राम मंदिर चढ़ावा चोरी के बाद जागा देश, QR कोड और डिजिटल गोल्ड से दे रहे दान
समझें क्या है पूरा मामला...
- राम मंदिर में दान की रकम गबन होने के आरोप लगे हैं।
- कर्मचारियों और बिचौलियों पर फर्जी रसीदों से पैसा हड़पने का आरोप है।
- इससे भक्तों का भरोसा हिल गया है।
- इसी वजह से अब कई मंदिर हुंडी छोड़कर डिजिटल तरीका अपना रहे हैं।
- QR कोड, पेमेंट ऐप और किऑस्क से पारदर्शिता बढ़ाई जा रही है।
पीढ़ियों से भक्त मानते आए हैं कि हुंडी में डाला गया पैसा भगवान तक जरूर पहुंचता है। वहीं राम मंदिर से जुड़े ताजा आरोपों ने इस भरोसे को हिला दिया है।
मंदिर के खजाने से करोड़ों रुपए गायब बताए जा रहे हैं। इसी वजह से देशभर के मंदिर अब हुंडी की जगह QR कोड, पेमेंट ऐप और डिजिटल किऑस्क अपना रहे हैं।
दक्षिण भारत से शुरुआत
कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना में ई-हुंडी व्यवस्था पहले से लोकप्रिय है। मंदिर ट्रस्ट बैंकों से जुड़कर दुनियाभर से डिजिटल दान ले रहे हैं।
वृंदावन के बांके बिहारी मंदिर में सुप्रीम कोर्ट की बनाई कमेटी ऑनलाइन दान को बढ़ावा दे रही है। यहां करीब 20 प्रतिशत चढ़ावा अब डिजिटल तरीके से आ रहा है।
स्टार्टअप्स की एंट्री
हर गबन विवाद के बाद फेथ-टेक नाम का नया क्षेत्र चर्चा में आ जाता है। स्वधर्म नाम का स्टार्टअप मंदिर प्रबंधन और पेमेंट सेवाएं देता है।
इसके सह-संस्थापक प्रत्युष अंबुज बताते हैं कि उनका प्लेटफॉर्म 150 से ज्यादा मंदिरों और 250 मंडलों से जुड़ चुका है। इनमें सिद्धिविनायक,जगन्नाथ पुरी मंदिर, काशी विश्वनाथ और परमार्थ निकेतन शामिल हैं।
हाल ही में अमरनाथ यात्रा मार्ग पर भी किऑस्क लगाए गए हैं। यहां तीर्थयात्री एक क्लिक में दान या दर्शन बुकिंग कर सकते हैं। इसका डैशबोर्ड मंदिर ट्रस्ट को हर दान की पूरी जानकारी देता है।
यह यूपीआई की ट्रांजेक्शन आईडी से आगे जाकर पूरा हिसाब रखता है। नकद चढ़ावा भी अब इसी प्लेटफॉर्म पर दर्ज होता है। दानदाताओं को टैक्स सर्टिफिकेट भी अपने आप मिल जाता है।
भीड़भाड़ वाले मंदिरों में भक्तों के लिए दान पेटी तक रुकना मुश्किल होता है। मंदिर परिसर में कई किऑस्क होने से लाइन में खड़े-खड़े ही स्कैन करके दान किया जा सकता है।
अंबुज मानते हैं कि बदलाव की रफ्तार धीमी है, लेकिन ट्रस्टों में जुड़ रहे युवा सदस्य डिजिटलीकरण के लिए ज्यादा खुले हैं। गणपति पूजा जैसे मौकों पर भीड़ लाखों में पहुंचती है।
मुंबई के जीएसबी गणपति मंडल के साथ भी वे मिलकर काम करते हैं। यह भारत का सबसे अमीर गणपति मंडल माना जाता है। पिछले साल डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाने के बाद उनका सालाना चंदा 10 गुना तक बढ़ गया था।
अब सोना भी डिजिटल
दान का डिजिटलीकरण सिर्फ नकदी तक सीमित नहीं है। सोना और अन्य कीमती चढ़ावे भी इसी दायरे में आ रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के अनुमान के मुताबिक भारतीय मंदिरों के पास कुल दो से चार हजार टन सोना है, जो कई देशों के केंद्रीय बैंक भंडार के बराबर है।
बता दें कि राम मंदिर (राम मंदिर चढ़ावा चोरी) मामले में हुई गिरफ्तारियों से कथित तौर पर गायब सोने के गहने बरामद हुए हैं। एक कार्यकर्ता ने पुलिस शिकायत में दावा किया है कि राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान दान की गई 1,250 सोने, चांदी और हीरे की ईंटें गायब हैं।
इसके अलावा पिछले साल केरल के सबरीमाला मंदिर में भी विवाद हुआ था। हाईकोर्ट ने कहा था कि कुछ मूर्तियों से सोने का आवरण हटाए जाने के सबूत मिले हैं।
वहीं माईगोल्ड नाम का फाई-जिटल स्टार्टअप अब मंदिरों को तिजोरी में सोना रखने के झंझट से मुक्त कर रहा है। भक्त गहने या बार देने की बजाय QR कोड स्कैन कर भुगतान करते हैं।
यह रकम सिर्फ 10 रुपए जितनी भी हो सकती है। इतने मूल्य का सोना एमएमटीसी (MMTC – Metals and Minerals Trading Corporation) की तिजोरी में मंदिर के खाते में जमा हो जाता है। जरूरत पड़ने पर इसे भौतिक सोने के रूप में वापस लिया जा सकता है और इसका पूरा वजन बीमित (insured) रहता है।
माईगोल्ड के संस्थापक अमोल बंसल कहते हैं कि मंदिरों में सोने-चांदी का हिसाब आज भी बिखरा और असंगठित है। उनका मकसद हर पैसे की ट्रैकिंग की एक अतिरिक्त पारदर्शी परत जोड़ना है, ताकि किसी एक व्यक्ति की नीयत पर निर्भर न रहना पड़े।
पिछले कुछ महीनों में अमोल बंसल ने तीन मंदिरों में यह व्यवस्था शुरू की है। इनमें खाटू श्याम मंदिर भी शामिल है, जहां 2023 में 250 करोड़ रुपए का सालाना दान आया था।
बंसल कहते हैं कि बड़े ट्रस्टों से बातचीत चल रही है, लेकिन लालफीताशाही एक बड़ी बाधा है। उन्हें उम्मीद है कि राम मंदिर विवाद के बाद ट्रस्ट डिजिटल व्यवस्था की जरूरत बेहतर समझेंगे।
अभी भी सिर्फ 10% दान डिजिटल
अंबुज के अनुमान के मुताबिक देश में होने वाले कुल मंदिर दान में से सिर्फ 10 प्रतिशत ही डिजिटल तरीके से आता है। जबकि भारत दुनिया के कुल डिजिटल लेनदेन का आधा हिस्सा अकेले संभालता है। यह एक बड़ा विरोधाभास है।
टेंपल कनेक्ट के संस्थापक गिरीश कुलकर्णी कहते हैं कि मंदिर ट्रस्ट डिजिटल तरीका अपनाने से हिचकते नहीं हैं। उनका संगठन दुनिया के 59 देशों में करीब 17 हजार मंदिरों के साथ काम करता है। असली चुनौती भक्तों का इस्तेमाल न करना है।
कुलकर्णी बताते हैं कि कुछ मंदिरों में मोबाइल फोन ले जाने की मनाही है। कई भक्त QR स्कैन करने की बजाय मूर्ति के सामने ही चढ़ावा चढ़ाना पसंद करते हैं। सोने-चांदी जैसे भौतिक चढ़ावे में भक्तों की भावना जुड़ी होती है, इसलिए मंदिरों को इसे संभालना ही पड़ता है।
साथ ही कुलकर्णी ने कहा कि फिर भी प्रयास लगातार बढ़ रहे हैं। पिछले साल तिरुपति में हुए इंटरनेशनल टेंपल्स कन्वेंशन एंड एक्सपो में ओएनडीसी (ONDC – Open Network for Digital Commerce) ने कैशलेस लेनदेन पर एक केस स्टडी पेश की थी। माईगोल्ड के बंसल ने भी वहां डिजिटल सोने के विचार रखे थे।
कुलकर्णी के मुताबिक आगे का रास्ता राज्य सरकारों के एंडोमेंट बोर्ड से होकर गुजरता है। इन्हें कैशलेस दान अनिवार्य करने के आदेश जारी करने होंगे। साथ ही एनपीसीआई (NPCI – National Payments Corporation of India) की पहल से नेटवर्क समस्याएं भी दूर करनी होंगी।
अब मंदिर ट्रस्टों के पास सीसीटीवी निगरानी, ऑडिट और आईटी (IT) निगरानी मजबूत करने के अलावा कोई चारा नहीं बचा है। आखिर भगवान के घर में भी अब सिर्फ भरोसे से काम नहीं चलता।
FAQ
- मंदिरों में डिजिटल दान क्यों बढ़ रहा है?
राम मंदिर में दान गबन के आरोपों के बाद भरोसा हिला है। इसलिए मंदिर अब QR कोड और ऐप से पारदर्शिता बढ़ा रहे हैं। इससे हर दान का हिसाब रखना आसान हो जाता है। - क्या मंदिरों में सोना दान करना भी डिजिटल हो सकता है?
हां, माईगोल्ड जैसे स्टार्टअप QR कोड से भुगतान लेते हैं। इस रकम का बराबर सोना बीमित तिजोरी में जमा होता है। बाद में जरूरत पड़ने पर इसे भौतिक सोने में बदला जा सकता है। - अभी मंदिरों में कितना दान डिजिटल तरीके से आता है?
अनुमान के मुताबिक फिलहाल सिर्फ 10 प्रतिशत दान ही डिजिटल है। भारत दुनिया के आधे डिजिटल लेनदेन संभालता है, फिर भी यह आंकड़ा कम है। एंडोमेंट बोर्ड के आदेश आने से यह संख्या बढ़ सकती है।
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