सुप्रीम कोर्ट ने वोटिंग को अनिवार्य बनाने की मांग वाली याचिका की खारिज, जानें क्या बोले CJI
News in Short
- सुप्रीम कोर्ट ने वोटिंग अनिवार्य बनाने की याचिका खारिज की।
- CJI ने कहा कि लोकतंत्र को कानूनी दबाव से नहीं, जन जागरूकता से मजबूत किया जा सकता है।
- यह मामला चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में है, न्यायपालिका का नहीं।
- बेंच ने समाज के वंचित वर्ग की चिंता जताई, खासकर गरीबों के बारे में।
- कोर्ट ने कहा कि चुनाव के दौरान कई नागरिकों को काम छोड़ना पड़ता हैं।
News in Detail
भारत में चुनावों में वोटिंग अनिवार्य करने की मांग फिर उठी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि वोट डालना नीतिगत मामला है। यह निर्णय न्यायपालिका के दायरे में नहीं आता। याचिका उन लोगों ने दायर की थी, जो जान-बूझकर वोट न देने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई चाहते थे।
सुप्रीम कोर्ट का रुख
सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस याचिका को खारिज कर दिया। चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस विपुल पंचोली की बेंच ने सुनवाई की। बेंच ने याचिकाकर्ता अजय गोयल से कहा कि वे अपनी शिकायतें संबंधित पक्षों से साझा करें, अदालत में न लाएं। CJI ने कहा कि लोकतंत्र में वोटिंग अनिवार्य नहीं हो सकती। यह केवल जन जागरूकता से संभव है।
क्या कहा CJI ने?
CJI ने कहा कि लोकतंत्र को कानूनी दबाव से नहीं, बल्कि जन जागरूकता से मजबूत किया जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि इस मामले में किसी को मजबूर नहीं किया जा सकता। एक देश जहां 75 सालों में लोकतंत्र को मजबूत किया गया है, वहां हर नागरिक का दायित्व है कि वह वोट डाले। लेकिन यह चुनाव आयोग और सरकारी नीति पर निर्भर नहीं है।
चुनाव के दौरान परेशानियां !
सुप्रीम कोर्ट ने मतदान को अनिवार्य बनाने से जुड़ी व्यावहारिक समस्याओं पर विचार किया। बेंच ने कहा कि चुनाव के दौरान कई नागरिकों को कार्यरत रहना पड़ता है। CJI ने बताया कि इस नियम के लागू होने से अधिकारियों और न्यायधीशों को काम छोड़ना पड़ता।
समाज के वंचित वर्ग की चिंता
बेंच ने समाज के वंचित वर्ग की चिंता जताई। CJI ने गरीबों के बारे में सवाल किया, जो दिहाड़ी पर काम करते हैं। उन्होंने पूछा, अगर कोई गरीब अपने परिवार की देखभाल के लिए काम कर रहा हो, तो उसे कैसे मजबूर किया जा सकता है?
सरकार की नीति का दायरा
सुप्रीम कोर्ट ने इसे नीतिगत मामला माना। कोर्ट ने कहा कि यह चुनाव आयोग के अधिकार क्षेत्र में है। न्यायालय ने कहा कि यदि चुनाव आयोग निर्णय लेता है, तो उसे नीति निर्धारण करना चाहिए।
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