पितरों की विदाई के वक्त ऐसा क्या है जिससे सर्वपितृ अमावस्या की महत्ता बढ़ी, धरती से लौटते वक्त पितृ क्या संकेत देते हैं
Sarv Pitru Amavasya 2026: हिंदू धर्म में पितृपक्ष का समय महत्वपूर्ण माना गया है। यह समय अपने पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति सम्मान जताने का होता है। माना जाता है कि इन दिनों हमारे पूर्वज धरती पर आते हैं। वे अपने वंशजों से मिलने और आशीर्वाद देने आते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जब पितृ वापस लौटते हैं तो क्या होता है?
शास्त्रों में पितृपक्ष का सबसे आखिरी दिन बहुत ही खास माना जाता है। इसे सर्वपितृ अमावस्या के नाम से जाना जाता है। तो ऐसे में इस दिन ऐसा क्या दान करें जिससे पितृ खुश होकर जाएं? आइए इन सभी सवालों के जवाब और इससे जुड़ी पौराणिक कथा को जानें।
कब मनाया जाएगा सर्वपितृ अमावस्या
अक्सर लोगों के मन में तिथियों को लेकर असमंजस रहता है। किन्हीं कारणों से कई बार हम अपने पितरों की मृत्यु तिथि भूल जाते हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि उनका श्राद्ध किस दिन किया जाए? पितृपक्ष की शुरुआत के बाद इसका समापन 10 अक्टूबर को होगा।
इस दिन सर्वपितृ अमावस्या मनाई जाएगी। शास्त्रों के मुताबिक, अमावस्या तिथि पितरों की विदाई का दिन होता है। इस दिन सभी पूर्वज अपने लोक लौट जाते हैं। इसलिए विदाई के समय तर्पण करना आवश्यक होता है। इससे पितृ प्रसन्न होकर अपने परिजनों को आशीर्वाद देते हैं।
कई बार लोग अपने पूर्वजों की तिथि भूल जाते हैं। ऐसे पितरों के लिए अमावस्या का दिन तय है। अगर तिथि याद न हो तो अमावस्या पर तर्पण करें। इससे भूल-चूक का दोष खत्म हो जाता है। जिनका श्राद्ध छूट गया हो उनका भी तर्पण कर सकते हैं। यह दिन सभी पूर्वजों को तृप्त करता है।
सर्वपितृ अमावस्या पर क्या दान करें
अमावस्या पर दिया गया दान सीधे पितरों तक पहुंचता है। इससे उनकी आत्मा को पूर्ण शांति मिलती है। इस दिन अन्न और काले तिल का दान करें। पंखा, पानी, छाता और जूते-चप्पल दान करना उत्तम है। पितरों के नाम पर वस्त्रों का दान भी करें। इससे घर में सुख और समृद्धि आती है।
अगर आप दान देने में सक्षम नहीं हैं तो चिंता न करें। आप सिर्फ गाय को हरा चारा खिला सकते हैं। कुत्तों और कौवों को भोजन देना भी शुभ है। इसे पंचबलि कर्म कहा जाता है। पंचबलि कर्म से भी श्राद्ध सफल हो जाता है। पितृ इतने से ही तृप्त होकर खुश हो जाते हैं।
श्राद्ध में तीन पीढ़ियों का पूजन
तर्पण में पिता पक्ष की तीन पीढ़ियों का ध्यान करते हैं। इसमें पिता, पितामह और प्रपितामह शामिल हैं। माता पक्ष की भी तीन पीढ़ियों का तर्पण होता है। इसमें माता, पितामही और प्रपितामही आती हैं। इन सभी का नाम लेकर जल अर्पित किया जाता है। इससे पूरा परिवार पितृदोष से मुक्त रहता है।
एक अक्टूबर को दोपहर से षष्ठी तिथि शुरू हुई थी। यह दो अक्टूबर सुबह तक रही। सप्तमी तिथि का श्राद्ध दो अक्टूबर को दोपहर में हुआ। दोपहर का समय श्राद्ध के लिए सही होता है। शास्त्रों में अपराह्न काल ही तर्पण के लिए उत्तम है। तिथि के समय का ध्यान रखना जरूरी है।
सर्वपितृ अमावस्या की कथा
महाभारत काल से एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है। जब दानवीर कर्ण की मृत्यु हुई तो वे स्वर्ग पहुंचे। वहां कर्ण को खाने में सोना और गहने दिए गए। कर्ण ने इंद्रदेव से इसका कारण पूछा। इन्द्र ने कहा कि तुमने जीवनभर सोना दान किया। लेकिन अपने पूर्वजों को कभी भोजन नहीं दिया।
कर्ण ने कहा कि उन्हें पितरों का ज्ञान नहीं था। तब इंद्र ने कर्ण को 16 दिन दिए। कर्ण धरती पर वापस आए और तर्पण किया। उन्होंने अन्न और जल का दान किया। इसके बाद वे वापस स्वर्ग लोक चले गए। तभी से पितृपक्ष में दान की परंपरा शुरू हुई।
पितृपक्ष में दान का महत्व
शास्त्रों के मुताबिक, पितृपक्ष में अन्न और जल का दान सबसे बड़ा माना जाता है। इससे पितरों की भूख शांत होती है। इसीलिए अमावस्या पर भूखों को भोजन कराया जाता है। ब्राह्मणों को आदर से भोजन कराना चाहिए। ऐसा करने से घर में अन्नपूर्णा का वास होता है। जीवन के सारे संकट दूर हो जाते हैं।
दस अक्टूबर को पितरों को आदर से विदा करें। सुबह स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनें। दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके जल दें। जल में तिल और दूध मिलाकर तर्पण करें। ऐसा करने से आपके परिवार पर पितरों की कृपा बनी रहेगी।
डिस्क्लेमर: इस आर्टिकल में दी गई जानकारी पूरी तरह से सही या सटीक होने का हम कोई दावा नहीं करते हैं। ज्यादा और सही डिटेल्स के लिए, हमेशा उस फील्ड के एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें।
FAQ:
- सर्वपितृ अमावस्या 2026 कब मनाई जाएगी?
सर्वपितृ अमावस्या 2026 में 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी। - इस दिन किस प्रकार का दान करना उचित है?
इस दिन अन्न, काले तिल, पंखा, पानी, छाता, और जूते-चप्पल का दान करना उत्तम माना जाता है। पितरों के नाम पर वस्त्रों का दान भी शुभ है। - पितरों की विदाई कैसे करनी चाहिए?
पितरों की विदाई करने के लिए अमावस्या के दिन स्नान कर स्वच्छ कपड़े पहनकर दक्षिण दिशा की तरफ मुंह करके जल में तिल और दूध मिलाकर तर्पण करना चाहिए।