association of India) के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर डीएन पाठक बताते हैं कि लॉजिस्टिक्स की चुनौतियों ने निर्यात गतिविधि को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया है। उन्होंने बताया कि कंटेनर की कमी, जहाजों की बाधित आवाजाही और संघर्ष से जुड़ी देरी ने शिपमेंट की मात्रा काफी घटा दी है।
भारतीय सोयामील महंगा, ब्राजील-अर्जेंटीना सस्ते
भारतीय सोयामील की कीमत इस समय दक्षिण-पूर्व एशिया के लिए 500 से 505 डॉलर प्रति टन चल रही है। वहीं ब्राजील और अर्जेंटीना 420 से 430 डॉलर प्रति टन पर बेच रहे हैं। यह अंतर करीब 70 से 80 डॉलर प्रति टन का है। इस कारण भारत अंतरराष्ट्रीय बाजार में पिछड़ रहा है।
इंदौर के वरिष्ठ निर्यातक वीके जैन, जिन्होंने फरवरी में बड़ी मात्रा में सोयामील शिप किया था, उनका कहना है कि निर्यात जल्द संभलने की उम्मीद कम है। उन्होंने बताया कि साल की शुरुआत से ही भारतीय सोयामील की ऊंची कीमतें मुश्किल खड़ी कर रही थीं। अब जियो पॉलिटिकल स्ट्रेस ने मांग को और दबा दिया है और नए ऑर्डर आने में देरी हो रही है।
MP की मंडियां भी सुस्त
सोयाबीन प्रोडक्शन और ट्रेड के मामले में मध्यप्रदेश देश में टॉप पर है। इस राज्य पर गिरावट का असर सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है। स्थानीय मंडियों में व्यापारी बता रहे हैं कि माल उठान धीमी हो गई है और बाजार का माहौल कमजोर पड़ा है।
ईरान और मध्य-पूर्व के अन्य देशों ने खरीद घटा दी है। इससे घरेलू स्तर पर स्टॉक जमा हो रहा है। व्यापारियों की चिंता यह है कि बाजार में अनिश्चितता बनी रहेगी और जल्द राहत मिलने की संभावना नहीं है।
पूरे तेल वर्ष का हाल भी खराब
2024-25 तेल वर्ष (Oil Year) में सोयामील निर्यात 20.23 लाख टन रहा। पिछले साल यह 22.75 लाख टन था। यानी सालाना आधार पर भी निर्यात में गिरावट आई है। यह आंकड़ा बताता है कि विदेशी मांग पर दबाव लंबे समय से चला आ रहा है, यह कोई एकाएक आई मुश्किल नहीं है।
सोयामील एक अहम कृषि उत्पाद है। इसका उपयोग मुर्गी पालन और पशु आहार में उच्च प्रोटीन सामग्री के रूप में होता है। भारत के प्रमुख बाजारों में पश्चिम एशिया, यूरोप और पूर्वी अफ्रीका शामिल हैं।
अप्रैल में और बुरे हालात की आशंका
निर्यातकों ने चेताया है कि अप्रैल में स्थिति और खराब हो सकती है। ताजा ऑर्डर नहीं आ रहे। कंटेनर संकट थमने का नाम नहीं ले रहा। जब तक पश्चिम एशिया में शांति नहीं होती, शिपिंग रूट सामान्य होने की उम्मीद कम है। फिलहाल उद्योग जगत में माहौल उदास है और किसान से लेकर निर्यातक तक सब बेचैन हैं।
सोर्स: SOPA (Soybean Processors Association of India)
यह खबर क्यों जरूरी है?
यह खबर भारत की कृषि अर्थव्यवस्था और किसानों की आजीविका से सीधे जुड़ी है। मध्यप्रदेश देश का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य है। जब निर्यात गिरता है तो मंडियों में भाव कमजोर होते हैं और किसान को उसकी उपज का उचित दाम नहीं मिल पाता। वैश्विक भू-राजनीतिक संकट किस तरह एक सामान्य किसान और व्यापारी के जीवन को प्रभावित करता है, यह उसकी सटीक मिसाल है।
FAQ
- सोयामील एक्सपोर्ट में इतनी तेज गिरावट क्यों आई?
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने समुद्री शिपिंग रूट को बाधित किया है। जहाजों की आवाजाही मुश्किल हो गई है, कंटेनरों की भारी किल्लत है और युद्ध जोखिम बीमा का खर्च बढ़ गया है। इन सबने मिलकर माल ढुलाई की लागत को इतना ऊंचा कर दिया है कि भारतीय सोयामील विदेशी बाजारों में ब्राजील और अर्जेंटीना के मुकाबले 70 से 80 डॉलर प्रति टन महंगा पड़ता है। नतीजतन ईरान जैसे बड़े खरीदारों ने भारत से खरीद कम कर दी। इसीलिए फरवरी के 93,000 टन की तुलना में मार्च में निर्यात घटकर मात्र 40,000 से 50,000 टन रह गया। - सोयामील एक्सपोर्ट में गिरावट का मध्यप्रदेश के किसानों पर क्या असर होगा?
मध्यप्रदेश भारत का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक और ट्रेडिंग हब है। जब निर्यात घटता है तो घरेलू बाजार में सोयामील का स्टॉक बढ़ता है। इससे मंडी में भाव कमजोर होते हैं। स्थानीय मंडियों में पहले से माल की आवाजाही धीमी है और व्यापारी उदास हैं। किसान को उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता, जो उसकी आमदनी और अगले सीजन की बुवाई की तैयारी पर सीधा असर डालता है।
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