महिलाओं की बढ़ी वर्कफोर्स में हिस्सेदारी, लेकिन घरेलू कामों में नहीं बदली तस्वीर, ICRIER की रिपोर्ट में खुलासा
रिपोर्ट का नाम पार्टिसिपेशन पैराडॉक्स है। इसके मुताबिक, पिछले आठ साल में महिलाओं की कामकाजी भागीदारी तेजी से बढ़ी है। लेकिन घर के कामों की जिम्मेदारी अब भी महिलाओं पर है। रिपोर्ट के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं को नौकरी के साथ घर भी संभालना पड़ता है। इसके बावजूद उनकी कमाई पुरुषों से कम है। उन्हें आराम और अपने लिए भी कम समय मिलता है।
आठ साल में दोगुनी हुई संख्या
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्किंग वुमन की संख्या तेजी से बढ़ी है। साल 2017-18 में यह संख्या 10.4 करोड़ थी। साल 2025 में यह बढ़कर 20.1 करोड़ हो गई। यानी आठ साल में संख्या करीब दोगुनी हो गई। इस दौरान वर्कफोर्स में महिलाओं की हिस्सेदारी भी बढ़ी है। साल 2017-18 में यह हिस्सेदारी 22% थी। साल 2025 में बढ़कर 38% हो गई। इससे पता चलता है कि अब ज्यादा महिलाएं रोजगार से जुड़ रही हैं।
गांवों में महिलाओं की भागीदारी ज्यादा बढ़ी
महिलाओं के रोजगार में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी गांवों में दर्ज हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। 2017-18 में यह आंकड़ा 23.7% था। 2025 में बढ़कर 44.9% हो गया। शहरों में भी महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। 2017-18 में यह आंकड़ा 18.2% था। 2025 में बढ़कर 25.9% हो गया। हालांकि, नौकरी बढ़ने से घरेलू जिम्मेदारियों में बराबरी नहीं आई। आज भी महिलाओं को नौकरी के साथ घर संभालना पड़ता है।
महिलाएं पुरुषों से ज्यादा करती हैं काम
रिपोर्ट के आंकड़े घरेलू कामों में बड़ा अंतर दिखाते हैं। महिलाएं रोज औसतन 464 मिनट घर के कामों में लगाती हैं। वहीं, पुरुष औसतन 178 मिनट घरेलू काम करते हैं। यानी महिलाएं पुरुषों से रोज 286 मिनट ज्यादा काम करती हैं। यह अंतर करीब 4 घंटे 46 मिनट का है। इसमें सफाई, खाना बनाना और दूसरी जिम्मेदारियां शामिल हैं। बच्चों की देखभाल भी महिलाओं को करनी पड़ती है। नौकरी के बाद भी उन्हें इन कामों से राहत नहीं मिलती।
महिलाओं को रेस्ट के लिए मिलता कम समय
रिपोर्ट के मुताबिक, घर और नौकरी की जिम्मेदारी की वजह से महिलाएं खुद को समय नहीं दे पाती हैं। महिलाओं और पुरुषों के खाली समय में अंतर बढ़ा है। साल 2019 में यह अंतर 57 मिनट था। साल 2024 में बढ़कर 70 मिनट हो गया। यानी महिलाओं को खुद के लिए कम समय मिलता है। नौकरी के बाद भी वे घर के कामों में व्यस्त रहती हैं।
महिलाओं की घर की जिम्मेदारी बनी नौकरी में बाधा
रिपोर्ट के मुताबिक, घर और बच्चों की देखभाल महिलाओं के रोजगार में रुकावट बन रही है। रिपोर्ट में शामिल करीब 60% महिलाओं ने यह बात बताई है। उनके मुताबिक, घरेलू जिम्मेदारियों के कारण बाहर नौकरी करना मुश्किल होता है। वहीं, पुरुषों की स्थिति इससे अलग है। केवल 1% पुरुषों ने घरेलू कामों को नौकरी न करने की वजह बताया। ये आंकड़े बताते हैं कि घरेलू जिम्मेदारियां महिलाओं के रोजगार को प्रभावित करती हैं। कई महिलाएं चाहकर भी बाहर नौकरी नहीं कर पातीं।
महिलाओं की कमाई पुरुषों से कम
ICRIER रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है। लेकिन कमाई में बराबरी अब भी नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की सैलरी पुरुषों की 45% है। वहीं, शहरी इलाकों में यह आंकड़ा करीब 61% है। यानी दोनों जगह महिलाओं की कमाई पुरुषों से कम है। इससे साफ है कि नौकरी के बावजूद सैलरी में अंतर बना हुआ है। महिलाओं की बढ़ती भागीदारी के साथ यह अंतर भी बड़ी चुनौती है।
FAQs
- भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या कितनी बढ़ी है?
2017-18 में भारत में कामकाजी महिलाओं की संख्या 10.4 करोड़ थी, जो 2025 में बढ़कर 20.1 करोड़ हो गई है। - कितनी महिलाओं ने घरेलू जिम्मेदारियों को नौकरी में बाधा बताया?
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 60% महिलाओं ने घरेलू जिम्मेदारियों को अपनी नौकरी में बाधा बताया है। - पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की सैलरी कितनी है?
ग्रामीण इलाकों में महिलाओं की सैलरी पुरुषों की 45% है, जबकि शहरी इलाकों में यह आंकड़ा करीब 61% है।