नेताजी को 'राष्ट्रपुत्र' घोषित करने की याचिका खारिज, सुप्रीम कोर्ट ने बताया पब्लिसिटी स्टंट, याचिकाकर्ता की एंट्री पर रोक
News in Short
- सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी को 'राष्ट्रपुत्र' घोषित करने वाली जनहित याचिका खारिज कर दी।
- कोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका को पब्लिसिटी स्टंट बताते हुए सख्त फटकार और चेतावनी दी।
- बेंच ने कहा कि बार-बार ऐसी याचिकाएं लाकर अदालत का कीमती समय बर्बाद किया।
- याचिका में आजादी का पूरा श्रेय आजाद हिंद फौज को देने की मांग थी।
- भविष्य में याचिकाकर्ता की किसी भी नई याचिका को स्वीकार करने पर रोक लगा दी।
News in Detail
देश की राजनीति में नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम हमेशा से ही एक इमोशनल मुद्दा रहा है। अक्सर लोग मांग करते हैं कि उन्हें आधिकारिक तौर पर विशेष सम्मान दिया जाए। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में एक ऐसी ही जनहित याचिका (PIL) दाखिल की गई थी।
इस याचिका में नेताजी को 'राष्ट्रपुत्र' घोषित करने की मांग रखी गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस मांग पर सुनवाई से साफ इनकार कर दिया। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को फटकार भी लगाई। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस याचिका पर नाराजगी जताई।
पब्लिसिटी के लिए अदालतों का इस्तेमाल बंद हो
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता पिनाकपानी मोहंती को फटकार लगाते हुए उन्हें “न सुधरने वाला” इंसान बताया। कोर्ट ने कहा कि आप सिर्फ पब्लिसिटी पाने के लिए ऐसी याचिकाएं लाते हैं। बेंच ने चेतावनी दी कि भविष्य में उनकी कोई भी PIL स्वीकार नहीं होगी।
कोर्ट ने रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि उनकी एंट्री पर रोक लगा दी जाए। न्यायाधीशों ने कहा कि अदालत का कीमती समय ऐसे मुद्दों पर बर्बाद नहीं होगा। याचिकाकर्ता पहले भी इसी तरह की कई याचिकाएं कोर्ट में दाखिल कर चुके हैं। कोर्ट ने साफ कर दिया कि ऐतिहासिक मुद्दों को अदालतों में नहीं घसीटना चाहिए।
याचिकाकर्ता की मांगें
पिनाकपानी मोहंती ने अपनी याचिका में कई मांगें की थीं, जिनमें प्रमुख थीं:
- नेताजी सुभाष चंद्र बोस को राष्ट्रीय पुत्र के रूप में मान्यता दी जाए।
- भारतीय राष्ट्रीय सेना (INA) के स्थापना दिवस 21 अक्टूबर 1943 को राष्ट्रीय दिवस घोषित किया जाए।
- नेताजी की जयंती 23 जनवरी को राष्ट्रीय दिवस के रूप में मनाई जाए।
- उनके जन्मस्थान कटक (ओडिशा) को राष्ट्रीय संग्रहालय बनाया जाए।
- आजादी का श्रेय उन क्रांतिकारियों को दिया जाए, जिन्होंने अहिंसा का पालन नहीं किया।
- 1947 में भारत की आजादी के असल कारणों की रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए।
- नीरा आर्य (INA की पहली महिला जासूस) को 'राष्ट्र-पुत्री' घोषित किया जाए।
नीरा आर्य को 'राष्ट्र-पुत्री' बनाने और फाइलों को खोलने की जिद
पिनाकपानी मोहंती ने आजाद हिंद फौज की पहली महिला जासूस नीरा आर्य का मुद्दा उठाया। उन्होंने मांग की कि नीरा आर्य को 'राष्ट्र-पुत्री' के रूप में मान्यता दी जाए। याचिका में यह भी कहा गया कि 1947 की आजादी की सच्चाई छिपाई गई है। सरकार को वे सारी गुप्त रिपोर्ट सार्वजनिक करनी चाहिए, जो ब्रिटिशों से जुड़ी हैं।
मोहंती के अनुसार, जनता को यह जानने का हक है कि अंग्रेज क्यों भागे। उन्होंने भारतीय सेना के विद्रोहों की रिपोर्ट भी सार्वजनिक करने पर जोर दिया था। लेकिन कोर्ट ने इन सभी मांगों को कानूनी प्रक्रिया के बाहर का बताया।
पहले भी खारिज हो चुकी हैं ऐसी कई याचिकाएं
यह पहली बार नहीं है जब मोहंती ने कोर्ट का दरवाजा खटखटाया हो। साल 2024 में भी उन्होंने नेताजी की मौत की जांच के लिए याचिका दी थी। तब जस्टिस सूर्यकांत और केवी विश्वनाथन की बेंच ने उनके इरादों पर सवाल उठाए थे। कोर्ट ने पूछा था कि चुनाव के समय ही ऐसी याचिकाएं क्यों आती हैं? सोमवार को हुई सुनवाई में कोर्ट का रवैया और भी ज्यादा सख्त दिखाई दिया।
अदालत ने कहा कि न्यायिक समय उन लोगों के लिए है जिन्हें वाकई न्याय चाहिए। महापुरुषों के सम्मान का फैसला जनता और सरकार करती है, अदालतें इसमें नहीं पड़तीं। अब मोहंती के सुप्रीम कोर्ट आने पर लगभग पाबंदी जैसी स्थिति बन गई है।
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