संतान की लंबी आयु के लिए क्यों किया जाता है जीवित्पुत्रिका व्रत, जानें शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा

Kaushiki | Sept 29, 2026, 10:25 IST
संतान की रक्षा के लिए माताएं रखेंगी निर्जला उपवास
संतान की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए माताएं 3 अक्टूबर को जीवित्पुत्रिका का निर्जला व्रत रखेंगी। दो अक्टूबर से शुरू होने वाले इस तीन दिवसीय अनुष्ठान में भगवान जीमूतवाहन की पूजा, महाभारत कथा और जितिया धागे का विशेष महत्व है। आइए जानें शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और इसकी पौराणिक कथा।

Jivitputrika Vrat: संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि की कामना के लिए रखा जाने वाला जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत इस साल तीन अक्टूबर को मनाया जाएगा।



यह व्रत हर साल आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ता है। माताओं के लिए यह उपवास बेहद खास और महत्वपूर्ण होता है। इसमें माताएं पूरे 24 घंटे बिना अन्न और जल के कठिन साधना करती हैं।



यह अनुष्ठान लगातार तीन दिनों तक पूरे नियम और भक्ति के साथ निभाया जाता है। यह व्रत संतान के प्रति मां के अटूट प्यार और समर्पण का बड़ा प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, इस उपवास से बच्चों के जीवन के सारे संकट दूर होते हैं। आइए इस व्रत का शुभ मुहूर्त और पौराणिक कथा जानें...



कब रखें जीवित्पुत्रिका व्रत

पंचांग के मुताबिक, इस बार आश्विन कृष्ण अष्टमी तिथि तीन अक्टूबर की सुबह 10:09 बजे शुरू होगी। यह तिथि चार अक्टूबर की सुबह 7:45 बजे तक बनी रहेगी। इसलिए मुख्य निर्जला व्रत तीन अक्टूबर को ही रखा जाएगा।



व्रत का पारण चार अक्टूबर को सुबह 7:45 बजे के बाद नवमी तिथि में होगा। तीन अक्टूबर को शाम के समय माताएं नदियों, तालाबों और घाटों पर पूजा करेंगी। अनुष्ठान के पहले दिन यानी दो अक्टूबर को स्नान और भोजन की परंपरा निभाई जाएगी।



जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की सुरक्षा के लिए रखा जाता है। इस व्रत को जिउतिया या जितिया नाम से भी लोग जानते हैं। मान्यता है कि यह उपवास बच्चों को हर बीमारी और दुर्घटना से बचाता है। मां अपनी संतान के खुशहाल जीवन के लिए इस दिन निर्जला व्रत रखती हैं।



व्रत की पूजा विधि

जिउतिया व्रत का अनुष्ठान तीन दिनों तक अलग-अलग चरणों में चलता है। पहले दिन नहाय-खाए की परंपरा बहुत नियम से निभाई जाती है। व्रत के दिन सुबह-सुबह में सरगी की परंपरा होती है। इसमें महिलाएं सूर्योदय से पहले सात्विक भोजन ग्रहण करती हैं। इसके बाद अगले 24 घंटे तक महिलाएं बिना पानी के कठिन व्रत रखती हैं।



शाम को प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की विधि-विधान से पूजा होती है। पूजा में झिंगनी का पत्ता, सतपुतिया की सब्जी और फल चढ़ाए जाते हैं। मिट्टी या गाय के गोबर से चील और सियारिन की मूर्ति बनाई जाती है। अगले दिन सुबह सूर्य को अर्घ्य देने के बाद ही व्रत का पारण किया जाता है। पारण के समय मड़ुआ की रोटी और नोनी का साग खाया जाता है।



जीवित्पुत्रिका व्रत की पौराणिक कथा

जिउतिया व्रत की मुख्य कथा गंधर्वराज जीमूतवाहन के महान बलिदान से जुड़ी हुई है। जीमूतवाहन बहुत दयालु, धर्मपरायण और महान राजा थे। उन्होंने अपना सारा राज्य छोड़कर जंगल में जाकर तपस्या करने का फैसला किया।



जंगल में उनकी मुलाकात एक रोती हुई वृद्ध नाग माता से हुई। वृद्ध महिला ने बताया कि पक्षीराज गरुड़ हर दिन एक नाग को खाते हैं। आज उनके इकलौते बेटे शंखचूड़ की गरुड़ के पास जाने की बारी थी। जीमूतवाहन ने वृद्ध माता के बेटे की रक्षा करने का पूरा वचन दिया।



वे खुद लाल कपड़े में लिपटकर गरुड़देव के सामने शिला पर लेट गए। गरुड़देव ने जीमूतवाहन पर हमला किया, लेकिन उनका धैर्य देखकर हैरान रह गए। जब गरुड़ को सच्चाई पता चली, तो वे जीमूतवाहन के त्याग से बहुत प्रसन्न हुए। गरुड़देव ने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों को न खाने का वचन दिया। तभी से जीमूतवाहन की पूजा संतान की रक्षा के लिए की जाने लगी।



महाभारत काल और श्रीकृष्ण से जुड़ी कथा

जीवित्पुत्रिका व्रत का संबंध महाभारत काल की एक बड़ी घटना से भी जुड़ा है। महाभारत युद्ध के अंत में अश्वत्थामा अपने पिता की मृत्यु से बहुत क्रोधित था। उसने पांडवों के वंश को खत्म करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर दिया। ब्रह्मास्त्र सीधे अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा के गर्भ में पल रहे बच्चे पर गिरा।



भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी योगमाया और सभी पुण्यों से उस बच्चे की रक्षा की। गर्भ में दोबारा जीवन मिलने के कारण उस बालक का नाम जीवितपुत्र रखा गया। आगे चलकर यही बालक चक्रवर्ती राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी कारण से माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए यह व्रत रखती हैं।



क्या इस व्रत का मां दुर्गा से संबंध है

कई लोग सोचते हैं कि जिउतिया व्रत का सीधा संबंध मां दुर्गा से है। हालांकि, पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक इसका मुख्य संबंध भगवान जीमूतवाहन और श्रीकृष्ण से है। लेकिन ये व्रत आश्विन महीने में नवरात्र के बेहद करीब पड़ता है।



नवरात्रि में मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। मां दुर्गा को जगत जननी और सभी बच्चों की रक्षक माना गया है। इसलिए कई जगहों पर माताएं दुर्गा जी की कृपा पाने के लिए भी प्रार्थना करती हैं।



जीवित्पुत्रिका व्रत में पावन धागे का महत्व

पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, जीवित्पुत्रिका व्रत में लाल या पीले रंग का एक विशेष धागा पहना जाता है। इस धागे को जितिया धागा कहा जाता है और इसे बेहद पवित्र मानते हैं। पूजा के समय माताएं इस धागे को भगवान जीमूतवाहन के चरणों में अर्पित करती हैं।



पूजा समाप्त होने के बाद इसे गले या कलाई में धारण करती हैं। यह धागा संतान के लिए एक मजबूत सुरक्षा कवच का काम करता है। इसमें बच्चों की संख्या के मुताबिक गांठें बांधी जाती हैं। धागे को कम से कम 24 घंटे पहनना बहुत जरूरी माना जाता है।



कई माताएं इसे पूरे एक साल तक श्रद्धा से बांधकर रखती हैं। इस धागे को उतारने के भी विशेष नियम बताए गए हैं। इसे मान्यताओं के मुताबिक, रविवार या मंगलवार के दिन इस धागे को नहीं उतारना चाहिए। उतारने के बाद इस धागे को किसी नदी में प्रवाहित करना चाहिए।



डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।



  1. जीवित्पुत्रिका व्रत कब मनाया जाएगा?
    जीवित्पुत्रिका व्रत इस साल तीन अक्टूबर को मनाया जाएगा, जो कि आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि है।
  2. इस व्रत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
    जीवित्पुत्रिका व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुख-समृद्धि की कामना करना है। माताएं इस दिन निर्जला व्रत रखकर अपने बच्चों की रक्षा के लिए प्रार्थना करती हैं।
  3. इस व्रत की पूजा विधि क्या है?
    जीवित्पुत्रिका व्रत में पहले दिन नहाय-खाए की परंपरा निभाई जाती है, इसके बाद महिलाएं अगले 24 घंटे तक निर्जला व्रत रखती हैं। व्रत के दिन भगवान जीमूतवाहन की पूजा होती है, जिसमें विशेष खाद्य सामग्री चढ़ाई जाती है।
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