शादी से पहले संबंध बनाना खराब चरित्र का सबूत नहीं: सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
समझें क्या है पूरा मामला
- शादी से पहले शारीरिक संबंध अब चरित्र का मापदंड नहीं।
- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला,फरियादी की पुलिस भर्ती बहाल।
- सहमति का रिश्ता अपराध नहीं, कोर्ट की नई गाईडलाइन।
- टूटा रिश्ता धोखा नहीं, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी नसीहत।
- कानून नैतिक पहरेदार नहीं, कोर्ट ने खींची लक्ष्मण रेखा।
समझें क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि शादी से पहले सहमति से बने संबंध किसी के खराब चरित्र का सबूत नहीं हैं। तेलंगाना पुलिस भर्ती बोर्ड ने एक उम्मीदवार की नौकरी एक पुराने आपराधिक मामले की वजह से रद्द कर दी थी। यह मामला एक ऐसे रिश्ते से जुड़ा था जो शादी में नहीं बदला। कोर्ट ने कहा कि हर असफल रिश्ता धोखा नहीं होता। साथ ही कोर्ट ने उम्मीदवार की नियुक्ति पर फिर से विचार करने का आदेश दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों दिया यह फैसला
गजुल थिरुपति नाम के युवक ने तेलंगाना पुलिस में कांस्टेबल की नौकरी के लिए आवेदन किया था। चयन हो गया लेकिन भर्ती बोर्ड ने उसे अयोग्य घोषित कर दिया।
कारण था एक पुराना आपराधिक मामला। एक महिला ने आरोप लगाया था कि उसने शादी का वादा करके कई साल तक संबंध बनाए रखे और फिर किसी और से शादी कर ली।
लोक अदालत में हुआ था समझौता
2015 में दोनों पक्षों के बीच लोक अदालत में समझौता हो गया। केस वहीं खत्म हो गया। इसके बावजूद भर्ती बोर्ड ने कहा कि यह नैतिक पतन वाला अपराध है। इसलिए वह पुलिस बल के लिए उचित नहीं है।
भर्ती बोर्ड का तर्क कोर्ट ने खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस मनमोहन शामिल थे। उन्होंने उम्मीदवार की अपील मंजूर कर ली। कोर्ट ने पाया कि उम्मीदवार ने अपने सत्यापन फॉर्म में मामले की पूरी जानकारी ईमानदारी से दी थी। उस पर कुछ छिपाने का कोई आरोप नहीं था।
समझौता मतलब गलती मानना नहीं
भर्ती बोर्ड ने कहा था कि लोक अदालत में समझौते का मतलब है कि उम्मीदवार ने अपनी गलती मान ली। सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को पूरी तरह गलत बताया। कोर्ट ने कहा कि हर समझौता दोष स्वीकार करना नहीं होता। खासकर जब दोनों पक्ष खुद आगे बढ़ने का फैसला कर चुके हों।
बदलते समाज को भी कोर्ट ने माना
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आज के समय में शादी से पहले ऐसे रिश्ते आम हैं। केवल इस आधार पर किसी के चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसा कोई कानून नहीं है जो दो बालिगों को आपसी सहमति से रिश्ता बनाने से रोकता हो।
रिश्ते का टूटना धोखा नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हर रिश्ते का अंत शादी में नहीं होता। इसलिए रिश्ते का न टिकना अपने आप में धोखा नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि मानवीय रिश्ते जटिल होते हैं। हर असफल रिश्ता किसी अपराध का नतीजा नहीं होता।
हाईकोर्ट के सिंगल जज का आदेश बहाल
तेलंगाना हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने भर्ती रद्द करने के फैसले को सही माना था। सुप्रीम कोर्ट ने उस आदेश को पलट दिया। इसके बजाय हाईकोर्ट के सिंगल जज का पुराना आदेश लागू कर दिया गया। उस आदेश में अधिकारियों को उम्मीदवार की नियुक्ति पर फिर से विचार करने को कहा गया था।
इस मामले की खास बात क्या है
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को पुराने उन मामलों से अलग बताया जिनमें हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने के आरोप थे। यह मामला पूरी तरह दो बालिगों के निजी रिश्ते से जुड़ा था। शिकायतकर्ता ने खुद आगे आरोप न लगाने का फैसला किया था।
कानून नैतिक पहरेदार नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में एक बड़ी बात कही। कोर्ट ने कहा कि कानून का काम नैतिक पहरेदारी करना नहीं बल्कि न्याय देना है। दो बालिगों के सहमति वाले निजी रिश्तों को अपराध की श्रेणी में रखना न्यायसंगत नहीं है। यह संवैधानिक मूल्यों के भी खिलाफ है।
FAQ
- क्या शादी से पहले संबंध बनाना भारत में कानूनी है?
हां, दो बालिग व्यक्तियों के बीच आपसी सहमति से बने संबंध भारतीय कानून के तहत अपराध नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी स्पष्ट किया है कि ऐसा कोई कानून नहीं जो इसे रोकता हो। इसलिए इसे नैतिक पतन का अपराध नहीं माना जा सकता। - लोक अदालत में समझौते का क्या मतलब होता है?
लोक अदालत में समझौता दोनों पक्षों की सहमति से होता है और इसे दोष स्वीकार करना नहीं माना जाता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खासकर निजी रिश्तों के मामलों में समझौते का मतलब गलती मानना नहीं है। यह केवल दोनों पक्षों का आगे बढ़ने का फैसला होता है।
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