आंदोलन के नाम पर लाठीचार्ज नहीं कर सकती पुलिस, छात्र प्रदर्शन पर सुप्रीम कोर्ट सख्त

Aman Vaishnav | Jul 27, 2026, 13:21 IST
छात्रों के हक में सुप्रीं कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने छात्र आंदोलनों में पुलिस लाठीचार्ज पर सख्त टिप्पणी की है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ आंदोलन या प्रदर्शन होने के आधार पर पुलिस लाठीचार्ज नहीं कर सकती है।

समझें क्या है पूरा मामला...

  • सुप्रीम कोर्ट ने छात्र आंदोलनों में पुलिस बल प्रयोग पर सख्त टिप्पणी की।
  • कोर्ट ने कहा सिर्फ प्रदर्शन होने पर लाठीचार्ज नहीं हो सकता है।
  • CJI सूर्यकांत की बेंच के सामने कई याचिकाएं मेंशन हुईं।
  • सिवान में प्रदर्शनकारियों पर AK-47 इस्तेमाल का आरोप लगा है।
  • कोर्ट में सबूत सुरक्षित रखने की मांग वाली PIL भी दाखिल हुई।

पुलिस कार्रवाई पर सख्त टिप्पणी

देश के अलग अलग हिस्सों में छात्र आंदोलनों के दौरान पुलिस की सख्ती को लेकर विवाद बढ़ता जा रहा है। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मुद्दे पर कड़ी टिप्पणी की।



कोर्ट ने साफ कहा कि सिर्फ आंदोलन होने के आधार पर पुलिस लाठीचार्ज नहीं कर सकती है। यह टिप्पणी उस वक्त आई जब प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग से जुड़ी कई याचिकाओं का जिक्र अदालत के सामने हुआ।



भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले को गंभीरता से सुना। पीठ के सामने यह मुद्दा मेंशनिंग के जरिए रखा गया।



मेंशनिंग का मतलब होता है कि वकील किसी अत्यावश्यक मामले को कोर्ट के सामने तुरंत सुनवाई के लिए रखते हैं। इस दौरान कई याचिकाओं का हवाला दिया गया।



छात्रों ने लगाए मारपीट के आरोप

इन याचिकाओं में एक याचिका छात्रों के एक समूह ने दाखिल की है। इन छात्रों का आरोप है कि प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने उनके साथ मारपीट की।



छात्रों का कहना है कि उन्होंने शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखी थी। इसके बावजूद पुलिस ने उन पर बल प्रयोग किया। इस याचिका ने पूरे मामले को और गंभीर बना दिया है।



सिवान में AK-47 इस्तेमाल का आरोप

एक और याचिका में चौंकाने वाला आरोप लगाया गया है। इस याचिका के मुताबिक बिहार के सिवान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ AK 47राइफलों का इस्तेमाल हुआ।



यह आरोप बेहद गंभीर माना जा रहा है। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस की ओर से अंधाधुंध या जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग के आरोपों की जांच जरूरी है।



कोर्ट ने यह भी कहा कि यह जांच स्वतंत्र एजेंसी से होनी चाहिए। कोर्ट का मानना है कि निष्पक्ष जांच से ही सच्चाई सामने आ सकती है।



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जंतर-मंतर मामले की चिट्ठी और अब PIL

इस पूरे विवाद की एक कड़ी जंतर-मंतर से भी जुड़ी है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हुई पुलिस कार्रवाई को एक वकील ने अन्यायपूर्ण बताया था।



इस वकील ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को चिट्ठी लिखकर हाई लेवल जांच की मांग की थी। यह चिट्ठी तीन दिन पहले भेजी गई थी। लेकिन चीफ जस्टिस ने उस पर कोई संज्ञान नहीं लिया।



अब उसी वकील ने इस मुद्दे पर जनहित याचिका (PIL) दाखिल की है। यह कदम दिखाता है कि मामला अब सिर्फ चिट्ठी तक सीमित नहीं रहा। वकील ने अदालत का रुख करके इसे कानूनी लड़ाई का रूप दे दिया है।



सबूत सुरक्षित रखने की बड़ी मांग

सुप्रीम कोर्ट में दाखिल यह जनहित याचिका याचिकाकर्ता प्रिया मिश्रा की ओर से लगाई गई है। इसे अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा ने दाखिल किया है।



याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट रिट ऑफ मैंडेमस (Writ of Mandamus) जारी करे। रिट ऑफ मैंडेमस एक तरह का अदालती आदेश होता है। इसके जरिए प्रतिवादियों को कोई खास काम करने का निर्देश दिया जाता है।



याचिका में मांग है कि सभी घटनाओं से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल सबूत तुरंत सुरक्षित रखे जाएं। इनमें सीसीटीवी फुटेज, बॉडी वॉर्न कैमरा फुटेज और ड्रोन फुटेज शामिल हैं।



इसके अलावा मोबाइल रिकॉर्डिंग, सोशल मीडिया वीडियो और पुलिस के वायरलेस रिकॉर्ड भी शामिल हैं। कॉल लॉग, कंट्रोल रूम रिकॉर्ड, तैनाती के आदेश और जीपीएस रिकॉर्ड को भी सुरक्षित रखने की मांग की गई है।



याचिका में यह आशंका जताई गई है कि इन सबूतों को नष्ट किया जा सकता है। इन्हें बदला जाने या इनके साथ छेड़छाड़ होने का डर भी जताया गया है।





इसलिए मांग है कि सबूतों को दबाने या गुम करने से बचाया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित हो कि सभी सबूत सही जांच अधिकारी के सामने पेश हों।



FIR और निष्पक्ष जांच की मांग

याचिका में एक और अहम मांग की गई है। इसमें कहा गया है कि जहां भी उपलब्ध सबूतों से कोई संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) होता दिखे, वहां तुरंत FIR दर्ज हो।



यह मांग किसी भी व्यक्ति, पुलिस अधिकारी, लोक सेवक या सुरक्षाकर्मी पर लागू होनी चाहिए। याचिका में कहा गया है कि संविधान और मौजूदा कानूनों के मुताबिक ही कार्रवाई हो।



साथ ही जांच निष्पक्ष, स्वतंत्र और समयबद्ध होनी चाहिए। इस पूरे मामले पर आगे सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी बाकी है।



यह खबर क्यों जरूरी है

यह मामला सीधे तौर पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा है। संविधान का अनुच्छेद 19 (Article 19) शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार देता है। अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है।



वहीं अगर पुलिस बिना ठोस वजह बल प्रयोग करती है तो यह इन अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है। सबूत सुरक्षित रखने की मांग पारदर्शी जांच के लिए जरूरी है।



यह खबर आम नागरिकों को उनके अधिकारों और कानूनी सुरक्षा के बारे में जागरूक करती है। इसलिए यह मामला हर नागरिक के लिए जानना जरूरी है।



FAQ

  1. सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस कार्रवाई पर क्या कहा है
    सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सिर्फ आंदोलन होने के आधार पर लाठीचार्ज नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने पुलिस की अत्यधिक बल प्रयोग की शिकायतों पर स्वतंत्र जांच की जरूरत बताई है।
  2. सिवान मामले में क्या आरोप लगा है
    एक याचिका में आरोप लगाया गया है कि बिहार के सिवान में प्रदर्शनकारियों के खिलाफ AK-47 राइफलों का इस्तेमाल किया गया। इस आरोप की जांच की मांग की गई है।
  3. सुप्रीम कोर्ट में दाखिल PIL में क्या मांगा गया है
    PIL में मांग की गई है कि घटनाओं से जुड़े सभी इलेक्ट्रॉनिक सबूत सुरक्षित रखे जाएं। साथ ही संज्ञेय अपराध की स्थिति में तुरंत FIR दर्ज कर निष्पक्ष जांच शुरू की जाए।

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