मगरमच्छ की अजीब शर्त पर पार्वती जी ने क्यों दांव पर लगाया अपना कठोर तप
Shiv Parvati Story: सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की भक्ति का समय होता है। इस महीने में शिव कथा सुनने का बहुत बड़ा महत्व माना जाता है। शिव पुराण में भोलेनाथ के कई अवतारों का सुंदर वर्णन मिलता है।
भगवान शिव की एक कथा बहुत ही खास और ज्ञान देने वाली है। इसमें शिवजी ने मगरमच्छ का रूप धरकर माता पार्वती की कठिन परीक्षा ली थी। आइए इस पौराणिक कथाएं को जानें।
पार्वती जी का कठिन संकल्प
शिव पुराण कथा के मुताबिक,माता पार्वती भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाना चाहती थीं। इसके लिए उन्होंने जंगलों में रहकर बहुत कठिन तपस्या शुरू की। उन्होंने सालों तक अन्न और जल का पूरी तरह त्याग कर दिया था।
माता पार्वती की सच्ची भक्ति देखकर सभी देवी-देवता बहुत प्रसन्न हुए। देवताओं ने भगवान शिव से जाकर प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि वे पार्वती जी की मनोकामना जल्द पूरी कर दें।
सप्तर्षियों द्वारा ली गई परीक्षा
भगवान शिव अपने विवाह से पहले पार्वती जी की भक्ति देखना चाहते थे। इसलिए उन्होंने सबसे पहले सप्तर्षियों को पार्वती जी के पास भेजा। सप्तर्षियों ने जाकर पार्वती जी को शिवजी के अवगुण बताए।
सप्तर्षियों ने पार्वती जी को किसी अन्य देवता से विवाह की सलाह दी। लेकिन माता पार्वती अपने फैसले पर पूरी तरह से अटल रहीं। उन्होंने साफ कह दिया कि वे केवल शिवजी से विवाह करेंगी।
मगरमच्छ के रूप में शिवजी का प्रकट होना
पार्वती जी का पक्का इरादा देखकर भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए। भोलेनाथ स्वयं माता पार्वती के सामने प्रकट हो गए। उन्होंने माता पार्वती को मनचाहा वरदान दिया और अंतर्ध्यान हो गए।
वरदान मिलने के बाद भी परीक्षा अभी पूरी नहीं हुई थी। शिवजी माता पार्वती के दया भाव को पूरी दुनिया के सामने लाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने एक नई लीला रचने का विचार बनाया।
पार्वती जी जिस जगह तपस्या कर रही थीं, वहां पास में एक तालाब था। शिवजी ने अपनी माया से एक विशाल मगरमच्छ का रूप धारण किया। साथ ही उन्होंने एक छोटे बच्चे का रूप भी बनाया।
मगरमच्छ ने उस छोटे बच्चे को अपने मुंह में दबोच लिया। बच्चा अपनी जान बचाने के लिए जोर-जोर से चिल्लाने लगा। बच्चे की चीख सुनकर माता पार्वती तुरंत तालाब की तरफ दौड़ पड़ीं।
मगरमच्छ की अनोखी शर्त
माता पार्वती ने देखा कि मगरमच्छ बच्चे को पानी के अंदर खींच रहा है। बच्चा रोते हुए बोला कि मेरी रक्षा कीजिए। मेरा इस दुनिया में कोई माता-पिता या मित्र नहीं है। बालक की दुखभरी बातें सुनकर माता पार्वती का दिल पिघल गया। उन्होंने मगरमच्छ से तुरंत उस बालक को छोड़ने की प्रार्थना की। उन्होंने कहा कि इस निर्दोष बच्चे को मत मारो।
मगरमच्छ ने माता पार्वती से कहा कि यह मेरा स्वाभाविक भोजन है। दिन के छठे पहर में जो भी मुझे मिलता है, मैं उसे खा जाता हूं। इसलिए मैं इस बालक को नहीं छोड़ सकता।
माता पार्वती ने कहा कि तुम इस बालक को जीवित छोड़ दो। इसके बदले में तुम मुझसे जो मांगना चाहते हो, मांग लो। मगरमच्छ ने कहा कि मुझे आपके तप का फल चाहिए।
तप का फल दान करने का फैसला
मगरमच्छ ने शर्त रखी कि आपने शिवजी से जो वरदान पाया है, उसका फल मुझे दे दें। यदि आप अपने तप का फल मुझे देंगी, तभी बालक बचेगा। माता पार्वती ने बिना एक पल गंवाए इस शर्त को स्वीकार कर लिया। उन्होंने उस बालक की जान बचाने के लिए अपने सालों के कठोर तप का फल मगरमच्छ को दान कर दिया। तप का दान मिलते ही मगरमच्छ का शरीर सोने की तरह चमकने लगा।
मगरमच्छ ने कहा कि देवी आपने एक बच्चे के लिए अपनी पूरी पूंजी खो दी। आप चाहें तो अपना फैसला बदल सकती हैं। माता पार्वती ने कहा कि तपस्या तो मैं दोबारा भी कर सकती हूं। लेकिन अगर इस बालक की जान चली जाती, तो इसे जीवन वापस नहीं मिलता। मेरा फैसला बिल्कुल सही है।
शिवजी का असली रूप में आना
यह कहते ही मगरमच्छ और वह बालक दोनों अचानक गायब हो गए। माता पार्वती ने सोचा कि तप का फल तो चला गया। अब मुझे भोलेनाथ (शिव और सावन) को पाने के लिए फिर से तप करना होगा।
मां पार्वती जैसे ही दोबारा तप का संकल्प लेने लगीं, शिवजी प्रकट हो गए। शिवजी ने मुस्कुराते हुए कहा कि अब तुम्हें दोबारा तप करने की कोई जरूरत नहीं है। भोलेनाथ ने बताया कि वह मगरमच्छ और बालक दोनों मैं ही था।
मैंने तुम्हारे दया भाव और प्रेम की परीक्षा लेने के लिए यह लीला रची थी। तुमने अपने तप का फल मुझे ही दिया है। भगवान शिव की बातें सुनकर माता पार्वती बहुत खुश हुईं। उन्होंने भोलेनाथ के चरणों में प्रणाम किया। इसके बाद भगवान शिव ने माता पार्वती को अपनी पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया।
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