उज्जैन की वैश्य टेकरी में 90 साल बाद फिर खुदाई की तैयारी, सांची से बड़ा बौद्ध स्तूप मिलने की उम्मीद
वैश्य टेकरी में क्या है उम्मीद
वैश्य टेकरी का नाता उस दौर से है जब अशोक अवंति का राज्यपाल था। तब वह मगध का सम्राट नहीं बना था। उज्जैन उस समय अवंति की राजधानी थी। पुरातत्वविदों (Archaeologists) को पूरा विश्वास है कि टीले के नीचे बौद्ध स्तूप है। संभावना जताई जा रही है कि यह सांची से बड़ा होगा।
सांची का स्तूप विश्व धरोहर स्थल है। अब तक उज्जैन को हिंदू तीर्थस्थल के रूप में जाना जाता है। इस उज्जैन में स्तूप की खोज से शहर की नई पहचान बन सकती है। बौद्ध अनुयायियों के केंद्र के रूप में भी इसकी साख मजबूत हो सकती है।
90 साल पहले क्या मिला था
करीब 90 साल पहले तत्कालीन ग्वालियर रियासत के आर्कियोलॉजिस्ट्स ने इलाके का रिसर्च किया। तब पता चला कि टीले के नीचे स्तूप मौजूद है। खुदाई ग्वालियर रियासत के अधीक्षक आर्कियोलॉजिस्ट एम. बी. गार्डे की अगुवाई में हुई। उसी खुदाई के आधार पर स्तूप का आधार करीब 350 फीट बताया गया।
ऊंचाई करीब 100 फीट आंकी गई। उस खुदाई में बड़ी ईंटें मिली थीं। छोटे स्तूप भी मिले थे। साथ में 32 मानव कंकालों के अवशेष भी मिले। ये कंकाल कोलकाता में भारतीय मानव विज्ञान सर्वेक्षण (Anthropological Survey of India) के म्यूजियम में रखे हैं।
सांची से कितना बड़ा हो सकता है
सांची के स्तूप की सबसे ऊंची जगह 54 फीट है। वैश्य टेकरी के स्तूप की ऊंचाई करीब 100 फीट आंकी गई थी। यानी ऊंचाई में यह करीब दोगुना ठहरता है। यही आंकड़े सांची से बड़ा स्तूप वाली चर्चा की जड़ हैं। सब इस तुलना से सहमत नहीं हैं।
अशोका यूनिवर्सिटी में इतिहास की प्रोफेसर इस तुलना को जरूरी नहीं मानतीं। उनके मुताबिक बड़ी ईंटें मौर्य काल की ओर इशारा करती हैं। संभव है कि इसमें सांची जैसी पत्थरों की भव्यता न हो।
अशोक और देवी का कनेक्शन
बौद्ध ग्रंथों के मुताबिक अशोक को अवंति का राज्यपाल बनाया गया था। उज्जैन उसकी राजधानी थी। यही वजह है कि सम्राट अशोक उज्जैन से सीधे जुड़ते हैं।अशोक ने विदिशा के एक व्यापारी की बेटी देवी से विवाह किया था।
माना जाता है कि स्तूप बनाने में देवी की भूमिका रही होगी। सांची में भी ऐसा ही माना जाता है। वैश्य टेकरी नाम का संबंध उसी व्यापारी समुदाय से बताया जाता है। इसी आधार पर स्तूप को ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के आसपास का माना जा सकता है।
सिर्फ स्तूप नहीं और भी राज
इस इलाके में मौर्य काल से भी पुराने अवशेष मिल चुके हैं। इसलिए खुदाई से कई और परतें खुल सकती हैं। प्रोफेसर लाहिड़ी का कहना है कि उज्जैन और पाटलिपुत्र के रिश्ते मौर्य काल से भी पहले के हो सकते हैं। उन्होंने प्राचीन वैद्य जीवक का उदाहरण दिया। राजगृह में रहने वाले जीवक को मौर्यों से पहले उज्जैन के शासक के इलाज के लिए बुलाया गया था।
खुदाई में क्या है अड़चन
यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण यानी एएसआई (ASI - Archaeological Survey of India) का प्रोटेक्टेड साइट है। फिर भी खुदाई के लिए आसपास की जमीन चाहिए। करीब 15 हेक्टेयर निजी जमीन का अधिग्रहण करना होगा। इस पर लगभग 40 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।
मध्य प्रदेश के संस्कृति विभाग के अपर मुख्य सचिव शिव शेखर शुक्ला ने केंद्रीय संस्कृति सचिव को पत्र लिखा है। पत्र में केंद्र से मदद मांगी गई है। यानी एएसआई उज्जैन खुदाई की राह अब केंद्र की मंजूरी पर टिकी है। 90 साल पुराने निष्कर्षों पर सरकार का ध्यान अब जाकर गया है।
पर्यटन को क्या फायदा होगा
पिछले कुछ सालों में उज्जैन में धार्मिक पर्यटन काफी बढ़ा है। इसकी बड़ी वजह महाकाल मंदिर और शहर के दूसरे मंदिर हैं। सांची से बड़ा स्तूप मिला तो उज्जैन को नई पहचान मिल सकती है। शहर अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर भी जगह बना सकता है। जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के बौद्ध पर्यटकों के लिए यह फेमस ठिकाना बन सकता है। यानी उज्जैन बौद्ध पर्यटन का भी नया केंद्र बनने की उम्मीद है।
FAQs:
- वैश्य टेकरी में बौद्ध स्तूप की खोज क्यों महत्वपूर्ण है?
वैश्य टेकरी में बौद्ध स्तूप की खोज उज्जैन की नई पहचान बनाने में मदद कर सकती है और इसे बौद्ध अनुयायियों के लिए एक प्रमुख केंद्र बना सकती है। - वैश्य टेकरी के स्तूप की ऊंचाई सांची के स्तूप से कैसे तुलना की जा सकती है?
वैश्य टेकरी का स्तूप लगभग 100 फीट ऊंचा है, जबकि सांची का सबसे ऊंचा स्तूप 54 फीट है, जिससे वैश्य टेकरी का स्तूप सांची से लगभग दो गुना अधिक ऊंचा होने की संभावना है। - उज्जैन में खुदाई के लिए क्या चुनौतियां सामने आ रही हैं?
उज्जैन का यह स्थल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण का प्रोटेक्टेड साइट है और खुदाई के लिए अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता होगी, जिसके लिए लगभग 40 करोड़ रुपए खर्च होने का अनुमान है।