मां दुर्गा की विदाई पर क्यों पान के पत्तों से ढकते हैं मां का चेहरा, आखिर क्यों इस दिन लाल सिंदूर से खेलती हैं सुहागिनें
Durga Visarjan 2026: आज 20 अक्टूबर 2026 को पूरे देश में विजयादशमी का पर्व मनाया जा रहा है। नवरात्र के नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा होती है। मान्यता के मुताबिक, दसवें दिन मां दुर्गा अपने मायके से विदा होती हैं। मां दुर्गा अपने धाम कैलाश पर्वत वापस लौटती हैं।
भक्त अपनी मां को भारी मन से विदा करते हैं। पूजा पंडालों में विदाई का अलग ही दृश्य होता है। खासकर बंगाली समुदाय में यह दिन बेहद खास होता है। मंडपों में सिंदूर खेला की अनोखी परंपरा निभाई जाती है।
महिलाएं पारंपरिक लाल और सफेद रंग की साड़ी पहनती हैं। वे पूरे विधि-विधान से देवी मां का पूजन करती हैं। मां की विदाई में दुख और उल्लास दोनों होते हैं। अगले बरस फिर आने का वादा लिया जाता है। आइए जानते हैं इस पावन परंपरा की पूरी कहानी।
विजयादशमी पर सिंदूर खेला का पर्व
विदाई से ठीक पहले एक खास रस्म होती है। इस रस्म को वरण रस्म कहा जाता है। महिलाएं मां दुर्गा के गालों पर सिंदूर लगाती हैं। फिर वे मां को मिष्ठान और पान अर्पित करती हैं। इसके बाद सभी महिलाएं आपस में सिंदूर लगाती हैं। यह केवल रंगों का खेल बिल्कुल नहीं होता है।
यह अखंड सौभाग्य और खुशहाली का पावन प्रतीक है। महिलाएं एक-दूसरे के सुहाग की लंबी उम्र मांगती हैं। पंडालों में ढाक की तेज आवाज गूंजती है। स्वयं भक्त धुनुची लेकर भावविभोर होकर नृत्य करते हैं। चारों तरफ सुगंधित धूप और लोबान का धुआं छा जाता है। यह दृश्य हर इंसान का दिल पूरी तरह से मोह लेता है।
सिंदूर खेला का इतिहास और महत्व
सिंदूर खेला की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। इसकी शुरुआत करीब चार सौ वर्ष पहले हुई थी। पश्चिम बंगाल और जमींदार घरानों से यह शुरू हुई। सुहागिन महिलाएं मां को बेटी मानकर पूजा करती हैं।
माना जाता है कि देवी मां मायके आती हैं। दसवें दिन उनकी विदाई अपने ससुराल के लिए होती है। जैसे बेटी की विदाई पर सब सजते-संवरते हैं। उसी तरह मां दुर्गा की विदाई भी धूमधाम से होती है। महिलाएं मां की मांग में लाल सिंदूर भरती हैं।
उन्हें अखंड सुहाग का आशीर्वाद प्राप्त होता है। माना जाता है कि इससे पति की उम्र लंबी होती है। सिंदूर खेला आपसी प्रेम का बड़ा संदेश देता है। सभी महिलाएं अपने भेद-भाव पूरी तरह भूल जाती हैं। वे एक-दूसरे को लाल सिंदूर लगाकर गले मिलती हैं। घर में सुख और समृद्धि की कामना की जाती है।
पान के पत्तों से चेहरा ढकने का सच
विदाई के समय एक बहुत ही भावुक रस्म होती है। महिलाएं हाथ में पान के पत्ते लेकर आगे बढ़ती हैं। वे पान के पत्तों से मां का स्पर्श करती हैं। माना जाता है कि विदाई के समय मां भावुक होती हैं। मां दुर्गा की आंखों में आंसू आ जाते हैं।
पान के पत्तों से मां के आंसू पोछे जाते हैं। पान के पत्ते को हिंदू धर्म में बहुत शुभ मानते हैं। यह पत्ता नकारात्मक ऊर्जा को पूरी तरह खत्म करता है। पान के पत्ते से मां को बुरी नजर से बचाते हैं।
यह रस्म मां और बेटी के प्रेम को दर्शाती है। बेटी जब विदा होती है तो मां दुलार करती है। इसी तरह भक्त मां दुर्गा को दुलार करते हैं। इसके बाद मां को मीठा पान खिलाया जाता है।
धुनुची नृत्य की भक्ति और शक्ति
मान्यता के मुताबिक, विजयादशमी के दिन धुनुची नृत्य बहुत खास होता है। मिट्टी के बर्तन में नारियल का छिलका रखा जाता है। उसमें लोबान, कपूर और हवन सामग्री डाली जाती है। इसे जलाकर जो धुआं निकलता है वह पवित्र होता है।
भक्त दोनों हाथों में धुनुची लेकर नृत्य करते हैं। कई लोग दांतों से भी धुनुची पकड़कर नाचते हैं। ढाक की ताल पर यह नृत्य बहुत मनमोहक लगता है। यह नृत्य केवल आनंद के लिए नहीं किया जाता।
इसके पीछे गहरा धार्मिक और वैज्ञानिक कारण भी छुपा है। लोबान का धुआं हवा को पूरी तरह शुद्ध करता है। यह नकारात्मक शक्तियों को तुरंत दूर भगाता है।धुनुची नृत्य शक्ति और भक्ति का सुंदर मेल है। मां दुर्गा महिषासुर का वध करने से पहले प्रसन्न हुईं। इसी नृत्य से देवी को अपार शक्ति मिली थी। इसलिए विदाई से पहले मां को धुनुची अर्पित करते हैं।
विजयादशमी पर दर्पण विसर्जन की रस्म
एक और मान्यता के मुताबिक, सिंदूर खेला और नृत्य के बाद दर्पण विसर्जन होता है। एक बड़े जलपात्र में जल भरा जाता है। उसमें मां दुर्गा के मुख का प्रतिबिंब देखते हैं। माना जाता है कि मां की चेतना जल में समा जाती है। प्रतिबिंब देखने के बाद ही प्रतिमा विसर्जन होता है।
इसके बाद प्रतिमा को नदी या तालाब ले जाते हैं। पानी में प्रतिमा का विसर्जन पूरे सम्मान से करते हैं। सभी भक्त जयकारे लगाते हैं और प्रणाम करते हैं। 'आशछे बछोर आबार हवे' के नारे गूंजते हैं। इसका अर्थ है अगले साल मां फिर से आएंगी।
FAQs:
- विजयादशमी का पर्व कब मनाया जाता है और इसका महत्व क्या है?
विजयादशमी का पर्व हर साल नवरात्र के अंतीम दिन अर्थात दसवें दिन मनाया जाता है। यह पर्व मां दुर्गा की विदाई का प्रतीक है, जब वे अपने मायके से विदा होकर कैलाश पर्वत लौटती हैं। यह दिन विशेषकर बंगाली समुदाय में महत्वपूर्ण होता है। - सिंदूर खेला क्या है और इसका क्या महत्व है?
सिंदूर खेला विजयादशमी पर एक विशेष रस्म है जिसमें सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा के गालों पर सिंदूर लगाती हैं और आपस में भी सिंदूर खेलती हैं। यह रस्म अखंड सौभाग्य और खुशहाली का प्रतीक मानी जाती है। - धुनुची नृत्य का महत्व क्या है और इसे कैसे किया जाता है?
धुनुची नृत्य विजयादशमी पर किया जाता है, जिसमें भक्त मिट्टी के बर्तन में लोबान और कपूर जलाकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य मां दुर्गा को शक्ति देने का प्रतीक है और इसके माध्यम से भक्त अपनी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करते हैं।