कैसे और क्यों प्रकट हुए भारत के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंग, जानें इनकी कथाएं
12 Jyotirlinga Story: सावन का महीना महादेव को प्रसन्न करने का सबसे उत्तम समय माना जाता है। इस मौसम में देशभर के शिवालयों में भक्तों का तांता लगा रहता है। खासकर भारत में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों के दर्शन का विशेष महत्व है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इन 12 स्थानों पर स्वयं भगवान शिव प्रकट हुए थे।
यहां वे किसी साधारण मूर्ति में नहीं, बल्कि दिव्य ज्योति के रूप में विराजमान हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर ये ज्योतिर्लिंग धरती पर क्यों और कैसे प्रकट हुए? शिवपुराण के मुताबिक, हर ज्योतिर्लिंग के पीछे एक अनोखी, भावुक और चमत्कारी कहानी छिपी हुई है।
कहीं किसी भक्त की रक्षा के लिए शिवजी प्रकट हुए, तो कहीं देवताओं की प्रार्थना पर। इन पौराणिक कथाओं को हर शिव भक्त जानना चाहता है। तो आइए सावन के इस पावन अवसर पर जानते हैं भगवान शिव के सभी 12 ज्योतिर्लिंगों के प्राकट्य की पूरी डिटेल कहानी।
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास
सोमनाथ ज्योतिर्लिंग पहला और प्राचीन धाम माना जाता है। यह पवित्र मंदिर गुजरात के वेरावल में समुद्र किनारे स्थित है। शिवपुराण के मुताबिक, इसका संबंध सीधे प्रजापति दक्ष और चंद्रमा से है।
प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 बेटियों का विवाह चंद्रमा के साथ किया था। लेकिन चंद्रमा केवल रोहिणी से ही सबसे ज्यादा प्रेम करते थे। अन्य बेटियों के साथ हो रहे अन्याय से राजा दक्ष बहुत क्रोधित हुए।
दक्ष ने चंद्रमा को धीरे-धीरे क्षीण होने का भयानक श्राप दे दिया। श्राप के प्रभाव से चंद्रमा का तेज और आकार घटने लगा। इससे दुखी होकर चंद्रमा ने कठिन तपस्या की।
चंद्रमा की भक्ति देखकर भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होकर प्रकट हो गए। शिवजी ने चंद्रमा को श्राप से मुक्ति का उपाय बताया। फिर वे उसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में हमेशा के लिए बस गए।
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का इतिहास
मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग आंध्र प्रदेश के श्रीशैल पर्वत पर स्थित है। यह दूसरा प्रमुख ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इसके प्रकट होने की कथा गणेश जी और कार्तिकेय जी से जुड़ी है।
एक बार गणेश जी और कार्तिकेय में शादी को लेकर शर्त लगी। जो ब्रह्मांड का चक्कर पहले लगाएगा, उसकी शादी पहले होगी। कार्तिकेय जी अपने वाहन मयूर पर बैठकर परिक्रमा करने निकल पड़े।
गणेश जी ने बुद्धिमत्ता दिखाते हुए माता-पिता की परिक्रमा कर ली। गणेश जी को विजयी घोषित कर उनकी शादी रिद्धि-सिद्धि से करा दी गई। कार्तिकेय जी क्रोधित होकर दक्षिण के कौंच पर्वत पर चले गए।
माता पार्वती और भगवान शिव कार्तिकेय जी को मनाने वहां पहुंचे। कार्तिकेय जी के स्नेह और निवास के कारण शिवजी वहां प्रकट हुए। वही स्थल आगे चलकर मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (मल्लिका यानी पार्वती, अर्जुन यानी शिव) के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास
महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित है। यह एकमात्र दक्षिणमुखी ज्योतिर्लिंग है जो अत्यंत सिद्ध माना जाता है। इसके प्रकट होने की कथा दूषण नामक राक्षस से जुड़ी है।
प्राचीन समय में अवंतिका नगरी में वेदप्रिय नाम के धार्मिक ब्राह्मण रहते थे। दूषण राक्षस धार्मिक अनुष्ठानों को नष्ट कर लोगों पर अत्याचार करता था। उसने ब्राह्मणों को मारने के लिए अपनी तलवार उठाई।
तभी ब्राह्मणों द्वारा पूजे गए पार्थिव शिवलिंग से महाकाल प्रकट हुए। भगवान शिव ने अपने हुंकार मात्र से दूषण को भस्म कर दिया। भक्तों की रक्षा के बाद ब्राह्मणों ने शिवजी से वहीं रुकने का आग्रह किया। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और महाकालेश्वर रूप में बस गए।
ओंकारेश्वर और ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास
ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग मध्य प्रदेश में पवित्र नर्मदा नदी के तट पर है। यहां ज्योतिर्लिंग दो स्वरूपों ओंकारेश्वर और ममलेश्वर में विभाजित है। इसके प्राकट्य की कथा विंध्याचल पर्वत की तपस्या से जुड़ी है।
एक बार विंध्याचल पर्वत ने श्रेष्ठ बनने की इच्छा से घोर तप किया। उसने नर्मदा तट पर पार्थिव शिवलिंग बनाकर शिवजी की आराधना की। विंध्य की अटूट भक्ति देखकर भगवान शिव प्रत्यक्ष प्रकट हुए।
उसी समय समस्त देवगण और ऋषि-मुनि भी वहां पहुंच गए। उन्होंने शिवजी से वहां हमेशा निवास करने का नम्र निवेदन किया। देवताओं के अनुरोध पर ज्योतिर्लिंग दो भागों में बंट गया। एक भाग ओंकारेश्वर और दूसरा ममलेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ।
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास
बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग झारखंड राज्य के देवघर में स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का संबंध रामायण काल के लंकापति रावण से है। रावण ने शिवजी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की।
उसने अपने दसों सिर काटकर शिवजी को अर्पित कर दिए। प्रसन्न होकर शिवजी ने रावण को इच्छापूर्ति का वरदान दिया। रावण ने शिवजी से लंका चलने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने प्रसन्न होकर रावण के कटे सिरों को फिर से जोड़ दिया था। चिकित्सक (वैद्य) के रूप में शिव द्वारा घाव भरने के कारण उनका नाम बैद्यनाथ पड़ा।
शिवजी ने एक कामना शिवलिंग दिया और एक सख्त शर्त रखी। रास्ते में शिवलिंग को कहीं भी जमीन पर नहीं रखना था। देवघर पहुंचकर रावण को अचानक लघुशंका की तीव्र इच्छा हुई।
उसने बैजू नामक ग्वाले को शिवलिंग पकड़ने के लिए दे दिया। ग्वाले ने शिवलिंग भारी होने के कारण उसे जमीन पर रख दिया। शर्त के मुताबिक शिवलिंग वहीं हमेशा के लिए स्थापित हो गया।
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग का इतिहास
भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के पुणे जिले के पास स्थित है। इसके प्रकट होने के पीछे कुंभकर्ण के पुत्र भीम का वध है। भीम नाम का यह राक्षस अत्यंत अत्याचारी और शक्तिशाली था।
उसने ब्रह्मा जी से अजय होने का वरदान प्राप्त किया था। वरदान मिलते ही उसने देवताओं और शिव भक्तों को सताना शुरू किया। पीड़ित होकर सभी देवता भगवान शिव की शरण में पहुंचे।
भगवान शिव और राक्षस भीम के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंत में शिवजी ने भीम राक्षस का पूरी तरह से वध कर दिया। युद्ध समाप्त होने के बाद देवताओं ने शिवजी से वहीं रहने की प्रार्थना की। तब शिवजी ज्योतिर्लिंग के रूप में वहीं भीमाशंकर कहलाए।
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग का इतिहास
रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग तमिलनाडु राज्य के समुद्र तट पर स्थित है। इस ज्योतिर्लिंग का सीधा संबंध भगवान श्री राम से जुड़ा है। जब प्रभु राम लंका पर चढ़ाई करने जा रहे थे।
तब उन्होंने समुद्र पार करने के लिए सेतु निर्माण शुरू कराया। कार्य की सफलता और विजय के लिए श्री राम ने पूजा का विधान किया। उन्होंने रेत से एक सुंदर पार्थिव शिवलिंग का निर्माण किया।
प्रभु राम की सच्ची भक्ति देखकर भगवान शिव प्रकट हो गए। उन्होंने श्री राम को रावण पर विजय प्राप्त करने का आशीर्वाद दिया। प्रभु राम के निवेदन पर शिवजी वहां ज्योतिर्लिंग रूप में स्थापित हुए। यह स्थान रामेश्वरम के नाम से जगत् में प्रसिद्ध हुआ।
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास
नागेश्वर ज्योतिर्लिंग गुजरात में द्वारकापुरी के समीप स्थित है। इसके प्रकट होने की कथा दारुक राक्षस और सुप्रिय भक्त से है। सुप्रिय भगवान शिव का परम और अनन्य भक्त था।
दारुका नामक राक्षसी और उसके पति दारुक ने सुप्रिय को बंदी बनाया। जेल में बंद होने के बाद भी सुप्रिय शिव पूजा करता रहा। दारुक ने क्रोधित होकर सुप्रिय को मारने का प्रयास किया।
अपने प्रिय भक्त का जीवन संकट में देखकर शिवजी प्रकट हुए। उन्होंने दिव्य अस्त्रों से दारुक और उसकी सेना का नाश किया। भक्त सुप्रिय की रक्षा करने के बाद शिवजी वहीं ज्योतिर्लिंग बन गए। नागों के ईश्वर होने के कारण यह नागेश्वर कहलाया।
काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास
विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तर प्रदेश के पवित्र काशी शहर में स्थित है। मान्यता है कि काशी नगरी भगवान शिव के त्रिशूल पर टिकी है। इसके प्राकट्य की कथा माता पार्वती की इच्छा से जुड़ी है।
विवाह के बाद माता पार्वती कैलाश पर्वत पर रह रही थीं। उन्होंने शिवजी से किसी अपने प्रिय स्थान पर रहने की इच्छा जताई। तब भगवान शिव माता पार्वती को लेकर पावन काशी नगरी पहुंचे।
शिवजी ने काशी को अपना स्थायी और प्रिय निवास स्थान बनाया। वे यहां विश्वेश्वर या विश्वनाथ के रूप में स्थापित हुए। काशी विश्वनाथ मंदिर हिन्दुओं के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। इसे 12 ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि इस ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने से सभी पाप धुल जाते हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास
त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग महाराष्ट्र के नासिक जिले में स्थित है। यह ज्योतिर्लिंग पावन गोदावरी नदी के उद्गम स्थल पर है। इसके प्रकट होने की कथा महर्षि गौतम और गोदावरी से जुड़ी है।
ऋषि गौतम पर गौ-हत्या का झूठा कलंक लग गया था। शुद्धिकरण के लिए उन्होंने शिवजी की कठोर तपस्या की। तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने गंगाजी को वहां प्रवाहित किया।
गंगाजी ही वहां गोदावरी नदी के रूप में प्रकट हुईं। महर्षि गौतम और गोदावरी ने शिवजी से वहां रहने की प्रार्थना की। भगवान शिव की स्वीकृति से त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना हुई। यह भारत का एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जिसमें ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों एक साथ विराजमान हैं।
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग का इतिहास
केदारनाथ ज्योतिर्लिंग उत्तराखंड के हिमालय की गोद में स्थित है। यह 11वां ज्योतिर्लिंग है जो अत्यंत दुर्गम और पवित्र है। इसके प्रकट होने की कथा नर और नारायण की तपस्या से है।
सतयुग में भगवान विष्णु ने नर-नारायण रूप में अवतार लिया था। उन्होंने अलकनंदा तट पर हजारों वर्षों तक तपस्या की। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी प्रकट हुए।
नर और नारायण ने जन कल्याण के लिए वरदान मांगा। उन्होंने शिवजी से हमेशा के लिए वहीं निवास करने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उनकी प्रार्थना मान ली और ज्योतिर्लिंग रूप धारण किया। केदारनाथ के दर्शन से पापों से मुक्ति मिल जाती है।
घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग का इतिहास
घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग 12 ज्योतिर्लिंगों में अंतिम माना जाता है। यह महाराष्ट्र के औरंगाबाद के पास स्थित है। इसके प्राकट्य की कथा शिव भक्त घुश्मा की भक्ति से जुड़ी है।
घुश्मा रोज 101 पार्थिव शिवलिंग बनाकर तालाब में विसर्जित करती थी। उसकी सौतन और बड़ी बहन सुदेहा उससे इर्ष्या करती थी। इर्ष्या के कारण सुदेहा ने घुश्मा के पुत्र की हत्या कर दी।
पुत्र की मृत्यु के बाद भी घुश्मा शिव भक्ति में लीन रही। उसकी निष्काम भक्ति देखकर भगवान शिव प्रत्यक्ष प्रकट हो गए। शिवजी ने उसके मृत पुत्र को फिर से जीवित कर दिया। घुश्मा के नम्र निवेदन पर शिवजी ने सुदेहा को क्षमा कर दिया। वे वहीं घुश्मेश्वर नाम से ज्योतिर्लिंग के रूप में बस गए।
तो भगवान शिव के ये देश के प्रसिद्ध 12 ज्योतिर्लिंग केवल धार्मिक आस्था के केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये भक्ति, समर्पण और सत्य की विजय के प्रतीक हैं। शिवपुराण के मुताबिक, जब-जब भक्तों पर संकट आया या देवताओं ने निष्छल भाव से पुकारा।
तब-तब महादेव ज्योति रूप में प्रकट होकर मार्गदर्शन और रक्षा करने आए। सावन के पावन महीने में इन 12 ज्योतिर्लिंगों की कथा पढ़ने और स्मरण करने मात्र से मन को शांति मिलती है तथा जीवन के सारे पाप और कष्ट कट जाते हैं। शिवजी की यह कृपा हर भक्त पर सदैव बनी रहती है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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