जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त: CJI बोले- विरोध का अधिकार है, लेकिन हमेशा कब्जे का नहीं

Amresh Kushwaha | Nov 03, 2026, 17:02 IST
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन को लेकर सुनवाई के दौरान CJI ने कहा कि किसी को भी प्रदर्शन स्थल पर हमेशा कब्जा करने का अधिकार नहीं है।
During the hearing regarding the protest at Jantar Mantar, the CJI stated that no one has the right to occupy a protest site indefinitely.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन, पुलिस की कार्रवाई और व्यापारियों को हो रहे नुकसान से जुड़े मामलों पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान चीफ जस्टिस (CJI) ने कहा कि सभी को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन कोई भी व्यक्ति या संगठन किसी प्रदर्शन स्थल पर हमेशा के लिए कब्जा नहीं कर सकता।

कोर्ट ने कहा कि प्रदर्शन के अधिकार के साथ आम लोगों के कारोबार और रोजी-रोटी का भी ध्यान रखना जरूरी है। सुनवाई के दौरान राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अखिलेश यादव से जुड़े मामलों पर भी चर्चा हुई। अदालत ने केंद्र सरकार और संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया है। अब अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।



प्रदर्शन से व्यापारियों को नुकसान, कोर्ट में उठा मुद्दा

सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने प्रदर्शन के कारण व्यापारियों को हो रही परेशानी का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि धरना-प्रदर्शन के चलते दिल्ली के बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही कम हो रही है।



त्योहारों के समय इसका असर छोटे दुकानदारों और कारोबारियों की कमाई पर पड़ रहा है। उन्होंने आशंका जताई कि व्यापारियों को हजारों करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता है। रोहतगी ने सवाल किया कि इस नुकसान की जिम्मेदारी कौन लेगा?



इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लोगों को विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है, लेकिन व्यापारियों को कारोबार करने का भी अधिकार है। खासकर उन लोगों की रोजी-रोटी का ध्यान रखना जरूरी है, जो रोज कमाकर परिवार चलाते हैं।



जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि प्रदर्शन की भी अपनी एक अर्थव्यवस्था होती है। वहीं, याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि लगभग हर प्रदर्शन स्थल के आसपास बाजार होते हैं। इसलिए केवल बाजार होने के आधार पर प्रदर्शन पर रोक नहीं लगाई जा सकती।



CJI बोले- प्रदर्शन स्थल पर हमेशा के लिए नहीं बैठ सकते

चीफ जस्टिस ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसी भी तय प्रदर्शन स्थल पर कोई संगठन हमेशा के लिए नहीं बैठ सकता। उन्होंने सवाल किया कि यदि किसान, वकील या दूसरे संगठन भी प्रदर्शन करना चाहें तो उन्हें जगह कहां मिलेगी?



CJI ने कहा कि सभी को Protest करने का अधिकार है। लेकिन कोई यह दावा नहीं कर सकता कि एक जगह पर सिर्फ उसी का अधिकार है और वहां दूसरा कोई प्रदर्शन नहीं कर सकता।



अदालत ने कहा कि निर्धारित प्रदर्शन स्थलों पर एक तय समय तक ही धरने की अनुमति होनी चाहिए।



संसद की ओर मार्च करने पर भी उठे सवाल

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों को केवल एक दिन के लिए धरना देने की अनुमति मिली थी। उनके मुताबिक, इसके बाद भी प्रदर्शनकारियों ने जगह खाली नहीं की और संसद की ओर मार्च किया।



मेहता ने कहा कि संसद देश की संप्रभुता का प्रतीक है। इसलिए वहां तक मार्च करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने पर भी सवाल उठाए।



फेस रिकग्निशन तकनीक पर कोर्ट में बहस

सुनवाई में प्रदर्शनकारियों की पहचान के लिए दिल्ली पुलिस द्वारा Face Recognition तकनीक के इस्तेमाल का मामला भी सामने आया। वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने सवाल किया कि पुलिस किस कानून के तहत प्रदर्शन करने वाले लोगों की निगरानी कर रही है।



इस पर तुषार मेहता ने कहा कि जब कोई व्यक्ति सार्वजनिक जगह पर प्रदर्शन कर रहा है तो वहां निजता का सवाल कैसे उठ सकता है? जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि इस तकनीक का इस्तेमाल सोच-समझकर और उचित तरीके से किया जाना चाहिए।



महिला पत्रकारों और पुलिसकर्मियों से बदसलूकी का मामला

कोर्ट में प्रदर्शन के दौरान महिला पत्रकारों और महिला पुलिसकर्मियों के साथ कथित बदसलूकी का मुद्दा भी उठाया गया। तुषार मेहता ने महिला पुलिस अधिकारियों के साथ अभद्र व्यवहार और छेड़छाड़ की घटनाओं का जिक्र किया।



वहीं, वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया ने आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च के दौरान राहुल गांधी ने एक महिला पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की की थी।



इस आरोप पर राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने आपत्ति जताई। कोर्ट ने पत्रकारों से जुड़े मामले को दूसरी याचिका के साथ जोड़ दिया है। हालांकि, महिला पत्रकारों के कथित उत्पीड़न के मामले पर अलग से सुनवाई होगी।



राहुल गांधी, खरगे और अखिलेश यादव को नोटिस

विपक्षी नेताओं के संसद और सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालने से जुड़े मामले पर भी सुनवाई हुई। चार वकीलों की ओर से दाखिल याचिका में आरोप लगाया गया है कि विपक्षी नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकालकर न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश की।



इस याचिका में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे, अखिलेश यादव, कांग्रेस और अन्य संबंधित पक्षों को प्रतिवादी बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और निजी प्रतिवादियों को नोटिस जारी कर 18 नवंबर तक जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है।



9 श्रेणियों में होगी मामलों की सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि प्रदर्शन से जुड़े मामलों को नौ अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर सुना जाएगा। इससे हर मुद्दे पर अलग से विचार किया जा सकेगा। व्यापारियों के अधिकारों से जुड़ी याचिका पर भी केंद्र सरकार को Notice जारी किया गया है। साथ ही याचिकाकर्ताओं को प्रदर्शन के आयोजकों को भी मामले में पक्षकार बनाने की अनुमति दी गई है।



अब इन मामलों की अगली सुनवाई 23 नवंबर को होगी।



सुप्रीम कोर्ट के सामने मुख्य सवाल यह है कि लोगों के विरोध प्रदर्शन करने के अधिकार और आम नागरिकों के कारोबार व रोजी-रोटी के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।

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