UPI सिस्टम चलाने के लिए MDR जरूरी, NPCI ने सुप्रीम कोर्ट में दी सफाई, बोला- ग्राहकों से नहीं वसूला जाएगा चार्ज
NPCI ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा कि दो हजार रुपए से ज्यादा के कुछ चुनिंदा UPI ट्रांजैक्शन पर MDR (मर्चेंट डिस्काउंट रेट) लागू करने का फैसला UPI सिस्टम को लंबे समय तक चलाने के लिए जरूरी है। हालांकि, इसका असर ज्यादातर ग्राहकों और छोटे व्यापारियों पर नहीं पड़ेगा।
2000 रुपए से ज्यादा के पेमेंट पर ही लगेगा MDR
NPCI के मुताबिक, नए नियम में दो हजार रुपए से अधिक के पर्सन-टू-मर्चेंट (P2M) ट्रांजैक्शन पर अधिकतम 0.4% MDR चार्ज लगाया जा सकता है। इसका मतलब है कि जब कोई ग्राहक किसी दुकान या व्यापारी को UPI से भुगतान करता है, तब तय शर्तों के तहत यह शुल्क लागू होगा।
NPCI ने बताया कि कुल UPI ट्रांजैक्शन में करीब 70% पेमेंट एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के बीच होते हैं। वहीं, व्यापारियों को किए जाने वाले लगभग 96% भुगतान 2,000 रुपए या उससे कम के होते हैं। इसलिए नए नियम का असर केवल करीब 4% P2M ट्रांजैक्शन पर पड़ेगा।
ग्राहकों से MDR वसूलने पर हो सकती है कार्रवाई
NPCI ने साफ कहा है कि व्यापारी MDR का पैसा ग्राहकों से नहीं मांग सकते। UPI ऐप चलाने वाली कंपनियां भी पेमेंट करने के लिए अलग से प्लेटफॉर्म फीस या कोई दूसरा चार्ज नहीं लगा सकतीं।
अगर कोई बैंक या UPI सर्विस प्रोवाइडर इस नियम का उल्लंघन करता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई हो सकती है। गंभीर स्थिति में उसकी UPI सदस्यता और सुविधाएं भी बंद की जा सकती हैं। NPCI का कहना है कि यह नियम केवल एक आश्वासन नहीं है, बल्कि बैंकों और पेमेंट कंपनियों के साथ हुए समझौतों के तहत अनिवार्य है।
छोटे दुकानदारों और आम लोगों के लिए UPI रहेगा मुफ्त
NPCI ने बताया कि व्यक्ति से व्यक्ति के बीच होने वाले ट्रांजैक्शन पहले की तरह मुफ्त रहेंगे। इसके अलावा, छोटे व्यापारियों को मिलने वाले भुगतान पर भी कोई MDR नहीं लगेगा। P2PM श्रेणी में ऐसे छोटे व्यापारी आते हैं, जिन्हें UPI के जरिए हर महीने 1 लाख रुपए तक का भुगतान मिलता है।
इस तरह छोटे दुकानदारों, रेहड़ी-पटरी वालों और आम ग्राहकों को नए नियम से बाहर रखा गया है।
छोटे व्यापारियों के लिए बनेगा विशेष फंड
NPCI ने हलफनामे में बताया कि छोटे व्यापारियों को डिजिटल पेमेंट से जोड़ने के लिए एक विशेष फंड बनाने का प्रस्ताव है। इस फंड में MDR से मिलने वाली राशि में से प्रत्येक संबंधित इकाई के हिस्से का 5% जमा किया जाएगा। कुछ विशेष इंडस्ट्री प्रोग्राम की श्रेणियों को इससे बाहर रखा गया है।
इसका उद्देश्य 20 लाख रुपए तक का सालाना कारोबार करने वाले छोटे व्यापारियों को UPI इस्तेमाल करने में मदद देना है। NPCI का कहना है कि इस व्यवस्था से छोटे व्यापारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ नहीं पड़ेगा, बल्कि उन्हें डिजिटल पेमेंट व्यवस्था से जुड़े रहने में मदद मिलेगी।
15 अक्टूबर से लागू होना था नियम, फिलहाल टला
NPCI ने 15 सितंबर 2026 को संशोधित MDR फ्रेमवर्क को लेकर सर्कुलर जारी किया था। शुरुआत में इसे 15 अक्टूबर से लागू करने की योजना थी, लेकिन फिलहाल इसे लागू करने का काम टाल दिया गया है।
दरअसल, सितंबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने NPCI से हलफनामा दाखिल कर यह बताने को कहा था कि 2,000 रुपए से अधिक के UPI पेमेंट पर शुल्क लगाने का आधार क्या है। इसके जवाब में NPCI ने 3 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल किया।
आखिर MDR चार्ज क्यों जरूरी बता रहा है NPCI?
NPCI का कहना है कि UPI के जरिए हर महीने अरबों ट्रांजैक्शन होते हैं। इतने बड़े सिस्टम को चलाने के लिए तकनीक, सुरक्षा, सर्वर और अन्य सुविधाओं पर लगातार खर्च करना पड़ता है। साइबर धोखाधड़ी रोकने, पेमेंट सिस्टम को सुरक्षित रखने और नई तकनीक विकसित करने के लिए भी निवेश की जरूरत है।
NPCI के अनुसार, अभी ज्यादातर UPI ट्रांजैक्शन पर कोई शुल्क नहीं लिया जाता। इससे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को चलाने वाली कंपनियों के सामने खर्च और कमाई के बीच अंतर बढ़ रहा है।
सरकार के 2000 करोड़ रुपए के बजट पर भी उठाया सवाल
NPCI ने वित्त मामलों की संसदीय स्थायी समिति की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि UPI के परिचालन खर्च की तुलना में सरकार की ओर से मिलने वाला बजट काफी कम है। समिति की 2026-27 की रिपोर्ट के मुताबिक, जीरो-MDR व्यवस्था की भरपाई के लिए 2000 करोड़ रुपए का बजट दिया गया था। यह रकम इंडस्ट्री के वास्तविक खर्च का केवल 11% और संभावित MDR से होने वाली कमाई का 14% ही पूरा कर पाती है।
वित्त मंत्रालय के अनुसार, 2026-27 में डिजिटल पेमेंट इंडस्ट्री का परिचालन खर्च करीब 20 हजार 700 करोड़ रुपए रहने का अनुमान है। इसी वजह से संसदीय समिति ने पेमेंट सिस्टम को आर्थिक रूप से मजबूत बनाए रखने के लिए अलग-अलग स्तरों पर आधारित कमाई का मॉडल तैयार करने की सिफारिश की थी।
NPCI ने अपने कानूनी अधिकारों का भी बचाव किया
NPCI ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि MDR कोई सरकारी टैक्स नहीं है। यह पेमेंट सिस्टम से जुड़े अलग-अलग पक्षों के बीच बांटा जाने वाला व्यावसायिक शुल्क है।
NPCI के मुताबिक, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने अगस्त 2016 में उसे पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट, 2007 के तहत UPI संचालित करने की अनुमति दी थी। इसी कानून की धारा 20 और 21 के तहत NPCI को पेमेंट सिस्टम से जुड़े नियम और शुल्क तय करने का अधिकार है।
NPCI ने यह भी कहा कि पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम्स एक्ट की धारा 10A में किया गया संशोधन सीधे MDR लागू नहीं करता, बल्कि कुछ डिजिटल पेमेंट माध्यमों को शुल्क से कानूनी सुरक्षा देता है। केंद्र सरकार ने 14 सितंबर 2026 की अधिसूचना में स्पष्ट किया था कि बिना किसी मौद्रिक सीमा वाले RuPay डेबिट कार्ड ट्रांजैक्शन और 2000 रुपए तक के UPI ट्रांजैक्शन शुल्क-मुक्त रहेंगे।
NPCI ने कहा- उसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका नहीं बनती
NPCI ने याचिका की सुनवाई पर भी सवाल उठाया है। उसका कहना है कि संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत वह राज्य या सरकारी प्राधिकरण की श्रेणी में नहीं आता। इसलिए उसके खिलाफ अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका दाखिल करने का आधार नहीं बनता।
NPCI ने यह भी कहा कि संशोधित MDR व्यवस्था मनमानी नहीं है। इसमें ट्रांजैक्शन की रकम और व्यापारी के आकार के आधार पर नियम बनाए गए हैं।
व्यापारियों के अधिकारों का उल्लंघन नहीं: NPCI
NPCI ने कहा कि नई MDR व्यवस्था से व्यापार करने के अधिकारों का उल्लंघन नहीं होता। इसका मकसद UPI को सुरक्षित और लंबे समय तक चलने योग्य बनाना है। उसके अनुसार, कम रकम वाले भुगतान और छोटे व्यापारियों को इस शुल्क से बाहर रखा गया है। केवल 2000 रुपए से ज्यादा के चुनिंदा व्यापारी भुगतान पर अधिकतम 0.4% शुल्क लगाने का प्रस्ताव है।
NPCI का कहना है कि इस व्यवस्था से UPI का इस्तेमाल करने वाले ज्यादातर लोगों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और पेमेंट सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए जरूरी पैसा भी मिल सकेगा।
फिलहाल यह ध्यान रखना जरूरी है कि MDR को लेकर NPCI ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। यह अदालत का अंतिम फैसला नहीं है। साथ ही संशोधित MDR फ्रेमवर्क को लागू करने की प्रक्रिया फिलहाल टली हुई है।