भगवान शिव को क्यों लेना पड़ा अर्धनारीश्वर अवतार, बेहद अनोखी है यह कथा
Ardhanarishvara story: भगवान शिव के वैसे तो संसार में कई अद्भुत और कल्याणकारी रूप माने गए हैं। लेकिन उनका सबसे अनोखा रूप अर्धनारीश्वर का माना जाता है जो सबको आकर्षित करता है। यह रूप असल में भगवान शिव और माता पार्वती का एक संयुक्त दिव्य स्वरूप है।
यह रूप ब्रह्मांड में पुरुष और स्त्री की समानता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। यह हमें सिखाता है कि शिव और शक्ति एक दूसरे के बिना बिल्कुल अधूरे हैं। लेकिन आखिर महादेव को यह आधा पुरुष और आधा नारी का रूप क्यों लेना पड़ा था? आइए जानें...
ऋषि भृंगी का अजीब हठ
इस दिव्य घटना के पीछे शिवपुराण और लिंग पुराण में एक बहुत रोचक कथा मिलती है। पौराणिक काल में ऋषि भृंगी नाम के एक बहुत बड़े तपस्वी हुआ करते थे। ऋषि भृंगी महादेव के इतने बड़े भक्त थे कि दिन-रात सिर्फ उन्हीं का ध्यान करते थे।
मगर उनके मन में एक बहुत ही अजीब और गलत धारणा बैठ गई थी। वे माता पार्वती को भगवान शिव से पूरी तरह अलग और एक साधारण स्त्री समझते थे। इसी वजह से वे कभी भी माता पार्वती की पूजा या आदर नहीं करते थे।
कैलाश पर्वत पर जब पहुंचे ऋषि भृंगी
एक बार ऋषि भृंगी भगवान शिव के दर्शन के लिए पावन कैलाश पर्वत पर पहुंचे। वहां महादेव ध्यान में मग्न थे और माता पार्वती उनके बगल में बैठी हुई थीं। ऋषि भृंगी ने महादेव को प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करने की इच्छा जताई।
लेकिन उन्होंने माता पार्वती की परिक्रमा करने से साफ तौर पर मना कर दिया। ऋषि भृंगी का यह हठ देखकर वहां उपस्थित सभी गण हैरान रह गए। माता पार्वती को ऋषि की इस अज्ञानता पर बहुत ज्यादा दुख हुआ।
माता पार्वती ने ऋषि को समझाया
माता पार्वती ने बहुत ही शांत स्वभाव से ऋषि भृंगी को समझाने का प्रयास किया। उन्होंने कहा कि हे ऋषि! आप हमें अलग समझने की भूल बिल्कुल मत कीजिए। हम दोनों इस पूरी सृष्टि के कण-कण में एक साथ ही वास करते हैं।
हमारे बीच का यह पवित्र संबंध कभी भी अलग नहीं किया जा सकता है। परंतु ऋषि भृंगी पर माता पार्वती की इन ज्ञानभरी बातों का कोई असर नहीं हुआ। वह केवल भगवान शिव की ही परिक्रमा करने की बात पर अड़े रहे।
जब ऋषि भृंगी ने बदल लिया अपना रूप
ऋषि को आगे बढ़ता देख माता पार्वती भगवान शिव से बिल्कुल सटकर बैठ गईं। अब दोनों के बीच जरा सी भी जगह शेष नहीं बची थी। ऋषि भृंगी ने तब भी हार नहीं मानी और एक नया तरीका निकाला।
उन्होंने अपनी योग शक्ति से तुरंत एक पतले सांप का रूप धारण कर लिया। वह सांप बनकर दोनों के बीच के छोटे से छेद से निकलने का प्रयास करने लगे। वह सिर्फ शिवजी के हिस्से की परिक्रमा पूरी करना चाहते थे।
महादेव ने धारण किया दिव्य अर्धनारीश्वर रूप
ऋषि भृंगी की इस हरकत से भगवान शिव का गहरा ध्यान अचानक भंग हो गया। महादेव ऋषि की इस अज्ञानता और हठ को देखकर काफी क्रोधित हो उठे। ऋषि का भ्रम दूर करने के लिए महादेव ने तुरंत अर्धनारीश्वर रूप ले लिया।
पल भर में माता पार्वती का पूरा शरीर भगवान शिव के भीतर विलीन हो गया। अब महादेव के दाहिने भाग में पुरुष और बाएं भाग में स्त्री रूप दिखने लगा। यह अद्भुत नजारा देखकर ऋषि भृंगी कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए।
चूहे का रूप धारण कर फिर की गलती
हैरानी की बात यह है कि ऋषि भृंगी का हठ अभी भी शांत नहीं हुआ था। उन्होंने अर्धनारीश्वर रूप के बीच से भी शिवजी को अलग करने की सोची। इस बार ऋषि भृंगी ने तुरंत एक छोटे से चूहे का रूप ले लिया।
वह अर्धनारीश्वर शरीर को बीच से कुतरकर दो हिस्सों में बांटना चाहते थे। वह दोनों को अलग करके सिर्फ शिव वाले हिस्से की परिक्रमा करना चाहते थे। लेकिन प्रकृति के इस सबसे बड़े सत्य को कौन बदल सकता था।
मां पार्वती ने दिया ऋषि को श्राप
ऋषि भृंगी की इस कुटिल कोशिश देखकर माता पार्वती का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने ऋषि भृंगी को उसी समय एक बहुत ही भयानक श्राप दे दिया। माता पार्वती ने कहा कि तुम्हें अपनी माता से जो भी शरीर मिला है, वो नष्ट हो जाए।
सनातन धर्म में इंसान को मां से रक्त और मांस मिलता है। श्राप मिलते ही ऋषि के शरीर से सारा खून और मांस तुरंत गायब हो गया। वह हड्डियों का ढांचा बनकर निढाल होकर सीधे जमीन पर गिर पड़े।
ऋषि भृंगी को हुआ भूल का अहसास
शरीर में मांस न रहने के कारण ऋषि भृंगी हिलने-डुलने में भी पूरी तरह असमर्थ हो गए। तब जाकर उनकी आंखें खुलीं और उन्हें अपनी भारी भूल का अहसास हुआ। उन्होंने रोते हुए माता पार्वती और भगवान शिव से अपनी इस अज्ञानता के लिए क्षमा मांगी।
उन्होंने माना कि शिव और शक्ति सच में एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। ऋषि को सच्चे मन से पछतावा करते देख माता पार्वती का दिल भी पिघल गया। वे ऋषि भृंगी को इस हाल में देखकर दुखी हो गईं। पौराणिक कथाएं
महादेव ने दिया भृंगी को आशीर्वाद
माता पार्वती अपना श्राप वापस लेना चाहती थीं, लेकिन ऋषि भृंगी ने खुद मना कर दिया। उन्होंने कहा कि मेरा यह रूप संसार के लिए एक बहुत बड़ा सबक बनेगा। भविष्य में कोई भी व्यक्ति माता और पिता को अलग समझने की भूल नहीं करेगा।
ऋषि की ये बात सुनकर भगवान शिव और माता पार्वती (भगवान शिव का पूजन) अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने ऋषि भृंगी को अपने गणों में सबसे प्रमुख स्थान दे दिया। साथ ही महादेव ने उन्हें चलने-फिरने के लिए एक तीसरा पैर भी प्रदान किया।
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