नहीं जानते होंगे हरतालिका तीज से जुड़ी ये कहानी, ऐसे शुरू हुई थी व्रत की परंपरा
Rules of Hartalika Teej: भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को रखा जाने वाला हरतालिका तीज का व्रत सनातन धर्म में बेहद पावन और फलदायी माना गया है। आज 14 सितंबर 2026 को यह पवित्र पर्व मनाया जाएगा। यह केवल एक धार्मिक व्रत नहीं है, बल्कि यह अटूट विश्वास, समर्पण और प्रेम का एक अलौकिक प्रतीक है।
अक्सर लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि आखिर इस कठिन व्रत को 'हरतालिका' ही क्यों कहा जाता है? इसके पीछे एक ऐसा अद्भुत पौराणिक रहस्य और गहरा त्याग छिपा है जो हर किसी को भावुक कर देता है।
भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की गई ये साधना सुहागिनों के जीवन में अखंड सौभाग्य और सुख-समृद्धि लेकर आती है। आइए जानें इस व्रत का असली रहस्य, इसके नियम और पूजा विधि।
क्यों पड़ा इस व्रत का नाम हरतालिका
भाद्रपद महीने के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हरतालिका तीज कहते हैं। इस साल यह पावन पर्व आज 14 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा। बहुत से लोग सोचते हैं कि इस व्रत का नाम हरतालिका क्यों पड़ा। इसके पीछे एक बहुत ही सुंदर और पौराणिक कथा छिपी हुई है। यह नाम संस्कृत के दो शब्दों से मिलकर बना हुआ है।
पहला शब्द 'हरत' है और दूसरा शब्द 'आलिका' है। संस्कृत भाषा में 'हरत' शब्द का सीधा अर्थ हरण करना होता है। वहीं 'आलिका' शब्द का अर्थ प्रिय सखी या सहेली होता है। माता पार्वती भगवान शिव को ही अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। लेकिन उनके पिता पर्वतराज हिमालय उनका विवाह भगवान विष्णु से तय कर रहे थे।
माता पार्वती यह बात जानकर बहुत ज्यादा दुखी और चिंतित हो गईं। उन्होंने अपनी यह व्यथा अपनी प्रिय सखी को खुलकर बताई। तब सखी ने माता पार्वती को पिता के महल से दूर छिपा दिया। सखी माता पार्वती को हरण करके एक घने जंगल में ले गई।
जंगल की एक गुप्त गुफा में माता पार्वती सुरक्षित बैठ गईं। वहां उन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की। सखी द्वारा पार्वती जी का हरण करने के कारण ही यह नाम पड़ा। इसलिए इस पावन व्रत को हरतालिका तीज कहा जाता है।
कैसे करें इस व्रत की शुरुआत
आज सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। साफ कपड़े पहनकर हाथ में जल लेकर व्रत का संकल्प लें। यह व्रत पूरी तरह से निर्जला और निराहार रखा जाता है। व्रत के दौरान पूरे दिन जल भी ग्रहण नहीं किया जाता।
अगर स्वास्थ्य ठीक न हो तो फलाहार का नियम अपना सकते हैं। लेकिन सुहागिनें परंपरा के अनुसार निर्जला व्रत ही रखती हैं। सुबह से ही घर में पूजा की तैयारियां शुरू कर देनी चाहिए।
घर के मंदिर को फूलों और रंगोली से सुंदर सजाएं। दिनभर शांत मन से भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें। मन में किसी के प्रति भी कड़वाहट न लाएं।
सोलह श्रृंगार क्यों किया जाता है
मान्यता के मुताबिक, हरतालिका तीज व्रत पर सोलह श्रृंगार करने की बहुत पुरानी परंपरा है। सुहागिन महिलाओं के लिए श्रृंगार का बहुत बड़ा महत्व होता है। सोलह श्रृंगार केवल सुंदर दिखने के लिए नहीं किया जाता है।
यह अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र का प्रतीक है। इस दिन महिलाएं लाल, हरी या पीली सुंदर साड़ी पहनती हैं। हाथों में हरी और लाल चूड़ियां पहनना बेहद शुभ होता है।
माथे पर सिंदूर, बिंदी और पैरों में आलता और बिछिया लगाएं। बालों में गजरा लगाकर पूरा पारंपरिक रूप धारण करें। पूजा के समय माता पार्वती को भी पूरा श्रृंगार अर्पित करें।
ऐसा करने से देवी पार्वती सुहागिनों को अखंड सौभाग्य देती हैं। चढ़ाया गया श्रृंगार बाद में किसी ब्राह्मण या सुहागिन को दें। इससे घर में सुख और समृद्धि हमेशा बनी रहती है।
हरतालिका तीज के नियम
इस दिन प्रदोष काल यानी शाम के समय पूजा का सबसे सही माना जाता है। पूजा के लिए नदी की शुद्ध बालू या मिट्टी लाएं। इस मिट्टी से भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी बनाएं।
अगर मिट्टी न मिले तो धातु की मूर्ति भी रख सकते हैं। एक लकड़ी की चौकी पर साफ लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। उस चौकी पर केले के पत्ते सजाकर मूर्तियां स्थापित करें।
सबसे पहले प्रथम पूज्य भगवान गणेश जी की विधि-विधान से पूजा करें। उन्हें दूर्वा, अक्षत, रोली और मोदक का भोग लगाएं। इसके बाद भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें। मूर्ति पर पंचामृत, जल और गंगाजल चढ़ाकर स्नान कराएं।
हरतालिका तीज पूजन विधि
हरतालिका तीज में इन चीजों का करें दान।भगवान शिव को सफेद चंदन का तिलक लगाएं और बेलपत्र चढ़ाएं। उन्हें भांग, धतूरा, शमी के पत्ते और आंकड़े के फूल अर्पित करें। माता पार्वती को कुमकुम, रोली, अक्षत और लाल फूल चढ़ाएं।
उन्हें सोलह श्रृंगार का पूरा सामान और चुनरी जरूर चढ़ाएं। इसके बाद धूप और दीप जलाकर हरतालिका तीज की कथा सुनें। कथा सुनना या पढ़ना इस व्रत में बहुत जरूरी होता है।
कथा के बाद भगवान शिव और माता पार्वती की आरती करें। पूरे परिवार के साथ मिलकर आरती में शामिल होना चाहिए। रात भर जागरण करके भजन और कीर्तन करने का नियम है। अगले दिन सुबह आरती के बाद ही व्रत का पारण करें।
हरतालिका तीज पर क्या करें और क्या न करें
- इस दिन किसी भी व्यक्ति से विवाद या गुस्सा बिल्कुल न करें।
- अपने शब्दों से किसी का भी दिल न दुखाएं।
- दिन में सोने से बचें और मन को पूजा में लगाएं।
- बुजुर्गों का आशीर्वाद लें और घर में खुशी का माहौल रखें।
- व्रत पूरा होने के बाद ही अन्न और जल ग्रहण करें।
- पारण से पहले किसी जरूरतमंद को दान-दक्षिणा जरूर दें।
- दान में फल, अनाज, वस्त्र या श्रृंगार का सामान दे सकते हैं।
- इससे आपकी पूजा पूरी तरह से सफल और संपन्न मानी जाएगी।
- यह पावन व्रत रिश्तों में प्रेम और विश्वास को बढ़ाता है।
- सच्चे मन से की गई पूजा से मनोकामना पूरी होती है।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
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