बिल्डरों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार, कहा- ब्रोशर में जो दिखाया वही बनाकर देना होगा
समझें क्या है पूरा मामला
- सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डरों पर सख्ती दिखाई है।
- ब्रोशर में किए वादे पूरे करने होंगे।
- विज्ञापन को सिर्फ मार्केटिंग नहीं माना जाएगा।
- घर खरीदारों के हितों की रक्षा होगी।
- प्रोजेक्ट बदलाव पर बिल्डरों की जवाबदेही तय होगी।
घर खरीदना ज्यादातर लोगों के लिए जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला होता है। लोग ब्रोशर देखकर सपने बुनते हैं। लेकिन कई बार असली प्रोजेक्ट कुछ और निकलता है। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि बिल्डर ब्रोशर में किए वादे नहीं तोड़ सकते। यह सिर्फ मार्केटिंग नहीं, एक जिम्मेदारी है।
ब्रोशर बना कोर्ट का मुद्दा
यह मामला गुरुग्राम के ‘द प्राइमस’ प्रोजेक्ट से जुड़ा है। इसे DLF होम डेवलपर्स बना रही है। मूल प्लान में 24 मीटर चौड़ी सड़क का वादा था। लेकिन असल में यह सड़क बड़े हिस्से में गायब पाई गई।
कोर्ट ने इसे मामूली गलती नहीं माना। जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने कहा कि यह बदलाव बड़ा है। बेंच ने चेतावनी दी कि अगली सुनवाई तक सुधार न होने पर सख्त आदेश आ सकता है।
सड़क का हाल क्या निकला
सड़क के लिए 147 मीटर हिस्सा तय था। जांच में पता चला कि करीब 52 मीटर हिस्सा ग्रीन पैच बना दिया गया। एक और हिस्सा पार्किंग के लिए इस्तेमाल हो रहा है।
यानी करीब 100 मीटर हिस्सा सड़क जैसा नहीं बचा। यह कुल हिस्से का करीब दो-तिहाई है। यह जानकारी CBI (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन – Central Bureau of Investigation) की स्टेटस रिपोर्ट से सामने आई।
हरियाणा सरकार पर भी नाराजगी
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ बिल्डर को नहीं टोका। कोर्ट ने हरियाणा सरकार और अधिकारियों पर भी नाराजगी जताई। सड़क के लिए जरूरी जमीन का मसला अब तक नहीं सुलझा।
रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (RWA – Resident Welfare Association) के चुनाव में भी रुकावटें आ रही हैं। कोर्ट ने कहा कि इस दिशा में असरदार कदम नहीं उठाए गए।
CBI जांच अब आगे बढ़ेगी
कोर्ट ने इस साल जुलाई में CBI को शुरुआती जांच का आदेश दिया था। अब कोर्ट ने जांच टीम मजबूत करने को कहा है। सुपरिटेंडेंट ऑफ पुलिस सौरभ गुप्ता की मदद के लिए दो और इंस्पेक्टर तैनात होंगे।
कोर्ट ने साफ किया कि CBI को निष्पक्ष तरीके से जांच करनी है। कोर्ट की टिप्पणियों का जांच पर असर नहीं पड़ना चाहिए। अगली सुनवाई 12 अक्टूबर को होगी।
पूरे विवाद की जड़ क्या है
DLF ने साल 2012 के आसपास इस प्रोजेक्ट की मार्केटिंग शुरू की थी। इसे प्रीमियम हाउसिंग कॉम्प्लेक्स बताया गया था। वादे में दो चौड़ी सड़कें, बैंक्वेट सुविधा, टेनिस कोर्ट और स्विमिंग पूल शामिल थे।
बाद में खरीदारों ने शिकायत की कि हकीकत वादों जैसी नहीं थी। पांच खरीदारों की शिकायत पर पहले नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC – National Consumer Disputes Redressal Commission) ने सुनवाई की। मई 2023 में फैसला आने के बाद दोनों पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
खरीदारों का कहना है कि प्रोजेक्ट चारों तरफ से खेती की जमीन से घिरा है। उनका आरोप है कि बुनियादी सुविधाएं अधूरी हैं। उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि बिना पूरे इंफ्रास्ट्रक्चर के आंशिक ऑक्यूपेशन सर्टिफिकेट कैसे मिला। वहीं DLF का कहना है कि पानी, बिजली और नियमों के पालन के साथ ही अपार्टमेंट का कब्जा दिया गया था।
कोर्ट ने पहले भी जताई थी चिंता
इसी साल फरवरी में सुप्रीम कोर्ट ने पाया था कि वादों और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर है। कोर्ट ने कहा था कि यह मामला अकेला नहीं भी हो सकता।
बेंच ने कहा था कि संगठित रियल एस्टेट सेक्टर में ऐसे मामलों का आम खरीदारों पर बड़ा असर पड़ सकता है। इसी चिंता के चलते CBI जांच का रास्ता खुला। यह मामला अब सिर्फ एक प्रोजेक्ट का नहीं रहा। यह देशभर के घर खरीदारों के भरोसे से जुड़ा सवाल बन गया है।
FAQ
- सुप्रीम कोर्ट ने बिल्डरों को क्या चेतावनी दी है?
कोर्ट ने कहा कि ब्रोशर में किए वादे निभाना जरूरी है। इसे सिर्फ मार्केटिंग बताकर टाला नहीं जा सकता। बिल्डरों को असल प्रोजेक्ट वादों जैसा ही बनाना होगा। - DLF के किस प्रोजेक्ट पर विवाद है?
यह विवाद गुरुग्राम के ‘द प्राइमस’ प्रोजेक्ट से जुड़ा है। यहां 24 मीटर चौड़ी सड़क का वादा पूरा नहीं हुआ। अब मामले की CBI जांच चल रही है।
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