चनाव आयोग का यह फैसला बढ़ाएगा नए वोटर्स की मुश्किलें
समझें क्या है पूरा मामला...
- चुनाव आयोग नए वोटरों के लिए फॉर्म 6 के ऑनलाइन वर्जन में बदलाव कर रहा है।
- अब आवेदकों को अपने माता-पिता की पिछले SIR की स्थिति बतानी होगी।
- इस बदलाव के लिए अभी तक कोई कानूनी संशोधन नहीं हुआ है।
- देश भर में एसआईआरके दौरान पांच करोड़ 58 लाख से ज्यादा नाम वोटर लिस्ट से हट चुके हैं।
- इसका असर उन लोगों के बच्चों के रजिस्ट्रेशन पर पड़ सकता है, जिनके नाम पहले हट चुके हैं।
नया प्रावधान क्या कहता है
निर्वाचन आयोग के ECINET पोर्टल पर मौजूद नए फॉर्म 6 में एक नया डिक्लेरेशन हिस्सा जोड़ा गया है। यह हिस्सा फॉर्म के पार्ट J और K के बीच रखा गया है। इसमें आवेदक को तीन विकल्पों में से एक चुनना होता है।
पहला विकल्प यह बताता है कि आवेदक का नाम पिछली SIR सूची में मौजूद था। दूसरा विकल्प माता-पिता या दादा-दादी के नाम से जुड़ा है। तीसरा विकल्प उन लोगों के लिए है जिनका या जिनके परिवार का नाम कभी सूची में नहीं आया।
अगर कोई पहले दो विकल्पों में से कोई चुनता है, तो उसे विधानसभा क्षेत्र, बूथ नंबर और सीरियल नंबर जैसी पुरानी जानकारी देनी होगी।
कई आवेदकों के पास यह जानकारी मौजूद नहीं है। ऐसे लोगों के सामने सिर्फ तीसरा विकल्प बचता है। लेकिन पोर्टल पर अभी यह साफ नहीं है कि तीसरा विकल्प चुनने पर आगे क्या प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
सिर्फ ऑनलाइन आवेदकों पर लागू
दिलचस्प बात यह है कि यह नया हिस्सा सिर्फ ऑनलाइन फॉर्म में जोड़ा गया है। जो फॉर्म 6 डाउनलोड करके कागज पर भरा जाता है, उसमें यह नया कॉलम शामिल नहीं है।
यानी मैन्युअल तरीके से आवेदन करने वालों को यह जानकारी नहीं देनी होगी। सिर्फ ऑनलाइन आवेदन करने वालों को ही इस नई शर्त से गुजरना होगा।
तकनीकी रूप से यह कॉलम अनिवार्य नहीं बताया गया है। लेकिन इसे भरे बिना फॉर्म सबमिट नहीं हो पाता। इसलिए व्यवहारिक तौर पर हर ऑनलाइन आवेदक को यह जानकारी देनी ही पड़ती है।
कहां-कहां लागू होगा यह नियम
यह नया प्रावधान उन सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लागू है, जहां 2025-26 में SIR पूरी हो चुकी है या अभी चल रही है। बिहार इसमें शामिल नहीं है, क्योंकि वहां SIR सबसे पहले जून में ही पूरी हो गई थी। असम में कानूनी कारणों से SIR की प्रक्रिया अभी शुरू नहीं हुई है।
पिछले साल 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में हुई SIR के दौरान मौजूदा वोटरों से यही जानकारी मांगी गई थी। अभी 19 राज्यों में चल रही SIR में भी यह जानकारी ली जा रही है। लेकिन नए वोटरों के मुख्य फॉर्म 6 में अब तक कोई आधिकारिक संशोधन नहीं हुआ है। कानून मंत्रालय की गजट नोटिफिकेशन में भी इस बदलाव का जिक्र नहीं मिलता।
बंगाल में सबसे ज्यादा असर
इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा असर पश्चिम बंगाल में देखा गया। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद वहां अडजुडिकेशन प्रक्रिया चली। इसमें 27 लाख से ज्यादा मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए। इसका नतीजा यह हुआ कि यह लोग इस साल अप्रैल में हुए विधानसभा चुनाव में वोट नहीं डाल सके। इनकी अपीलें अभी ट्रिब्यूनल अदालत में लंबित हैं।
कानूनी आधार क्या है
यह पूरी प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326 से शक्ति लेती है। यह अनुच्छेद हर वयस्क नागरिक को वोटर बनने का अधिकार देता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 28 के तहत केंद्र सरकार चुनाव आयोग की सलाह से नए नियम बना सकती है।
फॉर्म 6 का मूल मकसद
फॉर्म 6 का इस्तेमाल वे लोग करते हैं जो 18 साल की उम्र पूरी कर चुके हैं या जिन्होंने नई नागरिकता ली है। जिनका नाम किसी वजह से सूची से हट गया है, वे भी इसी फॉर्म से दोबारा आवेदन करते हैं। निर्वाचक पंजीकरण नियम, 1960 के मुताबिक पहले सिर्फ परिवार के सदस्यों के नाम और EPIC नंबर देने होते थे। अब नया सेक्शन जुड़ने से नए वोटरों के लिए प्रक्रिया लंबी हो सकती है।
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