आपसी सहमति से तय तलाक पर सहमति बदलने की नहीं होगी इजाजत: सुप्रीम कोर्ट
News in Short
- सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक में सहमति वापस लेने को अनुचित बताया।
- मामला 2000 में हुई शादी से जुड़ा था, जिसमें 2023 में पति ने तलाक की याचिका दायर की।
- पत्नी ने बाद में सहमति से मुकरकर घरेलू हिंसा का आरोप लगाया।
- सुप्रीम कोर्ट ने समझौते को मध्यस्थता दुरुपयोग करार दिया और तलाक दे दिया।
- कोर्ट ने पति को बकाया राशि चुकाने और पत्नी पर भारी लागत का आदेश दिया।
News in Detail
सुप्रीम कोर्ट ने आपसी सहमति से तलाक के मामलों में महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने कहा कि जब पति-पत्नी मध्यस्थता से सभी विवादों का समाधान कर लेते हैं, तो कोई भी पक्ष बाद में अपनी सहमति वापस नहीं ले सकता। यह फैसला उस मामले में सुनाया गया, जिसमें पत्नी ने पति को 1.5 करोड़ रुपए, 14 लाख रुपए की कार और कुछ जेवर देने पर सहमति जताई थी, लेकिन बाद में वह अपनी सहमति से मुकर गई थी।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला 2000 में हुई शादी से शुरू हुआ। 2023 में पति ने तलाक की याचिका दायर की। फैमिली कोर्ट ने मामले को मध्यस्थता के लिए भेजा। दोनों पक्षों ने समझौता किया। पति ने पत्नी को 1.5 करोड़ रुपए दो किस्तों में देने पर सहमति जताई। इसके साथ 14 लाख रुपए की कार और कुछ जेवर देने का भी वादा किया। पत्नी ने बदले में 2.5 करोड़ रुपए पति को ट्रांसफर करने पर राजी हुई।
पत्नी ने क्यों बदला फैसला?
शादी के टूटने के दौरान, पत्नी ने सहमति वापस ले ली। उसने घरेलू हिंसा कानून के तहत शिकायत दर्ज कराई। पत्नी का कहना था कि पति ने 120 करोड़ रुपए के जेवर और 50 करोड़ रुपए के सोने के बिस्किट देने का वादा किया था। यह वादा लिखित समझौते में शामिल नहीं किया गया। पति ने इसका विरोध किया और मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क
सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court ) ने कहा कि आपसी सहमति से तलाक में कोई भी पक्ष सामान्य रूप से अंतिम डिक्री से पहले अपनी सहमति वापस ले सकता है। लेकिन जब समझौता मध्यस्थ द्वारा प्रमाणित और अदालत द्वारा स्वीकार किया जाता है, तो उस पर पीछे हटना न्यायिक प्रक्रिया और मध्यस्थता व्यवस्था पर चोट है। अदालत ने पत्नी की घरेलू हिंसा शिकायत को आफ्टरथॉट करार दिया, क्योंकि 23 साल की शादी में कोई आरोप नहीं थे।
अदालत का आदेश
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 142 के तहत शादी को तलाक दे दिया और घरेलू हिंसा के मामले रद कर दिए। अदालत ने पति को बकाया राशि चुकाने का आदेश भी दिया और पत्नी पर भारी लागत का भी आदेश जारी किया। कोर्ट ने कहा कि समझौते से पीछे हटने को मध्यस्थता के दुरुपयोग के रूप में देखा जाएगा।
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