क्या बजरंग बली श्रीराम के भाई हैं? जानें हनुमान जी के जन्म से लेकर सुंदरकांड तक की पूरी जानकारी
संकटमोचन हनुमान जी की महिमा निराली है। अक्सर हम उन्हें भगवान श्रीराम के परम भक्त और सेवक के रूप में पूजते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शास्त्रों में उन्हें श्रीराम का भाई भी माना गया है?
खुद प्रभु श्री राम ने हनुमान जी से कहा था कि तुम मुझे भरत के समान प्रिय भाई हो। इसके पीछे त्रेतायुग की एक बहुत ही रोचक और दिव्य कहानी छिपी हुई है। ये कहानी हमें राजा दशरथ के उस महल में ले जाती है जहां पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ हो रहा था।
इसके साथ ही, अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि रामायण के सबसे शक्तिशाली अध्याय का नाम हनुमान कांड के बजाय सुंदरकांड क्यों रखा गया? साल 2026 में 2 अप्रैल को हनुमान जी का जन्मोत्सवहै। आइए हनुमान जयंती के मौके पर उनके जन्म के रहस्य के बारे में जानें...
राजा दशरथ का पुत्रकामेष्टि यज्ञ
पौराणिक कथा के मुताबिक, जब राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ करवाया, तो अग्निदेव प्रकट हुए। उन्होंने दशरथ जी को एक पात्र में दिव्य खीर प्रदान की।
राजा ने ये खीर अपनी तीनों रानियों में बांट दी थी। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी और एक चील वहां आई। वह रानी कैकेयी के हाथ से खीर का एक हिस्सा लेकर उड़ गई।
उसी समय माता अंजना संतान के लिए भगवान शिव की घोर तपस्या कर रही थीं। वायुदेव ने शिवजी के आदेश पर उस चील के मुंह से खीर का वह अंश गिरा दिया। वह अंश सीधे तपस्या कर रही माता अंजना की हथेली पर जा गिरा।
अंजना ने उसे शिव का प्रसाद मानकर ग्रहण कर लिया। ऐसा कहा जााता है कि इसी खीर के प्रभाव से पवनपुत्र हनुमान जी का जन्म हुआ। क्योंकि वह खीर राजा दशरथ के यज्ञ की थी, इसलिए हनुमान जी को श्रीराम का भाई माना जाता है।
पुंजिकस्थला अप्सरा का वानर रूप में जन्म
धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, हनुमान जी की माता अंजना पिछले जन्म में स्वर्ग की अप्सरा पुंजिकस्थला थीं। एक बार उनसे अनजाने में एक तपस्वी ऋषि की साधना में बाधा पड़ गई। क्रोधित होकर ऋषि ने उन्हें वानर बनने का शाप दे दिया।
जब उन्होंने क्षमा मांगी, तो ऋषि ने कहा कि तुम्हारा अगला जन्म वानर राज केसरी की पत्नी के रूप में होगा। उन्होंने ये भी बताया कि उनका पुत्र साक्षात शिव का अवतार होगा और अमर कहलाएगा।
सुंदरकांड के नाम का असली रहस्य क्या है
धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक, रामायण के सभी कांडों के नाम किसी न किसी स्थान या अवस्था पर हैं। जैसे बालकांड या अरण्यकांड, लेकिन हनुमान जी (हनुमान जी का दिन) के पराक्रम वाले भाग का नाम सुंदरकांड है।
इसके पीछे भौगोलिक कारण बताइ जाती है। रावण की लंका तीन पर्वतों पर बसी थी, जिन्हें त्रिकूट कहा जाता था। ये पर्वत थे सुबेल, नील और सुंदर पर्वत। सुंदर पर्वत पर ही अशोक वाटिका थी, जहां हनुमान जी पहली बार माता सीता से मिले थे।
हनुमान जी की वीरता की सबसे बड़ी घटना इसी सुंदर पर्वत पर घटी थी। उन्होंने इसी स्थान पर रावण के अहंकार को तोड़ा और सीता जी का पता लगाया।
तुलसीदास जी ने इस अध्याय में हनुमान जी की बुद्धि और शक्ति का वर्णन किया है। इस कांड में सुंदर शब्द का प्रयोग कई बार हुआ है। चूंकि यह पूरी घटना सुंदर पर्वत पर आधारित थी, इसलिए इसका नाम सुंदरकांड रखा गया।
भक्ति में भाई का अनोखा भाव
हनुमान जी ने हमेशा एक छोटे भाई की तरह लक्ष्मण और भरत की सेवा की। लोक मान्यताओं में भी राम दरबार में हनुमान जी को भाइयों जैसा स्थान मिलता है।
कई त्योहारों पर जब रामजी के भाइयों की पूजा होती है, तो पांचवें भाई के रूप में हनुमान जी का नाम लिया जाता है। उनकी भक्ति ने उन्हें सेवक से ऊपर उठाकर परिवार का हिस्सा बना दिया। आज भी हनुमान जी की कृपा की शक्ति करोड़ों भक्तों के लिए सुरक्षा कवच की तरह काम करती है।
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