दशहरे पर शमी के पत्तों को क्यों सोना मानकर बांटते हैं लोग, जानें अपराजिता पूजा और पांडवों से जुड़ा इतिहास

Kaushiki | Oct 17, 2026, 10:38 IST
विजयादशमी पर शमी के पत्ते बांटने का धार्मिक सच
History of Vijayadasham: दशहरे पर शमी के पत्ते बांटने और अपराजिता पूजा का बहुत बड़ा महत्व है। विजयादशमी के दिन इस परंपरा का सीधा नाता पांडवों के इतिहास से जुड़ा हुआ है। जानिए इस पावन पर्व पर शमी के पत्तों को एक-दूसरे को देने की पौराणिक वजह और घर में सुख-समृद्धि लाने वाले उपाय।

History of Vijayadasham: हर साल विजयादशमी का त्योहार बड़े धूम-धाम से मनाया जाता है। इस दिन चारों तरफ खुशी का माहौल रहता है। लोग एक-दूसरे को बधाई देते हैं। बुराई पर अच्छाई की जीत की खुशियां मनाई जाती हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस दिन शमी के पत्ते क्यों बांटे जाते हैं?



बहुत से लोग इन्हें सोना मानकर एक-दूसरे को भेंट करते हैं। इसके पीछे का इतिहास बहुत दिलचस्प और प्रेरणादायक है। शास्त्रों में इस परंपरा का बहुत सुंदर वर्णन किया गया है। इसका संबंध महाभारत काल के पांडवों से जुड़ा हुआ है।



साथ ही इस दिन अपराजिता देवी की विशेष पूजा भी की जाती है। यह पूजा जीवन में हर मोड़ पर जीत दिलाती है। प्राचीन समय से ही यह परंपरा चली आ रही है। राजा-महाराजा भी युद्ध पर जाने से पहले यह पूजा करते थे।



आज भी लोग अपने घर के बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं। वे उन्हें शमी के पत्ते देकर शुभकामनाएं देते हैं। इस साल विजयादशमी का त्योहार 20 अक्टूबर के मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि इस परंपरा की शुरुआत आखिर कैसे हुई। साथ ही जानें कि इसका हमारे जीवन पर क्या असर पड़ता है।



अपराजिता पूजा का महत्व

विजयादशमी के दिन अपराजिता पूजा का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस पूजा से जीवन के सारे संकट दूर हो जाते हैं। अपराजिता का अर्थ होता है जिसे कोई कभी हरा न सके।



इस दिन देवी की पूजा करने से हर काम में सफलता मिलती है। घर के पूर्व दिशा में इस पूजा को करना सबसे शुभ माना जाता है। प्राचीन काल में राजा अपनी सेना के साथ यह पूजा करते थे। वे युद्ध में जाने से पहले देवी का आशीर्वाद लेते थे।



इससे उन्हें युद्ध में हमेशा विजय हासिल होती थी। आम लोग भी अपने जीवन की परेशानियों को खत्म करने के लिए यह पूजा करते हैं। इससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का वास होता है।



पांडवों से जुड़ा अनोखा इतिहास

शमी के पेड़ का संबंध महाभारत काल से बहुत गहराई से जुड़ा है। जब पांडवों को बारह साल का बनवास मिला था, तब उन्हें एक साल का अज्ञातवास भी काटना था।अज्ञातवास के दौरान पांडवों को अपनी पहचान छुपानी थी।



इसलिए उन्होंने अपने सारे अस्त्र और शस्त्र शमी के पेड़ पर छुपा दिए थे। एक साल पूरा होने के बाद पांडवों ने अपने शस्त्र वापस निकाले थे। वह दिन विजयादशमी का ही पावन दिन था। पांडवों ने शमी वृक्ष की पूजा करके अपने हथियार वापस लिए थे।



इसके बाद उन्होंने कौरवों पर महाभारत के युद्ध में विजय प्राप्त की थी। इसी वजह से विजयादशमी पर शमी वृक्ष की पूजा की शुरुआत हुई। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, लोग आज भी इस दिन शमी के पेड़ को नमन करते हैं।



शमी के पत्ते बांटने की परंपरा

दशहरे की शाम को शमी के पत्ते बांटने का रिवाज बहुत पुराना है। लोग इन पत्तों को सोना मानकर अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को देते हैं। इसके पीछे एक और पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। एक गुरुभक्त शिष्य कौत्स ने अपने गुरु को दक्षिणा देने का संकल्प लिया था।



भगवान कुबेर ने शमी के पेड़ पर सोने की बारिश की थी। कौत्स ने वे सोने की मुद्राएं गुरु को समर्पित की थीं। बाकी बची सोने की मुद्राएं कौत्स ने लोगों में बांट दी थीं। वह दिन भी विजयादशमी का ही दिन माना जाता है। तभी से शमी के पत्तों को सोने का प्रतीक माना जाने लगा। लोग इन पत्तों को देकर एक-दूसरे की खुशहाली की कामना करते हैं।



शमी पौधे के चमत्कारी फायदे

ज्योतिष शास्त्र में शमी के पौधे का बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। इसका संबंध शनिदेव से माना जाता है। घर में शमी का पौधा लगाने से शनि दोष कम होता है। साथ ही घर की नकारात्मक ऊर्जा भी पूरी तरह खत्म हो जाती है।



विजयादशमी के दिन शमी के पौधे के पास दीपक जलाना चाहिए। इससे घर में धन और समृद्धि का आगमन होता है। इस पौधे की पत्तियां नियमित रूप से शिवलिंग पर चढ़ानी चाहिए। इससे भगवान शिव बहुत प्रसन्न होते हैं। जीवन की हर बाधा को दूर करने के लिए यह बहुत कारगर उपाय है। इससे परिवार के सदस्यों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहता है।



कैसे करें दशहरे पर पूजा

दशहरे के दिन सुबह उठकर स्नान करके साफ कपड़े पहनें। इसके बाद अपराजिता देवी का ध्यान करके पूजा की शुरुआत करें। पूजा स्थान पर चंदन से अष्टदल कमल बनाएं। वहां देवी अपराजिता की मूर्ति स्थापित करें।



देवी को लाल फूल और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद शमी के पेड़ के पास जाकर दीपक जलाएं। शमी के पेड़ की परिक्रमा करें और अपनी मनोकामना बोलें। इसके बाद शमी के कुछ पत्ते तोड़ लें। इन पत्तों को अपने घर के मंदिर में रखें। फिर इन्हें अपने बड़ों को देकर उनका आशीर्वाद लें।



जीवन में खुशहाली का जरिया

विजयादशमी केवल बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक नहीं है। यह हमें प्रकृति और अपनी परंपराओं से जोड़ता है। शमी के पत्ते हमें यह याद दिलाते हैं कि नम्रता में ही असली ताकत है। अपराजिता पूजा हमें निडर होकर जीने की सीख देती है। आज के भागदौड़ भरे जीवन में यह परंपराएं हमें अपनों के करीब लाती हैं। जब हम अपनों को ये पत्ते देते हैं, तो प्यार बढ़ता है। इसलिए इस विजयादशमी पर इन परंपराओं का सही अर्थ समझें। अपने घर में सुख और शांति का माहौल बनाएं।



FAQs:



  1. विजयादशमी पर शमी के पत्ते क्यों बांटे जाते हैं?
    विजयादशमी पर शमी के पत्ते बांटने का रिवाज प्राचीन कथाओं से जुड़ा है। इसे सोने का प्रतीक माना जाता है और लोग इसे एक-दूसरे को देकर खुशहाल जीवन की कामना करते हैं।
  2. आपराजिता पूजा का क्या महत्व है?
    आपराजिता पूजा का महत्व इस दिन बहुत बड़ा माना जाता है। इसे करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और सफलता मिलती है। यह पूजा सकारात्मक ऊर्जा का संचार करती है।
  3. शमी के पौधे के क्या फायदे हैं?
    शमी के पौधे के फायदे ज्योतिष शास्त्र में बताए गए हैं, जैसे शनि दोष का कम होना और घर में सकारात्मक ऊर्जा का आना। इसे नियमित रूप से पूजा में शामिल करने से स्वास्थ्य और धन में वृद्धि होती है।
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