सबरीमाला केस: हिंदू धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं, यह जीवन जीने का तरीका -सुप्रीम कोर्ट

Pawan Modiya | May 13, 2026, 18:20 IST
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सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला सुनवाई में कहा कि हिंदू धर्म जीवन जीने का तरीका है। मंदिर जाना या अनुष्ठान करना हिंदू बने रहने के लिए जरूरी नहीं, घर में दीपक जलाना भी आस्था का सबूत है।

समझें क्या है पूरा मामला

सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ सबरीमाला मामले की सुनवाई कर रही है। कोर्ट ने कहा कि हिंदू धर्म सिर्फ पूजा-पद्धति नहीं, जीवन जीने का तरीका है। मंदिर जाना या अनुष्ठान करना हिंदू बने रहने के लिए जरूरी नहीं है। घर में दीपक जलाना भी आस्था साबित करने के लिए काफी है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटाई थी।



सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक टिप्पणी

13 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हिंदू धर्म को लेकर एक बड़ी और अहम बात कही। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि हिंदू धर्म केवल पूजा-पद्धति तक सीमित नहीं है। यह जीवन जीने का एक पूरा तरीका है। मंदिर जाना या कोई खास धार्मिक अनुष्ठान करना किसी को हिंदू बनाए रखने के लिए अनिवार्य नहीं है।



यह टिप्पणी उस वक्त आई जब देश की सबसे बड़ी अदालत में धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के धार्मिक स्थलों में प्रवेश से जुड़े मामलों की सुनवाई चल रही थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली नौ जजों की संविधान पीठ ने यह बात कही। इस पीठ में जस्टिस बी वी नागरत्ना, एम एम सुंदरेश, अहसानुद्दीन अमानुल्लाह, अरविंद कुमार, ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह, प्रसन्ना बी वराले, आर महादेवन और जॉयमल्या बागची भी शामिल हैं।



नौ जजों की पीठ क्यों?

सितंबर 2018 में पांच जजों की संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से एक ऐतिहासिक फैसला दिया था। उस फैसले में केरल के सबरीमाला अयप्पा मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को असंवैधानिक करार दिया गया था। कोर्ट ने कहा था कि यह सदियों पुरानी प्रथा अवैध है।



उस फैसले के बाद केरल में बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। इसके बाद यह मामला नौ जजों की बड़ी पीठ को सौंपा गया। अब यह पीठ सबरीमाला के फैसले के साथ-साथ धार्मिक स्वतंत्रता और समानता से जुड़े व्यापक सवालों पर भी सुनवाई कर रही है।



1966 के फैसले का जिक्र, उठे नए सवाल

सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ता की तरफ से वरिष्ठ वकील डॉ. जी मोहन गोपाल ने दलील दी। उन्होंने 1966 के एक पुराने अदालती फैसले का हवाला दिया। उस फैसले में हिंदू की परिभाषा कुछ यूं दी गई थी कि हिंदू वह है जो वेदों (Vedas) को धर्म और दर्शन के मामलों में सर्वोच्च मानता हो।



डॉ. गोपाल ने सवाल उठाया कि क्या आज हर वह व्यक्ति जो खुद को हिंदू मानता है, सच में वेदों को सर्वोच्च मानता है? उनका तर्क था कि समाज की असलियत इस परिभाषा से कहीं ज्यादा विस्तृत और अलग है। धार्मिक समुदायों के भीतर से भी सामाजिक न्याय की मांग लगातार उठ रही है।



जस्टिस नागरत्ना का जवाब

वकील की दलील पर जस्टिस बी वी नागरत्ना ने तुरंत जवाब दिया। उन्होंने कहा कि इसीलिए हिंदू धर्म को जीवन जीने का तरीका कहा जाता है। किसी हिंदू के लिए मंदिर जाना या धार्मिक अनुष्ठान करना जरूरी नहीं है। हर व्यक्ति अपनी आस्था अपने तरीके से जता सकता है। किसी को भी उसकी श्रद्धा में रुकावट डालने का अधिकार नहीं है।



यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है। इससे यह साफ होता है कि धर्म के पालन का कोई एक तय तरीका नहीं होता।



'झोपड़ी में दीपक भी है आस्था का सबूत'

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने भी इस बात पर अपनी राय रखी। उन्होंने कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपनी छोटी सी झोपड़ी में भी दीपक जलाता है तो यह उसके धर्म को साबित करने के लिए पर्याप्त है। यह बात बेहद सादे लेकिन गहरे मायनों वाली है। इसमें यह संदेश छिपा है कि धर्म मंदिरों की दीवारों में नहीं, बल्कि हर घर के दिल में बसता है।



यह टिप्पणी उन लाखों गरीब और साधारण लोगों के लिए भी राहत की बात है जो महंगे अनुष्ठानों या तीर्थयात्रा का खर्च नहीं उठा सकते।



हर धार्मिक मामले पर याचिका नहीं

इससे पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने एक जरूरी बात कही थी। कोर्ट ने कहा था कि अगर लोग संवैधानिक अदालत के सामने हर धार्मिक प्रथा पर सवाल उठाने लगें तो सैकड़ों याचिकाएं दायर होंगी। इससे हर धर्म टूट जाएगा। यह टिप्पणी अदालत के उस रुख को दर्शाती है जहां वह धार्मिक मामलों में बहुत सोच-समझकर दखल देना चाहती है।



क्या है सबरीमाला विवाद

केरल का सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। यह हिंदुओं के सबसे प्रमुख तीर्थस्थलों में से एक है। यहां परंपरागत रूप से 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। इसके पीछे तर्क दिया जाता था कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रतिबंध को असंवैधानिक करार दिया था। उस फैसले ने पूरे देश में एक बड़ी बहस छेड़ दी थी। अब नौ जजों की पीठ इस पर और बड़े पहलुओं की भी जांच कर रही है।



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धर्म और कानून का नाजुक संतुलन

यह मामला सिर्फ एक मंदिर का नहीं है। यह भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 से जुड़ा है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की आजादी देता है। अनुच्छेद 26 धार्मिक संस्थाओं को अपने मामलों के प्रबंधन का अधिकार देता है। इन दोनों के बीच संतुलन बिठाना ही इस मामले की सबसे बड़ी चुनौती है।



नौ जजों की संविधान पीठ का यह फैसला आने वा ले समय में देश की धार्मिक-कानूनी व्यवस्था को एक नई दिशा दे सकता है।



यह खबर क्यों जरूरी है?

यह खबर इसलिए अहम है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की यह टिप्पणी भारत के करोड़ों नागरिकों की धार्मिक पहचान और स्वतंत्रता से सीधे जुड़ी है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 हर व्यक्ति को अपनी आस्था के अनुसार जीने का अधिकार देता है। जब सुप्रीम कोर्ट कहता है कि मंदिर जाना या अनुष्ठान करना हिंदू होने की अनिवार्य शर्त नहीं है तो यह उस व्यापक भारतीय परंपरा की पुष्टि है जो विविधता को सम्मान देती है। यह उन लाखों लोगों के लिए भी एक बड़ी बात है जो सामाजिक या आर्थिक कारणों से मंदिर नहीं जा पाते लेकिन खुद को गहरे आस्थावान मानते हैं। डिजिटल और सामाजिक नैतिकता के नजरिए से देखें तो यह फैसला उस जहरीली सोच को भी चुनौती देता है जो दूसरों की आस्था को कमतर आंकती है। कानूनी तौर पर यह मामला धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संविधानिक नैतिकता के बीच एक बेहद नाजुक और जरूरी संतुलन तलाशता है।



जरूरी FAQ

सुप्रीम कोर्ट ने सबरीमाला मामले में नौ जजों की पीठ क्यों बनाई?



2018 में पांच जजों की संविधान पीठ ने सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक को 4-1 के बहुमत से असंवैधानिक करार दिया था। उस फैसले के बाद विभिन्न पक्षों ने पुनर्विचार याचिकाएं दायर कीं। इस पर विचार करते हुए पांच जजों की पीठ ने माना कि इस मामले में धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संविधानिक नैतिकता जैसे बड़े और पेचीदे सवाल उठते हैं। इसलिए इसे नौ जजों की बड़ी संविधान पीठ को सौंपा गया ताकि इन सवालों पर व्यापक और अधिकृत राय आ सके।



क्या सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी का मतलब है कि मंदिर जाना गलत है?



नहीं, बिल्कुल नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं कहा कि मंदिर जाना गलत है या इसे बंद किया जाए। कोर्ट ने सिर्फ यह स्पष्ट किया है कि मंदिर जाना या कोई खास अनुष्ठान करना किसी व्यक्ति के हिंदू होने की अनिवार्य शर्त नहीं है। हिंदू धर्म की विविधता और व्यापकता ऐसी है कि हर व्यक्ति अपनी आस्था अपने तरीके से व्यक्त कर सकता है। जस्टिस नागरत्ना ने इसीलिए कहा कि इसे जीवन जीने का तरीका कहा जाता है।



सबरीमाला मंदिर विवाद क्या है और यह महिलाओं से कैसे जुड़ा है?



केरल का सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। यहां पारंपरिक रूप से 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। धार्मिक मान्यता थी कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं इसलिए इस आयु वर्ग की महिलाएं मंदिर नहीं जा सकतीं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने इस प्रतिबंध को महिलाओं के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताते हुए असंवैधानिक करार दिया। इसके बाद यह मामला बड़े पैमाने पर विवादित हो गया। अब नौ जजों की पीठ इस पर और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े व्यापक सवालों की सुनवाई कर रही है।



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