क्या था शिव के इन रहस्यमयी भक्तों का सच, जिनके आगे स्वयं झुके महादेव
SawanShiva Bhakt Story: सावन का पवित्र महीना अब शुरू हो चुका है। यह समय भगवान शिव की भक्ति का सबसे पावन काल माना जाता है। चारों तरफ हर-हर महादेव की गूंज सुनाई देती है। हवा में बहती भक्ति की लहर भक्तों में नई ऊर्जा भरती है।
कहा जाता है कि सच्चे मन से जाने वाले की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। भोलेनाथ अपने हर भक्त के दुख और कष्ट तुरंत हर लेते हैं। हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार शिव जी अत्यंत दयालु माने जाते हैं। वे केवल देवताओं के ही नहीं बल्कि राक्षसों के भी आराध्य हैं।
पशु, पक्षी और इंसान सभी उनकी समान रूप से पूजा करते हैं। शिव भक्ति में किसी भेदभाव या आडंबर की जगह नहीं होती है। केवल सच्चा प्रेम और निष्ठा ही महादेव को प्रसन्न कर देती है।
शिव पुराण में ऐसे कई भक्तों की कथाएं विस्तार से मिलती हैं। इन कथाओं को पढ़कर आज भी लोग भक्ति की प्रेरणा लेते हैं। आइए जानते हैं भगवान शिव के 8 सबसे महान भक्तों के बारे में।
भक्त कन्नप्पा की निश्छल कथा
शिव पुराण की कथा के मुताबिक, दक्षिण भारत के एक शिकारी परिवार में कन्नप्पा का जन्म हुआ था। वे शिव भक्ति के सबसे बड़े और पवित्र प्रतीक माने जाते हैं। एक दिन उन्होंने देखा कि शिवलिंग की आंख से खून बह रहा है।
कन्नप्पा ने बिना सोचे अपनी एक आंख तीर से निकाल ली। उन्होंने अपनी वह आंख तुरंत शिवलिंग (शिव और सावन) पर लाकर लगा दी। इसके बाद शिवलिंग की दूसरी आंख से भी खून बहने लगा। कन्नप्पा ने फिर अपनी दूसरी आंख भी निकालने का फैसला कर लिया।
निशाना सही लगाने के लिए उन्होंने अपना पैर शिवलिंग पर रखा। उनकी इस निष्ठा को देखकर भगवान शिव तुरंत वहां प्रकट हो गए। महादेव ने प्रसन्न होकर कन्नप्पा को प्रेम से अपने गले लगाया। भगवान शिव ने उनकी दोनों आंखों की रोशनी भी वापस लौटा दी।
लंकापति रावण की भक्ति
रावण अपने भारी अहंकार के कारण अंत में विनाश को प्राप्त हुआ। लेकिन वह भगवान शिव का बहुत बड़ा और ज्ञानी भक्त था। उसने महादेव को खुश करने के लिए बहुत कठिन तपस्या की थी। रावण ने अपने सिर काटकर शिव जी के चरणों में चढ़ा दिए थे।
उसने बहुत ही सुंदर 'शिव तांडव स्तोत्र' की रचना की थी। उसकी इस स्तुति से प्रसन्न होकर महादेव ने उसे दर्शन दिए। शिव जी ने रावण को चंद्रहास खड्ग प्रदान किया था। साथ ही उसे कभी न खत्म होने वाली अक्षय शक्ति दी थी।
महर्षि मार्कंडेय और यमराज का युद्ध
शिव पुराण की कथा के मुताबिक, ऋषि मार्कंडेय की कुल उम्र केवल 16 साल तय की गई थी। लेकिन उनकी सच्ची शिव भक्ति ने काल को भी रोक दिया था। जब यमराज उनके प्राण लेने आए तो वे बहुत डर गए। बालक मार्कंडेय तुरंत शिवलिंग से जाकर लिपट गए थे। वे जोर-जोर से महामृत्युंजय मंत्र का लगातार जाप करने लगे।
स्वयं महादेव ने प्रकट होकर यमराज को वहां से रोक दिया। शिव जी ने बालक मार्कंडेय के प्राणों की रक्षा की थी। भोलेनाथ ने उन्हें हमेशा के लिए अमर होने का वरदान दिया।
बाणासुर की कलात्मक भक्ति
दैत्यराज बलि का पुत्र बाणासुर भगवान शिव का अनन्य भक्त था। वह न केवल एक शक्तिशाली राजा था, बल्कि एक महान संगीतकार और कलाकार भी था।
जब भगवान शिव तांडव नृत्य करते थे, तब बाणासुर अपनी सहस्त्र (हजार) भुजाओं से विभिन्न प्रकार के ढोल और वाद्ययंत्र इतनी कुशलता से बजाता था कि संपूर्ण ब्रह्मांड उस संगीत में लीन हो जाता था। उसकी इस अद्भुत कला और समर्पण से प्रसन्न होकर महादेव ने स्वयं उसके नगर शोणितपुर की रक्षा करने का वचन दिया था।
नंदी का समर्पण
दूसरी ओर, नंदी जी ऋषि शिलाद के पुत्र हैं, जो केवल भगवान भोलेनाथ के वाहन ही नहीं, बल्कि उनके सबसे प्रिय गण और द्वारपाल भी हैं। नंदी के जीवन में भी अल्पायु का योग था। अपनी मृत्यु को टालने के लिए नंदी ने केवल जल और वायु का त्याग करके घोर तपस्या की। उनकी निष्ठा से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें अजर-अमर होने का वरदान दिया।
शिव जी ने नंदी को अपने सभी गणों का स्वामी बनाया और उन्हें अपने धाम कैलाश का मुख्य द्वारपाल घोषित किया। आज परंपरा यह है कि जब भी कोई श्रद्धालु शिव मंदिर जाता है, तो वह अपनी मनोकामना पहले नंदी महाराज के कानों में कहता है, क्योंकि नंदी के बिना शिव जी की पूजा पूरी नहीं मानी जाती।
भगवान श्री राम भक्ति कथा
भगवान विष्णु के सातवें अवतार श्री राम और महादेव के बीच का संबंध अत्यंत सुंदर और अनोखा है। शिव पुराण के अनुसार, श्री राम भगवान शिव को अपना आराध्य मानते हैं, जबकि महादेव श्री राम को अपना ईश्वर मानते हैं।
लंका पर चढ़ाई करने से पहले श्री राम ने समुद्र तट पर अपने हाथों से बालू का शिवलिंग बनाया और विधिवत पूजन किया। इस स्थान को आज रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है, जो हिंदू धर्म के सबसे पवित्र धामों में से एक है।
कुबेर देव भक्ति कथा
धन-धान्य के देवता कुबेर देव अपने पूर्वजन्म में गुणनिधि नाम के एक अत्यंत निर्धन और साधारण व्यक्ति थे। एक बार अनजाने में ही सही, वे रात्रि के समय शिव मंदिर में प्रकाश करने के लिए अपना वस्त्र जलाकर दीपक की लौ जलाते रहे।
इस छोटे से अनजाने कार्य और बाद में की गई कठोर तपस्या के कारण महादेव ने उन्हें समस्त ब्रह्मांड का कोषाध्यक्ष (धनपति) बना दिया और अपना परम मित्र स्वीकार किया।
बालक उपमन्यु भक्ति कथा
ऋषि धौम्य के छोटे से शिष्य उपमन्यु की बाल-भक्ति भी अत्यंत प्रेरणादायक है। जब उपमन्यु को पीने के लिए दूध नहीं मिला और माता ने चावल का आटा घोलकर दिया, तो वे सच्चे दूध की प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या करने निकल पड़े।
बालक की निष्ठा से प्रसन्न होकर महादेव ने प्रकट होकर उन्हें केवल दूध ही नहीं, बल्कि पूरा का पूरा 'क्षीरसागर' (दूध का समुद्र) ही उपहार में सौंप दिया था। सावन माह
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