नाना पाटेकर श्रद्धांजलि: नॉन एसी गाड़ी देख बोले, मैं तो गांव का आदमी हूं, डॉ ललित श्रीवास्तव की यादें
दिग्गज अभिनेता नाना पाटेकर अब हमारे बीच नहीं हैं। 8 अक्टूबर 2026 को गोवा में उनका निधन हो गया। वे 75 साल के थे। इस खबर के बाद भोपाल से जुड़ी उनकी एक याद फिर सामने आई है। यह याद भोपाल के नेत्र विशेषज्ञ डॉ ललित श्रीवास्तव ने साझा की है।
नाना पाटेकर निधन से ताजा हुई याद
डॉ ललित श्रीवास्तव भोपाल के शासकीय कमला नेहरू अस्पताल में नेत्र विशेषज्ञ हैं। नाना पाटेकर निधन की खबर से उन्हें 15 साल पुरानी एक दोपहर याद आई। उस दिन उन्होंने परदे के नाना को नहीं, एक सीधे-सादे इंसान को देखा था। नाना पाटेकर स्मृति शेष के तौर पर यह किस्सा उन्हीं की जुबानी है।
नाना पाटेकर भोपाल में शूटिंग पर थे
उन दिनों नाना पाटेकर किसी फिल्म की शूटिंग के लिए भोपाल आए थे। वे नूर-उस-सबाह होटल में ठहरे थे। यह Nana Patekar Bhopal से जुड़ा एक कम सुना किस्सा है। तब मदन मोहन जोशी एक कैंसर अस्पताल खड़ा करने में लगे थे। यह था जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल भोपाल।
जोशी जी ने डॉ ललित से कहा कि नाना पाटेकर को अस्पताल दिखाओ। उनका मानना था कि बड़े लोगों के आने से अच्छे काम का प्रचार होता है। वे कहते थे कि अच्छी चीजों के लिए लॉबिंग करनी चाहिए।
व्यवस्था की बात पर बोले, ऐसे ही आ जाऊंगा
डॉ ललित नूर-उस-सबाह पहुंचे। नाना पाटेकर बड़ी सहजता से मिले। डॉ ललित ने उनसे अस्पताल देखने और मरीजों से बात करने का आग्रह किया। नाना ने तुरंत हामी भरी और बोले, "अभी चलो।"
डॉ ललित ने कहा कि कल चलेंगे, थोड़ी व्यवस्था कर लेंगे। नाना का जवाब था, "व्यवस्था क्या करनी? मैं ऐसे ही आ जाऊंगा।" अगले दिन सुबह 11:30 बजे का समय तय हुआ।
"कोई लड़की थोड़ी हूं" वाला किस्सा
अगले दिन डॉ ललित होटल पहुंचे। साथ में नई दुनिया के वरिष्ठ पत्रकार पूर्णेंदु शुक्ला थे। नाना कमरे के कोने में अकेले बैठे थे। वे सैंडो बनियान और जींस पहने हुए थे।
डॉ ललित ने बाहर इंतजार करने की बात कही। नाना हंसकर बोले, "अरे नहीं, अंदर ही बैठो। कोई लड़की थोड़ी हूं।" फिर झट से शर्ट पहनी और टखने तक के जूते पहन लिए।
गुलजार साहब के गाल खींचे, फिर मांगी बीड़ी
नीचे गुलजार साहब होटल की बग्घी में बैठे थे। नाना उनके बड़े लाड़ले थे। नाना ने प्यार से उनके दोनों गाल खींचे। फिर पूछा, "क्यों दादा, बहुत बदतमीज लगता हूं ना मैं आपको?"
गुलजार साहब मुस्कराकर बोले, "नहीं नाना, बिल्कुल नहीं।" इसके बाद नाना ने कहा, "चलो, बीड़ी पिलाओ मुझे।"
कैंसर अस्पताल से पहले फेंकी बीड़ी
बीड़ी आई। नाना ने दो कश लिए और अचानक रुक गए।
फिर बीड़ी फेंककर बोले, "सॉरी डॉक्टर, अपन कैंसर अस्पताल जा रहे हैं।" डॉ ललित कहते हैं, यह बात आज भी मन में बसी है। नाना पाटेकर के किस्से में यह पल सबसे खास है।
नॉन एसी गाड़ी पर बोले, मैं तो गांव का आदमी
पूर्णेंदु शुक्ला की गाड़ी में एसी नहीं था। नाना बोले, "क्या फर्क पड़ता है? मैं तो गांव का आदमी हूं। चलिए।"
मरीजों से एक घंटे तक बातचीत
अस्पताल में नाना करीब एक घंटा रहे। वे लगभग हर मरीज से मिले। उन्होंने तकलीफ, बीमारी की अवधि, गांव और परिवार के बारे में पूछा।
कई मरीजों से उन्होंने यह भी पूछा कि समय पर ध्यान क्यों नहीं दिया। बीमारी की जल्दी जांच और पहचान पर भी बात की। डॉ ललित के मुताबिक, नाना ने कुछ मरीजों की मदद का वादा भी किया।
बॉम्बे में डिनर और पुणे फार्महाउस का न्योता
उन दिनों मोबाइल आम नहीं थे। जाते समय नाना ने अपना लैंडलाइन नंबर दिया। बोले, "डॉक्टर, बॉम्बे आओ तो मिलना।" डिनर के आग्रह पर कहा, "यू टेक डिनर विद मी एट बॉम्बे।" उन्होंने पुणे के अपने फार्महाउस पर आने का न्योता भी दिया।
इस मुलाकात की कोई तस्वीर डॉ ललित के पास नहीं है। तब हर हाथ में कैमरे वाला फोन नहीं होता था। Nana Patekar death की खबर ने वह डेढ़ घंटा फिर जिंदा कर दिया।
डॉ ललित की नजर में नाना का असली चेहरा
नाना पाटेकर श्रद्धांजलि के मौके पर यह किस्सा उनकी सादगी बताता है। सोचिए एक बार, कितने सितारे बिना तामझाम अस्पताल पहुंचते हैं?
लेखक: डॉ. ललित श्रीवास्तव
नेत्र रोग विशेषज्ञ, शासकीय कमला नेहरू अस्पताल, भोपाल।
महासचिव, यूनाइटेड डॉक्टर्स फेडरेशन।
अध्यक्ष, एसोसिएशन ऑफ कम्युनिटी ऑप्थैल्मोलॉजी, मध्यप्रदेश।