क्यों दूसरों के विवाह में बाधा बनते थे भगवान गणेश, ब्रह्मा जी ने कैसे कराई गणेश जी की शादी

Kaushiki | Sept 10, 2026, 12:00 IST
Ganesh Ji Marriage Story
विघ्नहर्ता भगवान गणेश की दो पत्नियां रिद्धि और सिद्धि हैं। साथ ही उनके दो पुत्र शुभ और लाभ हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार गणेश जी के विशेष रूप के कारण उनका विवाह नहीं हो रहा था। जानिए ब्रह्मा जी ने कैसे कराया यह अलौकिक विवाह।

Ganesh Ji Marriage Story: हिंदू धर्म में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य माना जाता है। किसी भी शुभ काम से पहले गणेश जी की पूजा होती है। वे अपने भक्तों के सभी दुख और विघ्न हर लेते हैं।



शास्त्रों में गणेश जी के परिवार का बहुत सुंदर वर्णन मिलता है। उनकी दो देवियां यानी पत्नियां रिद्धि और सिद्धि हैं। साथ ही उनके दो प्रिय पुत्र शुभ और लाभ भी हैं।



लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका विवाह कैसे हुआ था? गणेश जी का विवाह होना कोई आसान काम नहीं था। इसके पीछे एक बहुत ही रोचक और अलौकिक कहानी छिपी है।



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गणेश जी के विवाह में भी आती थीं रुकावटें

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, गणेश जी का शरीर अनोखा था। उनका मुख हाथी का था और पेट थोड़ा बड़ा था। इस रूप के कारण कोई भी कन्या उनसे शादी को तैयार नहीं होती थी। जब भी किसी देवता का विवाह होता, गणेश जी बहुत उदास हो जाते थे। उनका मन दुखी हो जाता था कि उनकी शादी नहीं हो रही है।



इस उदासी के कारण वे एक काम करने लगे। वे अन्य देवों के विवाह में विघ्न डालने लगे थे। वे अपने वाहन मूषक को भेजकर मंडप की नींव कमजोर करा देते थे। इससे देवताओं के विवाह में काफी रुकावटें आने लगी थीं।



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परेशान देवताओं ने ब्रह्मा जी से मांगी मदद

गणेश जी के इस कदम से सभी देवता बहुत परेशान हो गए। कोई भी विवाह बिना रुकावट के पूरा नहीं हो पा रहा था। थक-हारकर सभी देवता सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के पास पहुंचे।



देवताओं ने अपनी पूरी व्यथा ब्रह्मा जी को विस्तार से बताई। उन्होंने ब्रह्मा जी से इस समस्या का तुरंत हल निकालने की प्रार्थना की। ब्रह्मा जी ने देवताओं को थोड़ा धैर्य रखने को कहा।



इसके बाद ब्रह्मा जी अपने ध्यान में गहराई से लीन हो गए। ध्यान के दौरान ही उन्हें एक बहुत ही सुंदर उपाय सूझा। उन्होंने अपनी योग शक्ति से दो मानस पुत्रियां पैदा कीं।



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रिद्धि और सिद्धि का अलौकिक प्राकट्य

ब्रह्मा जी की इन दोनों मानस पुत्रियों के नाम रिद्धि और सिद्धि था। मान्यताओं के मुताबिक, रिद्धि बुद्धि और समृद्धि की देवी मानी जाती हैं। वहीं सिद्धि सफलता और कार्य सिद्धि की देवी मानी जाती हैं।



ब्रह्मा जी ने दोनों पुत्रियों को एक खास जिम्मेदारी सौंपी। उन्होंने दोनों को गणेश जी के पास शिक्षा लेने के लिए भेजा। ब्रह्मा जी ने कहा कि वे गणेश जी का ध्यान बंटाकर रखें।



जब भी किसी देवता के विवाह की खबर आती, दोनों देवियां वहां पहुंच जातीं। वे गणेश जी का ध्यान पढ़ाई और बातचीत में भटका देती थीं। इस तरह देवताओं के विवाह बिना विघ्न संपन्न होने लगे।



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जब गणेश जी को पता चला पूरा सच

कुछ समय तक सब कुछ बहुत शांति से चलता रहा। देवताओं के विवाह बिना किसी बाधा के संपन्न होने लगे। लेकिन एक दिन गणेश जी को पूरे सच का पता चल गया। उन्हें समझ आ गया कि दोनों देवियां उनका ध्यान भटकाती थीं।



यह जानकर गणेश जी काफी ज्यादा क्रोधित हो गए। वे ब्रह्मा जी के पास जाकर इसका कारण पूछने लगे। तब ब्रह्मा जी ने गणेश जी को शांत कराया। ब्रह्मा जी ने रिद्धि और सिद्धि का विवाह गणेश जी से कराने का प्रस्ताव दिया। गणेश जी ने खुशी से इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया।



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धूमधाम से हुआ गणेश जी का विवाह

इसके बाद बहुत ही धूमधाम से गणेश जी का विवाह संपन्न हुआ। विश्वकर्मा जी ने इस दिव्य विवाह के लिए मंडप तैयार किया। सभी देवताओं ने शादी में आकर दोनों को आशीर्वाद दिया।



गणेश जी का विवाह रिद्धि और सिद्धि दोनों देवियों के साथ हुआ। रिद्धि से गणेश जी को अपार बुद्धि और समृद्धि मिली। वहीं सिद्धि से उन्हें हर काम में सफलता की शक्ति मिली।



इस तरह गणेश जी के जीवन से विवाह की बाधा दूर हुई। अब गणेश जी का गृहस्थ जीवन बहुत ही सुखद हो गया था। पूरा देवलोक इस शुभ विवाह से बहुत खुश हुआ।



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पुत्र शुभ और लाभ का जन्म

कहानी के मुताबिक, विवाह के बाद गणेश जी के घर में दो पुत्रों का जन्म हुआ। पहली पत्नी रिद्धि से उन्हें एक पुत्र मिला। इस पुत्र का नाम शुभ रखा गया। दूसरी पत्नी सिद्धि से भी एक पुत्र का जन्म हुआ। इस पुत्र का नाम लाभ रखा गया। शुभ का अर्थ होता है हर काम में मंगल होना।



लाभ का अर्थ होता है जीवन में प्रगति और फायदा होना। यही कारण है कि पूजा में हमेशा शुभ और लाभ लिखा जाता है। दोनों पुत्र अपने पिता की तरह बहुत गुणी और दयालु थे।



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संतोषी माता का हुआ प्राकट्य

आगे चलकर गणेश जी की एक पुत्री भी हुई। शास्त्रों के मुताबिक, शुभ और लाभ की एक बहन की इच्छा थी। वे रक्षाबंधन पर बहन से राखी बंधवाना चाहते थे। अपने पुत्रों की इच्छा पूरी करने के लिए गणेश जी ने ध्यान लगाया। उनकी दिव्य ज्योति से एक कन्या का प्राकट्य हुआ।



इस कन्या का नाम संतोषी माता रखा गया। संतोषी माता अपने भक्तों को हर तरह का संतोष देती हैं। इस प्रकार गणेश जी का पूरा परिवार बहुत ही पावन माना गया। उनका परिवार सुख और समृद्धि का सबसे बड़ा प्रतीक है।



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पूजा में क्यों लिखा जाता है शुभ-लाभ

हिंदू धर्म और वैदिक शास्त्रों में किसी भी शुभ कार्य, पूजा-पाठ, दिवाली या नए घर के प्रवेश द्वार पर शुभ-लाभ और रिद्धि-सिद्धि लिखने की प्राचीन परंपरा है। शास्त्रों और पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, भगवान श्री गणेश विघ्नहर्ता और प्रथम पूज्य हैं।



माता रिद्धि और माता सिद्धि उनकी दो दिव्य पत्नियां हैं। रिद्धि की कृपा से जीवन में सुख, समृद्धि और धन-धान्य की प्राप्ति होती है। जबकि सिद्धि की कृपा से व्यक्ति को हर कार्य में सफलता, अलौकिक विद्या और सिद्धि हासिल होती है। भगवान गणेश और देवियों के दो पुत्र हैं - शुभ और लाभ।



  • शुभ: इसका अर्थ है मंगल, कल्याण और सात्विकता। यह जीवन में पवित्रता लाता है।
  • लाभ: इसका अर्थ है प्रगति, फायदा और निरंतर वृद्धि।

मान्यता है कि केवल धन कमाना या 'लाभ' पाना तब तक अधूरा और निरर्थक है, जब तक वह सही और 'शुभ' मार्ग से न आया हो। यदि लाभ शुभ तरीके से आएगा, तभी वह घर में स्थायी सुख और शांति देगा। भगवान गणेश की कृपा भी बनी रहेगी।



घर के मुख्य द्वार पर 'शुभ-लाभ' और 'रिद्धि-सिद्धि' लिखने से नकारात्मक शक्तियां और वास्तु दोष नष्ट हो जाते हैं। द्वार से केवल सकारात्मक ऊर्जा, देवी लक्ष्मी और समस्त ऋद्धियों-सिद्धियों का आगमन होता है, जिससे परिवार में खुशहाली बनी रहती है।



डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।



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