सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: बिना पर्यावरण मंजूरी शुरू नहीं होगी कोई परियोजना
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण संरक्षण को लेकर बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ कहा है कि किसी भी परियोजना को शुरू करने से पहले पूर्व पर्यावरण मंजूरी (Prior Environmental Clearance) लेना जरूरी होगा। बिना मंजूरी काम शुरू करने के बाद अनुमति लेने की व्यवस्था स्वीकार नहीं की जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने अपने फैसले में कहा कि विकास जरूरी है। लेकिन विकास के नाम पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता है। अदालत ने कहा कि प्रकृति की सुरक्षा और विकास के बीच संतुलन बनाना जरूरी है।
इस मामले में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई की। पीठ में जस्टिस जॉयमलया बागची और जस्टिस विपुल एम. पंचोली भी शामिल थे।
"पहले काम फिर मंजूरी" वाली व्यवस्था पर रोक
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कई बार कंपनियां या परियोजना संचालक पहले निर्माण शुरू कर देते हैं। इसके बाद पर्यावरण मंजूरी के लिए आवेदन करते हैं। अदालत ने इस प्रक्रिया को गलत बताया है।
कोर्ट ने कहा कि पर्यावरण मंजूरी का उद्देश्य किसी परियोजना से होने वाले नुकसान का पहले आकलन करना है। अगर काम शुरू होने के बाद मंजूरी दी जाएगी तो पर्यावरण प्रभाव का सही मूल्यांकन नहीं हो पाएगा।
अदालत ने कहा कि Environmental Clearance केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं है। यह पर्यावरण सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
2017 की अधिसूचना को माना वैध
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की 14 मार्च 2017 की अधिसूचना को सही माना है। कोर्ट के अनुसार यह अधिसूचना पहले नियमों का उल्लंघन कर चुकी परियोजनाओं के लिए सीमित राहत थी।
अदालत ने कहा कि इस तरह की राहत को स्थायी व्यवस्था नहीं बनाया जा सकता। अगर बार-बार नियम तोड़ने के बाद मंजूरी मिलने लगेगी तो पर्यावरण कानून कमजोर होगा।
कोर्ट ने साफ किया कि पर्यावरण कानूनों का पालन करना हर परियोजना की जिम्मेदारी है।
2021 के ऑफिस मेमोरेंडम को किया रद्द
सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण मंत्रालय के 7 जुलाई 2021 के ऑफिस मेमोरेंडम (OM) को भी रद्द कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था बिना समय सीमा के नियम तोड़ने वालों को राहत दे सकती थी।
कोर्ट के अनुसार यह व्यवस्था ऐसी स्थिति बना सकती थी जिसमें लोग पहले कानून तोड़ते और बाद में मंजूरी लेने की कोशिश करते।
अदालत ने कहा कि यह पर्यावरण प्रभाव आकलन (EIA) अधिसूचना 2006 की मूल भावना के खिलाफ है।
पुराने मामलों पर नहीं पड़ेगा सीधा असर
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि पहले से दी गई पर्यावरण मंजूरियां अपने आप रद्द नहीं होंगी।
इस फैसले का असर मुख्य रूप से भविष्य में शुरू होने वाली परियोजनाओं पर लागू होगा। यानी अब नई परियोजनाओं को शुरुआत से पहले सभी पर्यावरण नियमों का पालन करना होगा।
यह फैसला उद्योगों, खनन परियोजनाओं, निर्माण कार्यों और बड़े विकास प्रोजेक्ट के लिए काफी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
पर्यावरण नुकसान की भरपाई करनी होगी
सुप्रीम कोर्ट ने Polluter Pays Principle यानी प्रदूषण फैलाने वाला भुगतान करेगा के सिद्धांत को भी दोहराया।
अदालत ने कहा कि नियम तोड़ने वाली परियोजनाओं से पर्यावरण क्षतिपूर्ति वसूली जा सकती है। इसके साथ ही पर्यावरण सुधार की लागत भी संबंधित पक्षों से ली जा सकती है।
कोर्ट ने माना कि अगर नियम तोड़ने वालों को फायदा मिलता रहेगा तो कानून का पालन करने वालों के साथ अन्याय होगा।
विकास और पर्यावरण में संतुलन जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में महात्मा गांधी के विचारों का भी उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि दुनिया में जरूरत पूरी करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं लेकिन लालच पूरा करने के लिए नहीं।
कोर्ट ने कहा कि विकास जरूरी है लेकिन इसकी कीमत प्रकृति को नुकसान पहुंचाकर नहीं चुकाई जा सकती।
यह फैसला भारत में पर्यावरण कानूनों को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। इससे आने वाले समय में परियोजनाओं की मंजूरी प्रक्रिया और ज्यादा सख्त हो सकती है।
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