अब OTT पर फिल्म देखना और गाना सुनना पड़ सकता है महंगा, WTO का फैसला
अब आपके स्मार्टफोन पर नेटफ्लिक्स पर फिल्में देखना, स्पोटिफाई पर संगीत सुनना या लेटेस्ट ऑनलाइन गेम डाउनलोड करना जेब पर भारी पड़ सकता है।
दरअसल, विश्व व्यापार संगठन (World Trade Organization-WTO) की वह 28 साल पुरानी व्यवस्था अब खत्म हो गई है, जो देशों को डिजिटल उत्पादों पर कस्टम्स ड्यूटी लगाने से रोकती थी।
कैमरून में हुई WTO की हालिया बैठक बिना किसी ठोस सहमति के समाप्त हो गई, जिससे इस डिजिटल मोरेटोरियम को आगे नहीं बढ़ाया जा सका।
क्या था 1998 का वह ऐतिहासिक समझौता?
डिजिटल क्रांति के शुरुआती दौर में यानी 1998 में WTO के 166 सदस्य देशों के बीच एक समझौता हुआ था। इसके तहत फिल्में, सॉफ्टवेयर, ई-बुक्स और स्ट्रीमिंग सेवाओं जैसे डिजिटल प्रोडक्ट्स के इम्पोर्ट पर कोई भी देश टैक्स नहीं लगा सकता था।
हर दो साल में इस रोक को रिन्यू किया जाता था। आखिरी बार यह प्रक्रिया 2024 में पूरी हुई थी, लेकिन अब इसकी समय सीमा बिना किसी नए एक्सपेंशन के समाप्त हो गई है।
आखिर क्यों नहीं बनी सहमति?
इस बार विवाद की मुख्य वजह समय सीमा को लेकर रही। अमेरिका इस मोरेटोरियम को अगले पांच साल के लिए बढ़ाना चाहता था, लेकिन ब्राजील ने इस प्रस्ताव को ब्लॉक कर दिया।
वहीं कुछ अन्य देश सिर्फ दो साल का विस्तार चाहते थे, तो कुछ पूरी तरह इसके खिलाफ थे। अब इस मुद्दे पर दोबारा बातचीत इसी साल मई में जिनेवा में होनी तय हुई है। तकनीकी रूप से फिलहाल सभी देश डिजिटल सेवाओं पर फीस लगाने के लिए स्वतंत्र हो चुके हैं।
भारत के लिए 4,700 करोड़ के राजस्व का रास्ता
भारत लंबे समय से इस मोरेटोरियम के विस्तार का विरोध करता रहा है। सरकारी आंकड़ों और एक्सपर्ट्स के अनुसार, इस टैक्स छूट की वजह से भारत को सालाना लगभग 4,700 करोड़ के टैरिफ राजस्व का नुकसान होता है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक, भारत का तर्क साफ है- जब बड़ी ग्लोबल टेक और मनोरंजन कंपनियां भारी मुनाफा कमा रही हैं, तो विकासशील देशों को इन डिजिटल आयातों पर टैक्स लगाने का संप्रभु अधिकार मिलना चाहिए।
आम उपभोक्ता की जेब पर क्या होगा असर?
यदि भारत सरकार डिजिटल आयात पर शुल्क लगाने का निर्णय लेती है, तो इसका सीधा असर आपकी सब्सक्रिप्शन फीस पर पड़ेगा। नेटफ्लिक्स, स्पोटिफाई, गेमिंग प्लेटफॉर्म और प्रोफेशनल सॉफ्टवेयर की कीमतें बढ़ सकती हैं। क्योंकि ये सेवाएं अब कस्टम्स ड्यूटी के दायरे में आ सकती हैं, इसलिए विदेशी कंपनियों को भारत में अपनी सेवाएं देने के लिए अतिरिक्त टैक्स चुकाना होगा, जिसका बोझ लास्ट में आम ग्राहकों पर ही डाला जाएगा।
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