हिरासत और गिरफ्तारी में फर्क नहीं: अगर 24 घंटे बीत गए और पेशी नहीं हुई, तो रिहाई तुरंत होगी
मगर पुलिस हिरासत में दर्शाकर पूछताछ के नाम पर लोगों को लंबे समय तक थाने में रख लेती है। सोचिए, पुलिस या कोई दूसरी जांच एजेंसी आपको दोपहर 2 बजे हिरासत में ले ले। कागजों में गिरफ्तारी अगले दिन सुबह 11 बजे दिखे। बीच के घंटे किसके खाते में जाएंगे?
अब सुप्रीम कोर्ट ने इसका जवाब दे दिया है।
समझें क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को हिरासत और गिरफ्तारी पर अहम फैसला सुनाया। हिरासत के 24 घंटे का नियम अब हिरासत के पहले पल से ही गिना जाएगा। औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने तक इंतजार करने का तरीका गलत माना गया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला त्रिपुरा के एक NDPS केस यानी नशीले पदार्थों से जुड़े मामले में सुनाया है।
यह आपसे क्यों जुड़ा है?
यह सुप्रीम कोर्ट का फैसला आपके बड़े काम का है, भले थाने न गए हों। कल आपका कोई अपना पूछताछ के नाम पर उठाया जा सकता है। तब पहला सवाल यही होगा।
मजिस्ट्रेट के सामने पेशी कब होगी? इसका जवाब अब साफ है। हिरासत के पहले पल से 24 घंटे के भीतर। आपके गिरफ्तारी के अधिकार इसी गिनती पर टिके हैं। सोचिए, अगर यह गिनती कागज के भरोसे रहे, तो आपके पास बचेगा क्या?
पहले क्या नियम था
संविधान के अनुच्छेद 22(2) में साफ कहा गया है कि पुलिस किसी को गिरफ्तार करती है, तो उसे 24 घंटे के भीतर नजदीकी मजिस्ट्रेट यानी जज के सामने पेश करना जरूरी है। हालांकि, थाने से कोर्ट तक पहुंचने में जितना जरूरी समय लगता है, उसे इन 24 घंटों में नहीं गिना जाता।
असल सवाल यहीं था। अगर 24 घंटे की गिनती गिरफ्तारी के समय से शुरू होगी, तो गिरफ्तारी का समय कौन तय करेगा? पुलिस किसी को पहले हिरासत में ले और कागजों में गिरफ्तारी बाद में दिखाए, तो बीच के घंटों का क्या होगा? इस मामले में भी आरोपियों ने यही आरोप लगाया कि जांच एजेंसी ने जानबूझकर उनकी गिरफ्तारी देर से दर्ज की।
यह सवाल पहले भी अदालतों में उठ चुका है। अप्रैल 2026 में पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने भी ऐसे ही एक NDPS मामले में आरोपी की गिरफ्तारी को अवैध माना था। अगस्त 2026 में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने भी कहा था कि 24 घंटे की गिनती हिरासत में लेने के समय से शुरू होगी। हालांकि, त्रिपुरा हाई कोर्ट ने इस मामले के चारों आरोपियों को जमानत देने से इनकार कर दिया था।
क्या हुआ और क्यों
मामला 29 सितंबर 2025 का है। उस दिन दोपहर 2 बजे जांच एजेंसी ने चार लोगों को हिरासत में लिया था। तलाशी और सामान जब्त करने की कार्रवाई के दौरान उन्हें पकड़ा गया था। यानी वे अपनी मर्जी से कहीं आ-जा नहीं सकते थे।
लेकिन कागजों में उनकी गिरफ्तारी अगले दिन यानी 30 सितंबर को सुबह 11 बजे दिखाई गई। मतलब, करीब 21 घंटे तक वे जांच एजेंसी की हिरासत में रहे, लेकिन इस दौरान उन्हें किसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया।
इसे आसान भाषा में ऐसे समझिए। किसी दौड़ में समय की गिनती तब शुरू होती है, जब खिलाड़ी दौड़ना शुरू करता है, न कि तब जब उसका समय रजिस्टर में लिखा जाता है। सुप्रीम कोर्ट ने भी यही बात साफ की। 24 घंटे की गिनती उस समय से होगी, जब किसी व्यक्ति को वास्तव में हिरासत में लिया गया, न कि उस समय से जब पुलिस कागजों में उसकी गिरफ्तारी दर्ज करे।
यह मामला NDPS एक्ट यानी नशीले पदार्थों से जुड़े कानून के तहत दर्ज हुआ था। इसी मामले के चार आरोपियों ने त्रिपुरा हाई कोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की बेंच ने यह अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि संविधान के मुताबिक हिरासत और गिरफ्तारी को अलग-अलग मानकर 24 घंटे की गिनती नहीं की जा सकती। यानी पुलिस किसी को हिरासत में लेती है, तो उसी समय से 24 घंटे की गिनती शुरू हो जाएगी।
कोर्ट ने कहा कि पुलिस यह नहीं कह सकती कि पहले पूछताछ के लिए हिरासत में लिया था और बाद में गिरफ्तारी की। ऐसा करके 24 घंटे की समय सीमा को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 56 का भी जिक्र किया। कोर्ट ने साफ किया कि पूछताछ के नाम पर किसी को हिरासत में रखने के लिए 24 घंटे से अलग कोई अतिरिक्त समय नहीं मिलता।
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपुरा हाई कोर्ट का फैसला पलट दिया। कोर्ट के मुताबिक चारों आरोपियों को 29 सितंबर 2025 की दोपहर 2 बजे से अगले 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना जरूरी था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया। इसलिए कोर्ट ने उनकी रिहाई का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों को थोड़े समय के लिए भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
जजों ने कौन से निर्देश दिए
पीठ ने सिर्फ फैसला नहीं सुनाया। पूरी व्यवस्था के लिए निर्देश भी तय किए। अगर 24 घंटे बीत गए और पेशी नहीं हुई, तो रिहाई तुरंत होगी।
गिनती में सिर्फ अदालत तक पहुंचने का जरूरी सफर घटाया जाएगा। मजिस्ट्रेट को हिरासत की असली तारीख और समय दर्ज करना होगा। उन्हें यह भी जांचना होगा कि पेशी तय समय में हुई या नहीं।
एक बात और। BNSS धारा 58 के मुताबिक हिरासत का उचित होना भी जरूरी है। बेवजह लंबी हिरासत हो, तो मजिस्ट्रेट रिमांड से मना कर सकते हैं। रिमांड यानी हिरासत आगे बढ़ाने का अदालती आदेश।
तो क्या इससे पुलिस के हाथ बंध गए? ऐसा नहीं कहा जा सकता। कोर्ट ने पूछताछ पर रोक नहीं लगाई। रोक इस पर लगी कि पूछताछ का समय गिनती से बाहर रख दिया जाए।
कौन-कौन शामिल है
इस कहानी में चार पक्ष हैं। पहले, चार अपीलकर्ता यानी हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करने वाले। उन्हें हिरासत की सही गिनती चाहिए थी। दूसरे, जांच एजेंसी। आम तौर पर उसे तलाशी, जब्ती और जांच के लिए खुला समय चाहिए। तीसरे, मजिस्ट्रेट, जिन पर अब हिरासत का समय परखने की जिम्मेदारी है। चौथा, त्रिपुरा हाई कोर्ट, जिसका आदेश पलटा गया।
दोनों पक्षों की बात
जांच एजेंसियों की चिंता असली है। नशीले पदार्थ के मामलों में तलाशी, जब्ती और पहचान में घंटे लग जाते हैं। एजेंसियां आम तौर पर कहती हैं कि गिरफ्तारी का फैसला सबूत देखकर होता है। (इस मामले में यह तर्क रखा गया या नहीं, अभी confirm नहीं हुआ है।)
दूसरी तरफ कोर्ट की चिंता भी उतनी ही असली है। गिनती औपचारिक गिरफ्तारी से शुरू हो, तो हिरासत की कोई सीमा नहीं बचती। एजेंसी खुद तय करेगी कि गिरफ्तारी कब लिखी जाए। यही रास्ता पीठ ने बंद किया।
आगे क्या होगा
छोटी अवधि में पुलिस और एजेंसियों को अपने रिकॉर्ड सुधारने होंगे। हिरासत का समय पहले मिनट से दर्ज करना पड़ेगा। मजिस्ट्रेट पेशी के वक्त इसी समय को परखेंगे।
लंबी अवधि में पूछताछ के तरीकों पर असर पड़ सकता है। आने वाले दिनों में जमानत अर्जियों में इस फैसले का हवाला दिखे, तो हैरानी नहीं होगी। एक सवाल अभी खुला है। कौन तय करेगा कि पूछताछ कब हिरासत में बदल गई?
एक बात जो आप नहीं जानते थे
24 घंटे ऊपरी सीमा हैं, हक नहीं। पीठ के मुताबिक 24 घंटे के भीतर भी बेवजह लंबी हिरासत गलत हो सकती है। यानी मजिस्ट्रेट सिर्फ घंटे नहीं गिनेंगे। वे यह भी देखेंगे कि हिरासत जरूरी थी या नहीं। यह बात ज्यादातर लोग नहीं जानते।
अब आप क्या करें
अब आप क्या करें: हिरासत की स्थिति में समय, जगह और अधिकारी का नाम नोट करें।
क्यों अभी: पेशी की गिनती उसी पहले पल से शुरू होती है।
आगे देखें: निचली अदालतें हिरासत का समय कैसे दर्ज करवाती हैं।
यह खबर क्यों जरूरी है?
भारत में व्यक्तिगत आजादी संविधान की बुनियाद है। अनुच्छेद 22(2) का मकसद है कि कोई नागरिक बिना न्यायिक निगरानी के लंबे समय तक हिरासत में न रहे। यह फैसला उस मकसद को कागजी चालाकी से बचाता है। पुलिस, एजेंसियों और मजिस्ट्रेट की जिम्मेदारी साफ होती है। आम नागरिक को भी पता चलता है कि हिरासत में उसके अधिकार कब शुरू होते हैं। यह नागरिक और राज्य के बीच भरोसे की शर्त है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश देश की निचली अदालतों के लिए रास्ता तय करते हैं।
FAQ's
- सवाल: सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक 24 घंटे की गिनती कब से शुरू होती है?
जवाब: गिनती हिरासत के असली समय से शुरू होती है, औपचारिक गिरफ्तारी दर्ज होने के समय से नहीं। सिर्फ अदालत तक पहुंचने का जरूरी सफर इसमें नहीं जुड़ता। यह फैसला अनुच्छेद 22(2) पर आधारित है। - सवाल: क्या हिरासत और गिरफ्तारी में कोई फर्क है?
जवाब: अनुच्छेद 22(2) के लिए दोनों शब्दों का मतलब एक माना गया है। जब भी किसी की आजादी रोकी जाए, 24 घंटे की गिनती शुरू होती है। एहतियातन हिरासत (रोकथाम के लिए हिरासत) के नियम अलग हैं।