NEWS STRIKE: बांकीपुर में PK की जीत, दतिया में कांग्रेस, BJP को करारा झटका

Harish Divekar | Aug 04, 2026, 07:00 IST
Photograph: (THESOOTR)
NEWS STRIKE: बांकीपुर और दतिया उपचुनाव में बीजेपी को बड़ा झटका लगा। PK की जीत और कांग्रेस की बढ़त ने संगठन, रणनीति और नेतृत्व पर सवाल खड़े किए।

News Strike | न्यूज स्ट्राइक:विधानसभा उपचुनाव के नतीजे वैसे तो सबके सामने हैं। फिर भी बता देता हूं। ये नतीजे बीजेपी के नए अध्यक्ष नितिन नबीन के लिए एक बड़ा झटका है। इस चुनाव में सीट तो दूर की बात वो अपना बूथ भी नहीं बचा सके। नरोत्तम मिश्रा के बूथ पर भी बीजेपी को हार मिली है।



बांकीपुर में पीके की जनसुराज, दतिया में कांग्रेस और गुजरात में बीजेपी। कुल जमा एक सीट है जिसने डबल इंजन सरकार की नाक बचाई है और बीजेपी के नए नवेले अध्यक्ष नितिन नबीन की नाक भी बचाई है। वर्ना हम कह सकते हैं कि वो अपनी पारिवारिक सीट से भी हाथ धो बैठे हैं। और तो और दतिया की वो सीट भी हार गए जिसे जीतने के लिए जमकर सियासी ड्रामा हुआ।



सीट खाली कराने का तरीका जितना नाटकीय था। नतीजे आने तक दोनों बड़ी पार्टियों की हर एक चाल उतनी ही ड्रामेटिक थी। इस चुनाव में स्ट्रेटजी से लेकर सबोटाज दोनों ही सीटों पर दिखाई दिया। बांकीपुर में पढ़े लिखे मतदाता बीजेपी से नाराज दिखे हैं तो दतिया में पूर्व मंत्री के समर्थकों की नाराजगी ही पार्टी पर भारी पड़ती नजर आई।



दिग्गज हारे अपने बूथ, BJP में मचा हड़कंप

बांकीपुर और दतिया में बीजेपी की हार बहुत कुछ कहती है। हम विस्तार से बात करें उसके पहले कुछ फेक्टर्स पर नजर डाल लेते हैं। बांकीपुर वो सीट है जहां बीजेपी का कॉन्फिडेंस उसे ले डूबा।



बीजेपी सांसद रविशंकर प्रसाद ने कहा कि बांकीपुर से बीजेपी कुत्ता बिल्ली को भी उतारेगी तो जीत जाएंगे, लेकिन नतीजा ये हुआ कि खुद नितिन नबीन और वो अपना बूथ नहीं बचा सके। और तो और दतिया में नरोत्तम मिश्रा अपने बूथ पर हार गए। इसलिए कहते हैं कि अति किसी चीज की अच्छी नहीं होती।



इस हार के बाद खुद नरोत्तम मिश्रा ने ये कहा कि ये उनकी चुनावी राजनीति का पटाक्षेप है। मैं ये कहूं कि ये निराशा की पराकाष्ठा है तो इस वक्त ये बिलकुल गलत नहीं होगा। प्रदेश में मोहन यादव सरकार ये दूसरा उपचुनाव हारी है। इससे पहले विजयपुर का चुनाव भी बीजेपी हार गई थी।



सरकार के तौर पर ये उनका दूसरा फेलियर है और हेमंत खंडेलवाल की पहली नाकामी है। उनके अध्यक्ष बनने के बाद ये पहला उपचुनाव था जिसमें पार्टी को करारी शिकस्त मिली है।



वोटर की लाठी चली, दिग्गजों के गढ़ ढहे

साम, दाम, दंड, भेद। चुनावी मैदान में सिर्फ दो दल और उनकी रणनीति ही आपस में नहीं भिड़ती। एक एक चाल में इन चारों बातों का भी खास ध्यान रखा जाता है।



यही एक रण है जहां बीजेपी अपने इलेक्शन मैनेजमेंट पर आंख मूंदकर भरोसा नहीं कर सकती। कांग्रेस चाहे लाख ईवीएम पर सवाल उठा ले, लेकिन अपनी जीत पर उसका मुंह सिल जाता है।



किसी भी चुनाव में कोई एक फैक्टर कॉन्स्टेंट है तो वो है बस वोटर। आज आए विधानसभा उपचुनाव के नतीजों ने भी यही साबित कर दिया है। मतदाता की मर्जी के आगे न डबल इंजन की गाड़ी रफ्तार पकड़ सकती है और न किसी पार्टी की सरकारी मशीनरी उसके मत को डिगा सकती है।



बात बिहार के बांकीपुर की हो या फिर मप्र के दतिया की। दोनों सीटें इसी बात की गवाही दे रही हैं। कहते हैं भगवान की लाठी बेआवाज होती है और दोनों चुनावों के नतीजे बताते हैं कि वोटर की आवाज कितनी भी अनसुनी की जाए, फैसला वही होता है जो वो चाहता है।



गुजरात के मांजलपुर में बीजेपी ने बंपर जीत हासिल की है, लेकिन क्या दो इंपोर्टेंट सीटों की हार को भुलाकर बीजेपी और पार्टी के नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन इस जीत का जश्न मना सकेंगे।



नितिन नबीन के गढ़ में कैसे टूटा तिलिस्म

सबसे पहले हम बात करते हैं बांकीपुर सीट की। ये सीट बिहार की बहुत ही हाई प्रोफाइल सीट है। सबसे पहले तो इसी मायने में हाई प्रोफाइल है कि ये सीट बीजेपी अध्यक्ष नितिन नबीन की सीट है। वो भी आज से नहीं बल्कि एक पीढ़ी पहले से।



वैसे तो इस सीट के 1957 से अब तक के सियासी इतिहास में अलग-अलग पार्टियों को जीत मिलती रही, लेकिन 1995 के चुनाव से ये बीजेपी का गढ़ बन गई। बीजेपी का क्या हम कह सकते हैं कि ये नवीन परिवार का गढ़ बन गई।



1995 के बाद से अब तक यहां सिर्फ दो ही विधायक रहे एक नवीन किशोर प्रसाद सिन्हा। जो इस सीट से चार बार विधायक बने और उसके बाद नितिन नबीन, जो किशोर प्रसाद सिन्हा के बेटे हैं।



2006 के उपचुनाव में उन्होंने यहां से पहली बार जीत हासिल की। उसके बाद से अलग-अलग दलों के बड़े-बड़े सूरमा भी उन्हें बांकीपुर से शिकस्त नहीं दे पाए।



PK ने पलटी बाजी, नितिन का गढ़ ढहा

शत्रुघ्न सिन्हा के बेटे लव सिन्हा ने 2020 के चुनाव में उन्हें चुनौती दी। पुष्पम प्रिया चौधरी ने भी इसी चुनाव में उन्हें चैलेंज किया, लेकिन दोनों नितिन नबीन के हाथ से ये सीट नहीं छुड़ा पाए। जो बड़ी-बड़ी पार्टी के दिग्गज नहीं कर पाए वो प्रशांत किशोर ने कर दिखाया।



ये बात भी गौर कीजिएगा कि पहली बार विधानसभा चुनाव में उतरे चुनावी मास्टर माइंड प्रशांत किशोर उर्फ पीके अपनी पार्टी का खाता भी नहीं खुलवा सके थे। बांकीपुर चुनाव उन्हें किस्मत से मिला एक नया और ताजा मौका था। उनके चुनावी रणनीतिकार की छवि को सबसे बड़ा चैलेंज भी।



नितिन नबीन की पारंपरिक सीट को जीतकर उन्होंने अपनी साख और अपनी पहचान दोनों को बचा लिया है। एक बात और, इस सीट का नाम भले ही बांकीपुर हो, लेकिन ये बिहार का पॉश और काफी पढ़ा लिखा इलाका है। यानी यहां जागरुक मतदाताओं की संख्या ज्यादा है। क्या यहां के पढ़े लिखे वोटर्स बीजेपी से नाराज थे।



दतिया में सियासी चक्रव्यूह का उलटा वार

अब बात दतिया की करते हैं। पॉलिटिकल ड्रामा कहने की जगह अगर इसे पॉलिटिकल एपिक कहा जाए तो भी कुछ गलत नहीं होगा। कांग्रेस के राजेंद्र भारती से ये सीट हासिल करने के लिए जाल बिछाया किसी और ने। टिकट मिला किसी और को और जीता कोई और।



साल 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के राजेंद्र भारती ने दतिया से जीत हासिल की थी। बीजेपी के कद्दावर मंत्री नरोत्तम मिश्रा को मात देकर वो विधानसभा पहुंचे थे, लेकिन 1998 के ब्याज लेने में गड़बड़ी करने के एक मामले का जिन्न अचानक बाहर निकला।



अदालत ने उस मामले पर राजेंद्र भारती को तीन साल की सजा सुनाई। रातों रात उनकी कुर्सी छिन गई। इस पूरे सियासी चक्रव्यूह का मास्टरमाइंड नरोत्तम मिश्रा को माना गया। ये हम नहीं कर रहे हैं। ये वो अटकलें हैं जो इस घटनाक्रम के बाद सियासी गलियारों में खूब सुनी और सुनाई गईं।



टिकट कटा, समर्थक रूठे और बदल गई बाजी

कांग्रेस ने भारती की विधायकी बचाने की जी तोड़ कोशिश की, लेकिन कोई कोशिश काम नहीं आई। ये बात इसी साल मार्च और अप्रैल के बीच की है। तब से जो सियासी ड्रामा शुरू हुआ। आज के नतीजों के साथ उसका पटाक्षेप हो गया है। भारती की सीट गई, दतिया में उपचुनाव तय हुए।



इसके बाद वो दिन भी आया जब पार्टियों को अपने अपने कैंडिडेट डिक्लेयर करने थे और नामांकन भरा जाना था। बताया जाता है कि नरोत्तम मिश्रा ने टिकट मिलने से पहले ही नामांकन पत्र खरीद भी लिया। वो कहते हैं न कॉन्फिडेंस अच्छा होता है, लेकिन ओवरकॉन्फिडेंस ले डूबता है। नरोत्तम मिश्रा इसका जीता जागता और बेहद ताजा उदाहरण हैं।



सिर्फ नरोत्तम मिश्रा ही नहीं सियासत के बड़े-बड़े जानकार ये मान बैठे थे कि टिकट नरोत्तम मिश्रा को ही मिलेगा, लेकिन सर्वे रिपोर्ट में नरोत्तम मिश्रा जीत दिलाने वाले उम्मीदवार बन कर नहीं उभरे। पार्टी ने उनका टिकट काटा।



इसके बाद सियासी ड्रामा सड़क से चरम तक पहुंचा। नरोत्तम मिश्रा के सारे समर्थकों ने टिकट कटने के बाद इस्तीफा दे दिया। क्या समर्थकों की नाराजगी को पार्टी ने कम आंका। यही गलती दतिया में कहीं भारी तो नहीं पड़ गई।



आंसुओं से हार तक, दतिया का सियासी ड्रामा

एक ड्रामे को हिट बनाने के लिए हर इमोशन की दरकार होती है। इस ड्रामे भी समर्थकों का गुस्सा था। शुभचिंतकों की हैरानी थी। और आंसू भी थे।



टिकट के लिए एड़ी चोटी का जोर लगाने के बाद भी जब बात नहीं बनी तो नरोत्तम मिश्रा की आंख से आंसू आने की खबरें भी खूब वायरल हुईं, लेकिन दतिया नाम के इस ड्रामे का अंत बीजेपी के ट्रेजिक ही साबित हुआ।



प्रदेश में खुद की सरकार होने के बावजूद दतिया जैसी सीट बीजेपी नहीं बचा सकी। डबल इंजन सरकार के साथ-साथ ये नितिन नबीन के मैनेजमेंट पर भी सवाल उठाती है।



घनश्याम सिंह की वापसी ने बदला खेल

अब बात करते हैं कांग्रेस की। राजेंद्र भारती की विधायकी छिनना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका था। पार्टी ने इस सीट को बचाने के लिए तमाम कानूनी दांव पेंच खेले, लेकिन बात नहीं बनी। इसके बाद टिकट बंटने की बारी आई।



बीच में ये बयान भी वायरल हुए कि राजेंद्र भारती ने कह दिया है कि उन्हें या उनके परिवार को टिकट न दिया जाए। वो पार्टी की जीत में मदद करेंगे। सारे सर्वे के बाद टिकट मिला घनश्याम सिंह को। राजघराने से आने वाले घनश्याम सिंह के लिए दतिया का चुनावी ग्राउंड नया नहीं है। वो पहले भी यहां से विधायक रह चुके हैं।



1993 में वो पहली बार दतिया से चुनाव जीते। 2003 में उन्होंने राजेंद्र भारती को ही चुनावी मैदान में हार का स्वाद चखाया था। 2008 में दतिया में नरोत्तम मिश्रा से हारे। उसके बाद सेवढ़ा का रुख किया। 2018 के चुनाव में वो सेवढ़ा विधायक बनकर विधानसभा पहुंचे।



नरोत्तम का फुलस्टॉप या नई शुरुआत?

इस बार पार्टी ने फिर उन्हें नरोत्तम मिश्रा के खिलाफ दतिया से टिकट दिया। वो कांग्रेस की उम्मीद पर खरे भी उतरे, लेकिन दिलचस्प बात ये है कि पार्टी का साथ देने का वादा करने वाले राजेंद्र भारती को कांग्रेस ने नतीजे आने से एक दिन पहले निलंबित कर दिया। उन पर सबोटाज के आरोप लगे।



देखा जाए तो दतिया चुनाव ने काफी कुछ बदल दिया है। इसे हम कह सकते हैं कि नरोत्तम मिश्रा की चुनावी राजनीति पर फुलस्टॉप लग गया है। 2028 तक वो कोई चमत्कार कर सकें तो बात अलग है। वर्ना अब उन्हें बीजेपी से दतिया में टिकट मिलना नामुमकिन कहा जा सकता है। पर वो खुद कह चुके हैं कि वो समंदर हैं लौटकर आएंगे। इसलिए इंतजार किया जा सकता है।



दतिया के बाद BJP-Nitin की अग्निपरीक्षा

याद दिला दें बीजेपी ने नरोत्तम मिश्रा को ही जीत की जिम्मेदारी सौंप दी थी। नतीजों से ये साफ है कि नरोत्तम मिश्रा इस जिम्मेदारी पर खरे नहीं उतरे।



इस चुनाव के बाद राजेंद्र भारती की चुनावी पारी कांग्रेस में खत्म कही जा सकती है और शायद ये भी हो सकता है कि दतिया अब बीजेपी की जगह कांग्रेस का गढ़ बन जाए।



एक धब्बा प्रदेश सरकार और नए राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन पर भी है, लेकिन अभी और चुनाव आएंगे। नितिन नबीन और दतिया की तासीर पर अभी किसी फैसले पर पहुंचना जल्दबाजी साबित हो सकता है।



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