अब ऑस्कर में भी कास्टिंग के लिए मिलेगा अवार्ड, जानें कैसे चुने जाते हैं किरदार
Oscars Casting Award: सिनेमा जगत के सबसे बड़े अवार्ड ऑस्कर में अब एक नया बदलाव हुआ है। इस बार से ऑस्कर में कास्टिंग डायरेक्टर्स के काम को पहचान मिली है। ऑस्कर अवार्ड्स में अब कास्टिंग के लिए अलग कैटेगरी की शुरुआत की गई है। इसका पहला ऐतिहासिक अवार्ड साल 2026 के समारोह में दिया गया।
हॉलीवुड की मशहूर फिल्म वन बैटल आफ्टर अनदर को यह पहला सम्मान मिला है। इस फिल्म की कास्टिंग डायरेक्टर कैसेंड्रा कुलुकुंडिस को अवार्ड मिला। भारतीय सिनेमा में भी पिछले कुछ सालों में कास्टिंग की सोच बदली है। पहले के दौर में कलाकार अक्सर एक जैसे रोल में सिमट जाते थे।
एक पुराना उदाहरण पुलिस इंस्पेक्टर का रोल निभाने वाले जगदीश राज खुराना का है। उन्होंने 144 फिल्मों में पुलिस का रोल निभाकर वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया था। लेकिन अब समय पूरी तरह बदल चुका है। अब हर नए किरदार के लिए सबसे सूटेबल फेस तलाशा जाता है।
देश के तीन बड़े डायरेक्टर्स के अनुभव
हाल ही में ओटीटी (ऑस्कर अवॉर्ड) पर स्ट्रीम हुई सीरीज मेड इन इंडिया काफी चर्चा में है। इसमें नसीरुद्दीन शाह ने जेआरडी टाटा का बेहतरीन किरदार निभाया है। इसी तरह फिल्म छावा में अक्षय खन्ना ने औरंगजेब का रोल प्ले किया है।
सैम बहादुर में विक्की कौशल ने भी कमाल का एक्टिंग किया है। इन सभी किरदारों की सफलता (Audition) के पीछे कास्टिंग डायरेक्टर्स की कड़ी मेहनत छिपी है। आइए जानते हैं कि यह पूरी कास्टिंग प्रोसेस कैसे काम करती है।
मशहूर कास्टिंग डायरेक्टर टेस जोसेफ ने अपने कुछ बड़े प्रोजेक्ट्स के अनुभव शेयर किए। उन्होंने सितारे जमीन पर और द व्हाइट टाइगर की कास्टिंग की है। टेस ने बताया कि किरदारों को चुनने की ये प्रोसेस कई महीनों तक चलती है।
फिल्म सितारे जमीन पर की कास्टिंग करीब नौ महीने तक चली थी। उनकी टीम ने न्यूरोडायवर्जेंट समुदाय को समझने के लिए ऑस्ट्रेलिया की संस्था के साथ वर्कशॉप की। इसके बाद करीब 1000 ऑडिशन टेप देखे गए।
फोटो देखकर नहीं मिलती बड़ी फिल्में
कई बार एक्टर्स को परखने के लिए Two Actors, Two Minutes सेशन कराया जाता है। इसमें दो कलाकारों को एक साथ एक स्क्रीन सीन दिया जाता है। इससे यह देखा जाता है कि वे एक-दूसरे को कितना सुनते हैं। वे कैसे रिएक्ट करते हैं और उनका एक्टिंग कितना सहज लगता है।
दूसरे बड़े कास्टिंग डायरेक्टर यश नगरकोटी ने भी अपने अनुभव साझा किए हैं। उन्होंने मेड इन इंडिया और डब्बा कार्टेल जैसे प्रोजेक्ट्स किए हैं। यश का मानना है कि किसी बायोग्राफी में सिर्फ फोटो देखकर कास्टिंग नहीं होती। पहले किताबों और उपलब्ध स्रोतों से उस इंसान को समझा जाता है।
इसके बाद ही ऐसे कलाकार को चुना जाता है जो सबसे स्वाभाविक लगे। मेड इन इंडिया में नसीरुद्दीन शाह का व्यक्तित्व जेआरडी टाटा से मिलता था। इसलिए उनके किरदार के लिए टीम को भारी मेकअप की जरूरत नहीं पड़ी।
वहीं जिम सरभ ने जेरक्सेस देसाई का किरदार निभाया था। जिम सरभ ने विग पहनने के बजाय पूरे शूट के दौरान बाल शेव किए। ऐसा इसलिए किया गया ताकि वे स्क्रीन पर बिल्कुल वास्तविक लग सकें।
छोटे शहरों से हो रही असली खोज
तीसरे चर्चित कास्टिंग डायरेक्टर वैभव विशांत ने इस काम का इतिहास बताया। उन्होंने छावा, मामला लीगल है और मैदान जैसी फिल्में की हैं।
वैभव ने बताया कि करीब 15 साल पहले कास्टिंग का विभाग नहीं होता था। तब कलाकार चुनने की जिम्मेदारी खुद फिल्म निर्देशक ही संभालते थे। लेकिन समय के साथ नए चेहरों की जरूरत बहुत ज्यादा बढ़ गई। इसके बाद कास्टिंग सिनेमा इंडस्ट्री में एक अलग प्रोफेशन बन गया। अब कास्टिंग टीमें देश के छोटे शहरों और स्थानीय कलाकारों तक पहुंचती हैं।
वे नए टैलेंट को खोजने के लिए हर जगह जाती हैं। मामला लीगल है जैसी सीरीज में अलग राज्यों के थियेटर कलाकारों को मौका मिला। इससे कहानी में एक अलग तरह का देसीपन नजर आता है। आज सही कलाकार ढूंढने के लिए उस दुनिया तक जाना पड़ता है। जहां वह किरदार वास्तव में अपनी असल जिंदगी में मौजूद होता है।
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