MP में बढ़ता स्कूल का खर्च: फीस से ज्यादा भारी पड़ रहा किताब और यूनिफॉर्म का दाम

Manya Jain | May 25, 2026, 17:14 IST
MP school education expenses
एक नए सर्वे के अनुसार मध्यप्रदेश सहित कई राज्यों में स्कूल फीस के मुकाबले अन्य खर्च 89% तक बढ़ गए हैं। अभिभावकों के लिए अब बच्चों की किताबें, यूनिफॉर्म और स्कूल वैन का किराया भरना स्कूल की मुख्य फीस से भी ज्यादा भारी साबित हो रहा है।

5 प्वाइंट में समझें क्या है पूरा मामला

  • देशभर के स्कूलों में पढ़ाई की फीस से ज्यादा अन्य खर्च बढ़ गए हैं।
  • मध्यप्रदेश में स्कूल फीस के मुकाबले बाकी खर्च 89 प्रतिशत तक पहुंच गया है।
  • अभिभावकों के लिए बच्चों का आना-जाने का किराया और किताबें बड़ी मुसीबत हैं।
  • कई राज्यों में ट्रांसपोर्ट और यूनिफॉर्म का कुल खर्च फीस से अधिक है।
  • शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच शिक्षा के खर्च में भारी अंतर है।

अभिभावकों पर बढ़ा स्कूली पढ़ाई का अतिरिक्त आर्थिक बोझ

आजकल बच्चों को स्कूल भेजना लगातार महंगा होता जा रहा है। एक नए और चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इन आंकड़ों के अनुसार अब सिर्फ स्कूल की फीस ही बड़ी बात नहीं है।



अभिभावकों के लिए असली सिरदर्द स्कूल के अन्य खर्च बन गए हैं। इनमें स्कूल आने-जाने का वाहन किराया, किताबें और यूनिफॉर्म शामिल हैं। कई राज्यों में तो यह अतिरिक्त खर्च मुख्य फीस से भी ज्यादा हो चुका है।



मध्यप्रदेश में स्कूल फीस के मुकाबले बाकी खर्च 89 प्रतिशत क्यों?

मध्यप्रदेश की बात करें तो यहां हालात काफी चिंताजनक हैं। राज्य में स्कूलों की औसत फीस 9 हजार 874 रुपए है। लेकिन इसके मुकाबले बाकी चीजों का खर्च 89% तक बैठता है।



school fees controversy mp


यहां बच्चों का ट्रांसपोर्ट यानी आने-जाने का खर्च 4 हजार 816 रुपए आता है। वहीं स्कूल ड्रेस के लिए 1 हजार 465 रुपए खर्च करने पड़ते हैं। किताबों का खर्च 775 रुपए है और अन्य खर्चे अलग हैं।



समानता के लिए लागू हुई यूनिफॉर्म

स्कूलों में यूनिफॉर्म का नियम इसलिए लागू किया गया था ताकि अमीर-गरीब का भेद मिटे। सभी विद्यार्थियों के बीच एक समानता की भावना पैदा हो सके। लेकिन अब यही ड्रेस माता-पिता के लिए एक बड़ा खर्च साबित हो रही है।



हर साल बदलती यूनिफॉर्म और महंगे दामों के कारण बजट बिगड़ जाता है। इसके साथ ही हर नए क्लास में किताबों का सेट खरीदना भी जेब पर भारी पड़ रहा है।



पूर्वोत्तर और पहाड़ी राज्यों में ट्रांसपोर्ट का खर्च बेकाबू

पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों में स्कूल जाने का खर्च सबसे ज्यादा है। असम में स्कूल की औसत फीस 11 हजार 137 रुपए है। लेकिन वहां परिवहन का खर्च ही 6 हजार 943 रुपए तक पहुंच जाता है।



मणिपुर में तो स्थिति और भी ज्यादा हैरान करने वाली है। वहां स्कूल फीस 14 हजार 555 रुपए है। जबकि गाड़ी का किराया ही अकेले 11 हजार 876 रुपए बैठता है। मेघालय और सिक्किम में भी ट्रांसपोर्ट और किताबें बहुत महंगी हैं।



गोवा, त्रिपुरा और लद्दाख में स्कूल फीस से महंगे हैं अन्य खर्चे

देश के कुछ हिस्सों में अन्य खर्चे स्कूल फीस से भी आगे निकल गए हैं। गोवा में स्कूल की औसत फीस केवल 3,508 रुपए है। मगर वहां किताबें और कोर्सेस का खर्च 2 हजार 264 रुपए है।



त्रिपुरा में स्कूल की फीस 3 हजार 134 रुपए लगती है। लेकिन बच्चों को स्कूल भेजने का गाड़ी किराया 5 हजार 747 रुपए है। लद्दाख में भी 5 हजार 500 की फीस के सामने वैन का खर्च 8 हजार 786 रुपए है।



बिहार और पश्चिम बंगाल में भी जेब पर पड़ रहा असर

हिंदी भाषी राज्य बिहार में स्कूल की औसत फीस 6 हजार 331 रुपए है। वहां गाड़ी का किराया 3 हजार 680 रुपए और यूनिफॉर्म 1 हजार 414 रुपए की है। किताबों के लिए भी 1 हजार 639 रुपए अलग से देने पड़ते हैं।



पश्चिम बंगाल में स्कूल की फीस 6 हजार 526 रुपए देखी गई है। वहां ट्रांसपोर्ट के लिए 4 हजार 356 रुपए चुकाने पड़ते हैं। जम्मू-कश्मीर में भी ट्रांसपोर्ट और किताबों का खर्च काफी ज्यादा है।



शहरी और ग्रामीण की फीस में जमीन-आसमान का अंतर

यह आंकड़े शहर और गांवों के बीच के बड़े अंतर को भी दिखाते हैं। शहरों में बच्चों की पढ़ाई पर सालाना औसत खर्च 19 हजार 457 रुपए है। इसमें स्कूल फीस 7 हजार रुपए और यूनिफॉर्म 2 हजार 962 रुपए है।



वहीं ग्रामीण इलाकों में कुल खर्च आधा यानी 8 हजार 120 रुपए ही है। गांवों में स्कूल फीस औसतन 4 हजार 650 रुपए बैठती है। गांवों में ट्रांसपोर्ट का खर्च भी शहरों के मुकाबले काफी कम है।



कहां है सुधार की जरूरत?

इन आंकड़ों से साफ है कि सरकारों को अब केवल फीस पर लगाम नहीं लगानी चाहिए। उन्हें ट्रांसपोर्ट और किताबों के बढ़ते दामों पर भी नजर रखनी होगी। कई निजी स्कूल हर साल महंगी किताबें बदलते हैं।



इस पर तुरंत रोक लगनी चाहिए ताकि आम परिवारों को राहत मिल सके। जब तक इन छिपे हुए खर्चों को कम नहीं किया जाएगा, तब तक शिक्षा सस्ती नहीं होगी।



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