Friendship recession: दोस्तों से मिलना भूल रहे किशोर? 41 साल में आधी रह गई रोज की मुलाकात

Arohi Raj | Sootr Creatives | Oct 28, 2026, 14:26 IST
किशोरों में अकेलापन बढ़ रहा है।
In the United States, the proportion of 12th-grade students who meet with friends daily has fallen from 52 percent in 1976 to 28 percent. In India, too, there is growing concern regarding teen loneliness and screen time.
अमेरिका में रोज दोस्तों से मिलने वाले 12वीं के छात्र 1976 के 52 फीसदी से घटकर 28 फीसदी रह गए हैं। भारत में भी किशोरों में अकेलापन (teen loneliness) और स्क्रीन टाइम की चिंता बढ़ रही है। इसे फ्रेंडशिप रिसेशन (friendship recession) कहा जा रहा है। असर रिपोर्ट 2023 के मुताबिक, 90.5 फीसदी ग्रामीण युवा सोशल मीडिया चलाते हैं।

आखिरी बार आपके बच्चे ने दोस्तों के साथ गली में कब क्रिकेट खेला था? अमेरिका का एक बड़ा सर्वे इसी सवाल का डराने वाला जवाब देता है। वहां 1976 में 12वीं के 52 फीसदी छात्र लगभग रोज दोस्तों से मिलते थे। अब यह आंकड़ा घटकर सिर्फ 28 फीसदी रह गया है। यानी 41 साल में दोस्तों से रोज की मुलाकात लगभग आधी हो गई। यह कहानी सिर्फ अमेरिका की नहीं है। भारत में भी किशोरों में अकेलापन अब घर-घर की चिंता बन रहा है।



अमेरिकी सर्वे ने क्या दिखाया

यह डेटा मिशिगन यूनिवर्सिटी के मॉनिटरिंग द फ्यूचर सर्वे से आया है। स्टडी के मुताबिक, 2012 में 26 फीसदी छात्र अक्सर अकेलापन महसूस करते थे। 2017 में यह आंकड़ा 39 फीसदी पहुंच गया। खुद को अलग-थलग महसूस करने वाले भी 30 से बढ़कर 38 फीसदी हो गए। यही किशोरों में अकेलापन का बढ़ता संकट है।



2010 के बाद तेजी से गिरा ग्राफ

1976 से 2005 तक गिरावट धीमी थी, लेकिन असली गिरावट 2010 के बाद शुरू हुई। यही वह दौर था, जब किशोरों के हाथों में स्मार्टफोन पहुंचा। दुनिया इसे अब फ्रेंडशिप रिसेशन यानी दोस्ती की मंदी कहने लगी है।



भारत में स्क्रीन टाइम कितना है

असर रिपोर्ट 2023 में ग्रामीण भारत के 14 से 18 साल के युवाओं का सर्वे हुआ। असर (Annual Status of Education Report) प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन का सर्वे है। यह 26 राज्यों के 28 जिलों में हुआ। इसमें 34 हजार 745 युवाओं से बात की गई। करीब 90 फीसदी युवाओं के घर में स्मार्टफोन है और वे उसे चलाना जानते हैं। सर्वे से पहले के एक हफ्ते में 90.5 फीसदी युवाओं ने सोशल मीडिया चलाया। लेकिन इनमें से सिर्फ आधे ही ऑनलाइन सुरक्षा की सेटिंग जानते थे।



सोशल मीडिया चलाने में लड़के आगे

सोशल मीडिया के इस्तेमाल में लड़के और लड़कियों में फर्क दिखा। 93.4 फीसदी लड़कों ने सोशल मीडिया चलाया, लड़कियों में यह 87.8 फीसदी रहा। फोन रखने में फर्क और भी बड़ा है। 43.7 फीसदी लड़कों के पास अपना स्मार्टफोन है, जबकि लड़कियों में सिर्फ 19.8 फीसदी के पास।



बच्चों का स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए

छोटे बच्चे भी इससे बचे नहीं हैं। एम्स (All India Institute of Medical Sciences) की अगुवाई में एक शोध हुआ है। इसके मुताबिक पांच साल से छोटे बच्चे रोज औसतन 2.2 घंटे स्क्रीन देखते हैं। तो बच्चों का स्क्रीन टाइम कितना हो? इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स के मुताबिक, पांच साल तक के बच्चों के लिए यह एक घंटे से कम हो। बड़े बच्चों में स्क्रीन, खेल, नींद और पढ़ाई का संतुलन जरूरी है। स्क्रीन टाइम फॉर टीनएजर्स पर भी यही सलाह लागू होती है।



एक सायरन ने बदल दी गांव की शाम

महाराष्ट्र के सांगली जिले में मोहित्यांचे वडगांव नाम का गांव है। वहां रोज शाम 7 बजे भैरवनाथ मंदिर से सायरन बजता है। सायरन बजते ही लोग मोबाइल और टीवी बंद कर देते हैं। रात 8.30 बजे दूसरा सायरन बजता है। इस दौरान बच्चे पढ़ाई करते हैं। बड़े पढ़ने-लिखने और आपसी बातचीत में समय बिताते हैं। यह डिजिटल डिटॉक्स 15 अगस्त 2022 को शुरू हुआ। यह पहल डिजिटल डिटॉक्स विलेज इंडिया के तौर पर देश-दुनिया के मीडिया में चर्चा में रही।



सरपंच ने क्यों बजाया सायरन

क्या फोन ही अकेलेपन की वजह है

यूसी बर्कले की एक स्टडी में स्क्रीन के घंटों से ज्यादा उसकी क्वालिटी अहम निकली। दोस्तों से जुड़ी ऑनलाइन बातचीत अकेलापन घटा भी सकती है। फिर भी सोशल मीडिया एडिक्शन और सोशल मीडिया का असर, दोनों पर पेरेंट्स को नजर रखनी होगी। गांव में करीब तीन हजार 520 लोग और 750 घर हैं। रिपोर्टों के मुताबिक जिले के पांच दूसरे गांवों ने भी यह मॉडल अपनाया है।



लोकल कनेक्शन

मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले में भी बच्चों के स्क्रीन टाइम पर शोध हुआ है। मई से अगस्त 2021 के बीच 36 शहरी वार्ड और 36 गांवों में घर-घर सर्वे किया गया। इसमें 3 से 15 साल के 18 फीसदी बच्चे रोज दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन देखते मिले। शोध में स्क्रीन टाइम का असर खेलकूद, नींद, आंखों और सिरदर्द पर भी परखा गया।



यह खबर क्यों जरूरी है

दोस्ती सिर्फ मनोरंजन नहीं, बच्चे के सामाजिक विकास की पहली पाठशाला है। संविधान का अनुच्छेद 39(f) राज्य से कहता है कि बच्चों को स्वस्थ तरीके से विकसित होने के अवसर मिलें। खेल के मैदान और आमने-सामने की बातचीत इसी विकास का हिस्सा हैं। अगर किशोर फोन में सिमट गए, तो सहयोग, संवाद और भाईचारे जैसे मूल्य कमजोर पड़ेंगे। यह खबर परिवार, स्कूल और पंचायत तीनों को अपनी भूमिका याद दिलाती है।



FAQs



  1. बच्चों का स्क्रीन टाइम कितना होना चाहिए?
    इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स पांच साल तक के बच्चों के लिए एक घंटे से कम स्क्रीन टाइम की सलाह देती है। बड़े बच्चों के लिए खेल, नींद और पढ़ाई के साथ स्क्रीन टाइम में संतुलन बनाना आवश्यक है।
  2. मोहित्यांचे वडगांव का डिजिटल डिटॉक्स क्या है?
    मोहित्यांचे वडगांव में हर शाम 7 से 8:30 बजे तक मोबाइल और टीवी बंद करने की पहल को डिजिटल डिटॉक्स कहा जाता है। इसका सायरन बजने से लोग डिजिटल उपकरणों से दूर होते हैं और इस पहल की शुरुआत 15 अगस्त 2022 को हुई थी।
  3. किशोरों में अकेलेपन के बढ़ने का कारण क्या है?
    किशोरों में अकेलेपन के बढ़ने का मुख्य कारण स्मार्टफोन का बढ़ता उपयोग और सामाजिक संपर्क की कमी है। अमेरिकी सर्वेक्षण के अनुसार, 2012 में 26% किशोरों ने अकेलापन महसूस किया, जो 2017 में बढ़कर 39% हो गया।
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