सड़क हादसों में हर साल 1.77 लाख मौतें, फिर भी देश में लाइफ-सेविंग इंतजाम का बुरा हाल
समझें क्या है पूरा मामला
- भारत में हर साल सड़क हादसों में करीब 1.77 लाख लोगों की जान चली जाती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने मई 2026 में पांच जरूरी ट्रॉमा सुविधाओं के आदेश दिए थे।
- हेल्पलाइन, GPS एंबुलेंस और गुड सेमेरिटन कानून इनमें प्रमुख इंतजाम हैं।
- 34 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों ने सुप्रीम कोर्ट में रिपोर्ट सौंपी।
- एक भी राज्य अब तक सभी पांच जरूरी ट्रॉमा इंतजाम पूरी तरह लागू नहीं कर पाया।
हर साल 1.77 लाख मौतें, पर व्यवस्था जीरो
सड़क हादसों में भारत की स्थिति दुनिया में सबसे खराब है। हर साल 1.77 लाख लोग जान गंवाते हैं। इनमें से कम से कम 30 फीसदी मौतें सिर्फ इसलिए होती हैं क्योंकि समय पर इलाज नहीं मिलता। यह आंकड़ा नीति आयोग और एम्स की 2021 की रिपोर्ट में सामने आया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इसी को गंभीरता से लिया। दिल्ली की संस्था सेवलाइफ फाउंडेशन की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 26 मई 2026 को सभी राज्यों को 9 इंतजाम करने के आदेश दिए। इनमें से 5 सबसे जरूरी थे।
सुप्रीम कोर्ट ने मांगे थे ये 5 इंतजाम
पहला - एक साझा आपातकालीन नंबर। देश में 2019 में केंद्र सरकार ने 112 नंबर लॉन्च किया था ताकि पुलिस, एंबुलेंस, फायर - सभी एक नंबर पर मिलें। लेकिन देश के सबसे ज्यादा सड़क मौतों वाले 8 राज्यों में से 7 ने अभी तक सभी नंबरों को 112 में नहीं मिलाया है।
दूसरा - जीपीएस एंबुलेंस। 13 राज्यों में या तो जीपीएस नहीं है या केवल सरकारी एंबुलेंस में है। निजी एंबुलेंस की कोई ट्रैकिंग नहीं होती। 6 राज्यों के पास डैशबोर्ड है लेकिन वह आम लोगों के लिए खुला नहीं है।
तीसरा - गुड सेमेरिटन कानून। सड़क पर घायल की मदद करने वाले को पुलिस और अस्पताल से परेशानी का डर होता है। इसी डर को खत्म करने के लिए 2020 में केंद्र ने गुड सेमेरिटन नियम बनाए। मदद करने वाले को 25 हजार रुपए का इनाम भी है। लेकिन 8 में से केवल 2 राज्यों - महाराष्ट्र और कर्नाटक - के पास इसके लिए शिकायत निवारण प्रणाली है।
चौथा - ट्रॉमा रजिस्ट्री। यह एक डेटाबेस है जो घायल व्यक्ति की पूरी यात्रा ट्रैक करता है - हादसे की जगह से लेकर एंबुलेंस, अस्पताल और डिस्चार्ज तक। 22 राज्यों के पास ट्रॉमा रजिस्ट्री ही नहीं है। 8 में से केवल तमिलनाडु, महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश ने कहा कि उनके पास यह व्यवस्था है।
पांचवां - रेस्क्यू प्रोटोकॉल। हादसे की जगह से घायल को अस्पताल तक ले जाने का तरीका तय होना चाहिए। 17 राज्यों के पास यह प्रोटोकॉल है। कर्नाटक के पास यह भी नहीं है।
गोल्डन ऑवर- जिंदगी और मौत के बीच 60 मिनट
ट्रॉमा केयर में "गोल्डन ऑवर" का मतलब है हादसे के बाद के पहले 60 मिनट। अगर इस दौरान सही इलाज मिल जाए तो जान बच सकती है। अगर नहीं मिला तो मौत लगभग तय है। यही वजह है कि जीपीएस एंबुलेंस, एक नंबर और रेस्क्यू प्रोटोकॉल इतने जरूरी हैं।
MP और राजस्थान की स्थिति
मध्यप्रदेश ने कोर्ट को बताया कि उसने हाल ही में एक व्यापक ट्रॉमा केयर नीति बनाई है। इसमें पुलिस, स्वास्थ्य, सड़क गश्त और सड़क एजेंसियों की जिम्मेदारियां तय की गई हैं। ट्रॉमा रजिस्ट्री होने का दावा भी किया गया है। हालांकि गुड सेमेरिटन के लिए शिकायत व्यवस्था अभी प्रक्रिया में है।
राजस्थान के पास ट्रॉमा केयर रजिस्ट्री का एसओपी (SOP – Standard Operating Procedure) अभी बन रहा है। गुड सेमेरिटन के लिए बिहार की तरह सामान्य शिकायत व्यवस्था का हवाला दिया है।
MP और राजस्थान- 2024 सड़क मौतों के आंकड़े
मध्यप्रदेश में 2024 में 56 हजार 669 सड़क हादसों में 14 हजार 791 लोगों की जान गई- यानी हर रोज औसतन 40 से ज्यादा मौतें। राजस्थान में 2023 में 11 हजार 762 मौतें दर्ज हुईं और 2024 में यह आंकड़ा और बढ़ने का अनुमान है। दोनों राज्य देश के सबसे खतरनाक सड़क हादसा राज्यों में शामिल हैं।
UP-सबसे ज्यादा मौतें, व्यवस्था सबसे पीछे
उत्तरप्रदेश में 2024 में 24,118 सड़क मौतें हुईं - देश की कुल मौतों का 13.61 फीसदी। हर दूसरे हादसे में एक मौत। लेकिन राज्य के पास अभी तक केंद्रीकृत ट्रॉमा रजिस्ट्री नहीं है। डेटा अभी भी मैनुअल रिकॉर्ड पर निर्भर है।
10 साल बाद भी नहीं बदला हाल
सुप्रीम कोर्ट ने 2016 में ही गुड सेमेरिटन के अधिकारों को मान्यता दी थी। 10 साल बाद भी राज्य इसे लागू करने में पीछे हैं। यह सवाल उठाता है कि जब कानून है, नियम हैं, कोर्ट के आदेश हैं - तो फिर इंतजाम क्यों नहीं?
FAQ
- गोल्डन ऑवर क्या होता है और यह सड़क हादसों में क्यों जरूरी है?
गोल्डन ऑवर हादसे के बाद के पहले 60 मिनट होते हैं। इस दौरान सही इलाज मिलने पर जान बचने की संभावना सबसे ज्यादा होती है। देश में 30 फीसदी ट्रॉमा मौतें सिर्फ देरी से इलाज मिलने के कारण होती हैं। - गुड सेमेरिटन कानून क्या है और इससे क्या फायदा होता है?
यह कानून सड़क पर घायल की मदद करने वाले को पुलिस और अस्पताल की परेशानी से बचाता है। 2020 में केंद्र ने नियम बनाए। मदद करने वाले को 25 हजार रुपए का इनाम भी मिल सकता है। लेकिन अधिकांश राज्यों ने इसे अभी तक ठीक से लागू नहीं किया। - ट्रॉमा रजिस्ट्री क्या होती है और यह क्यों जरूरी है?
यह एक डेटाबेस है जो हादसे से लेकर अस्पताल से छुट्टी तक घायल की पूरी जानकारी रखता है। इससे इलाज की गुणवत्ता जांची जा सकती है और नीतियां बेहतर बनाई जा सकती हैं। लेकिन 22 राज्यों के पास यह व्यवस्था ही नहीं है।
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