CBSE Three-Language Policy: सीबीएसई के नए नियम से बच्चों पर बढ़ा दबाव, पैरेंट्स नाराज
5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला
- सीबीएसई ने नौवीं क्लास से तीन भाषाएं पढ़ना पूरी तरह अनिवार्य कर दिया है।
- नए नियम के तहत इनमें से दो भारतीय भाषाएं होना बहुत जरूरी है।
- इस फैसले से विदेशी भाषा सीख रहे छात्रों को बड़ा झटका लगा है।
- अभिभावकों ने इस नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।
- स्कूलों के सामने अब नए शिक्षक ढूंढने और टाइम-टेबल बदलने की चुनौती है।
CBSE के नए नियम से छात्र और पेरेंट्स परेशान
दिल्ली के स्कूलों में आजकल एक नए सरकारी नियम को लेकर काफी चर्चा है। सीबीएसई ने नौवीं क्लास से तीन भाषाएं पढ़ना एकदम जरूरी कर दिया है। इस फैसले से कई होनहार छात्रों का भविष्य दांव पर लग गया है।
एक छात्र पिछले तीन साल से लगातार जर्मन भाषा सीख रहा था। उसका सपना जर्मनी जाकर ऑटोमोबाइल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने का था। लेकिन अब नए नियम के कारण उसे अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है। ऐसे कई मामले अब सामने आ रहे हैं।
क्या है CBSE की नई तीन-भाषा नीति का पूरा गणित?
सीबीएसई बोर्ड का यह नया नियम सत्र 2026-27 से पूरी तरह लागू होगा। इसके तहत नौवीं क्लास के बच्चों को तीन भाषाएं पढ़नी होंगी। शर्त यह है कि इनमें से कम से कम दो भाषाएं भारतीय मूल की होनी चाहिए।
राहत की बात बस यह है कि दसवीं में तीसरी भाषा का बोर्ड एग्जाम नहीं होगा। अगर कोई बच्चा फ्रेंच या जर्मन पढ़ना चाहता है तो क्या होगा? वह इसे चौथी अतिरिक्त भाषा के तौर पर पढ़ सकता है। बशर्ते उसके स्कूल में इसकी पढ़ाई होती हो।
अचानक हुए बदलाव से नाराज हैं अभिभावक?
यह नया कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 की सिफारिशों पर आधारित है। इसका मकसद बच्चों को भारतीय संस्कृति और स्थानीय भाषाओं से जोड़ना है। लेकिन पेरेंट्स का कहना है कि इसे लागू करने का समय सही नहीं है।
अभिभावक रूपा ने बताया कि उनके बेटे को अब फ्रेंच भाषा छोड़नी पड़ सकती है। नौवीं क्लास में बच्चों पर मुख्य विषयों का पहले से ही बहुत दबाव होता है। ऐसे में बिल्कुल शुरू से संस्कृत जैसी नई भाषा सीखना बच्चों के लिए बहुत मुश्किल काम है।
सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा विवाद
अभिभावकों का मानना है कि भाषा सिखाने का काम प्राथमिक कक्षाओं से होना चाहिए। पहली से पांचवीं क्लास के बीच नई भाषा सिखाना काफी आसान होता है। नौवीं क्लास में आकर अचानक ऐसा नियम थोपना बच्चों के साथ ज्यादती है।
इस नीति के क्रियान्वयन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका भी दायर हुई है। कई अन्य अभिभावक भी कानूनी रास्ता अपनाने का मन बना रहे हैं। स्कूलों में कक्षाएं शुरू होने के बाद यह आदेश आने से नाराजगी और बढ़ गई है।
यूनिट टेस्ट आने से बढ़ा बच्चों में भ्रम
एक अन्य पेरेंट्स अनुष्का ने बताया कि स्कूलों में पढ़ाई पहले ही शुरू हो चुकी थी। कई स्कूलों में तो नौवीं क्लास के पहले यूनिट टेस्ट भी खत्म हो चुके थे। बच्चों ने अंग्रेजी और फ्रेंच के पेपर भी दे दिए थे।
अब बीच सत्र में अचानक नियम बदलने से बच्चे बेहद तनाव में आ गए हैं। उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे अपनी पुरानी पढ़ाई जारी रखें या नई भाषा सीखें। इस असमंजस से बच्चों की मुख्य विषयों की पढ़ाई भी प्रभावित हो रही है।
स्कूलों के सामने खड़ी हुई दिक्कतें
इस नए नियम से सिर्फ बच्चे ही नहीं बल्कि स्कूल प्रशासन भी परेशान है। टाइम-टेबल में हर हफ्ते छह से सात अतिरिक्त पीरियड जोड़ना बहुत कठिन काम है। इससे खेलकूद, लाइब्रेरी और अन्य एक्टिविटी वाले पीरियड कम करने पड़ेंगे।
इसके अलावा स्कूलों के पास योग्य भाषा शिक्षकों की भी भारी कमी है। कई प्रिंसिपलों ने माना कि उनके पास सभी क्षेत्रीय भाषाओं के टीचर नहीं हैं। ऐसे में मजबूरी में उन्हें संस्कृत को ही विकल्प के रूप में चुनना पड़ेगा।
प्रतियोगी परीक्षाओं पर पड़ सकता है असर
ममता मॉडर्न स्कूल की प्रिंसिपल पल्लवी शर्मा ने अपनी चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि अलग भाषाई पृष्ठभूमि वाले बच्चों को तालमेल बिठाने में दिक्कत होगी। इससे विज्ञान और गणित जैसे जरूरी विषयों पर ध्यान कम हो सकता है।
आगे चलकर बच्चों को कई तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं में भी बैठना होता है। भाषा के इस नए बोझ से बच्चों की रैंकिंग पर असर पड़ सकता है। एमएम पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल रूमा पाठक ने भी माना कि इसके लिए बेहतर तालमेल की जरूरत थी।
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