News Strike: आगे रूम फ्रेशनर, पीछे-पीछे मंत्री, औचक निरीक्षण से बदलेंगे सरकारी अस्पतालों के हालात?

Harish Divekar | May 12, 2026, 07:00 IST
Photograph: (THESOOTR)
BHOPAL. मंत्री राकेश शुक्ला के औचक निरीक्षण का वीडियो वायरल हो गया है। कांग्रेस ने आरोप लगाया कि अस्पताल में बदबू छुपाने के लिए रूम फ्रेशनर छिड़का गया था। क्या इससे अस्पतालों में सुधार होगा?

News Strike | न्यूज स्ट्राइक |आह क्या खुशबू है। इस खुशबू में क्या इतनी ताकत है कि मंत्रीजी को हकीकत दिखना बंद हो जाए। अब आप जरूर सोचेंगे कि खुशबू से आंखों पर क्या असर पड़ता है। दिखना तो वही चाहिए जो सामने है, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो देखेंगे तो आप भी मेरी तरह यही सवाल पूछेंगे।



रूम फ्रेशनर की खुशबू क्या इसलिए फैलाई गई कि मंत्रीजी की आंखों पर पट्टी बंध जाए और अगर पट्टी नहीं बंधी तो मंत्रीजी ने ठोस कार्रवाई करने के लिए क्या ठोस कदम उठाए। चलिए पूरा मामला समझते हैं।



मंत्री का औचक निरीक्षण, असलियत या दिखावा?

अक्सर आप सुनते होंगे कि फलां मंत्री, फलां जगह पर औचक निरीक्षण करने पहुंचे। औचक निरीक्षण के जरिए मंत्री या अफसर ये जताने की कोशिश करते हैं कि वो अचानक ही उस जगह इंस्पेक्शन के लिए पहुंचे हैं।



अचानक पहुंचने से शायद उन्हें कुछ कमियां नजर आ जाएं, लेकिन जब मंत्रीजी पहले से इत्तला कर किसी जगह निरीक्षण करने पहुंचे तब पूरे अमले की कोशिश यही होती है कि मंत्रीजी की नजरों में कोई कमी न आ जाए। इसलिए व्यवस्था एकदम चाक चौबंद कर दी जाती है।



सोशल मीडिया पर मोहन कैबिनेट के मंत्री राकेश शुक्ला (Minister Rakesh Shukla) का एक वीडियो वायरल हो रहा है। जिसमें वो अशोकनगर के जिला अस्पताल का औचक निरीक्षण करने पहुंचे हैं। पहले जरा आप पूरे इत्मीनान से ये वीडियो देख लीजिए।



रूम फ्रेशनर छिड़कते हुए वीडियो...

इस वीडियो में आपने क्या नोटिस किया। एक अस्पताल में बेड पर मरीज उनके परिजन आपको जरूर दिखाई देंगे। उनका हाल चाल जानते हुए मंत्री भी नजर आएंगे। ये प्रभारी मंत्री राकेश सिंह हैं।



हम ये जरूर कह सकते हैं कि मरीजों के हित में मंत्रीजी ने अच्छा ही काम किया है। वो खुद जमीन पर उतरे हैं। मास्क लगाकर ही सही वो सरकारी अस्पतालों के मरीजों का हालचाल जानने और अस्पताल का जायजा लेने पहुंचे हैं। मंत्री इतने सजग रहेंगे तो हालात तो बदलेंगे ही, लेकिन वीडियो को गौर से देखने के बाद आप जरूर पूछेंगे कि ये कैसी सजगता है।



निरीक्षण से पहले बदबू छुपाने की कोशिश?

आपने वीडियो में दिख रहे एक नीली ड्रेस वाले शख्स पर गौर किया होगा। वो बहुत तेजी में वॉर्ड को पार करता हुआ दिखता है। उसके हाथों को देखिए वो कोई बॉटल पकड़े है और स्प्रे भी कर रहा है।



कांग्रेस ने दावा किया है कि ये वो शख्स मंत्रीजी के आने से पहले रूम फ्रेशनर छिड़क रहा है ताकि मंत्रीजी को अस्पताल के वॉर्ड की बदबू न आए। एमपी यूथ कांग्रेस ने इस वीडियो को ट्वीट कर लिखा है कि मरीज बदबू झेलते रहें, मंत्रीजी के लिए फूल खुशबू छिड़की जाएगी।



अशोक नगर अस्पताल का ये दृश्य सरकार का आईना है। कर्मचारी आगे आगे रूम फ्रेशनर छिड़कते रहे और प्रभारी मंत्री पीछे पीछे निरीक्षण का दिखावा करते रहे। आखिर में ट्वीट में लिखा है कि बदबू हटाने के बजाए उसे छुपाया जा रहा है।



मंत्री के आने से पहले अस्पताल में भागमभाग

कांग्रेस का सवाल बिलकुल सही है। अगर बदबू है तो उसे सिर्फ मंत्रीजी के लिए ही क्यों हटाया जा रहा है। जो मरीज सरकारी तंत्र पर भरोसा करके अस्पताल में भर्ती होने आते हैं वो क्यों बदबू में रहने के लिए मजबूर हैं।



इस पूरे मामले में असल खबर ये है कि मंत्री राकेश शुक्ला अचानक ही अस्पताल के निरीक्षण के लिए पहुंचे थे। उन्हें देखकर अस्पताल प्रशासन सकते में आ गया। मंत्रीजी के सामने अच्छी रिपोर्ट पेश करने की खातिर अस्पताल प्रशासन से जो बन पड़ा वो किया गया।



कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि बेहतर इंतजाम दिखाने के चक्कर में मंत्रीजी से पहले वहां जल्दबाजी में व्यवस्थाएं बनाई गईं। हाल ये हुआ कि कर्मचारी आगे आगे जाकर सब ठीक करने में जुट गए। जिसका एक नमूना इस तरह वीडियो में कैद हो गया। अस्पताल प्रशासन की पूरी कोशिश ये थी कि मंत्रीजी किसी बात पर नाराजगी जाहिर करके न जाएं।



पर और भी बहुत कुछ था जो मंत्रीजी को खटक गया। अस्पताल में एक ही बेड पर दो-दो मरीज लेटे हुए नजर आए। गर्मी के मौसम में भी बहुत से मरीजों को न तो पंखे की सुविधा मिल रही थी न हवा के लिए कोई इंतजाम था। कूलर या एसी की बात तो आप छोड़ ही दीजिए।



कुछ मरीज तो अखबार या गत्ते से ही खुद को हवा करते नजर आए। पर अस्पताल प्रबंधन ने अपनी चतुराई से कई खामियों को छुपाने में कामयाबी हासिल कर ही ली। इतना दिमाग और मेहनत अगर सही तरीके से इस्तेमाल की जाती तो शायद मरीज इतने परेशान नहीं होते।



क्या मंत्रीजी निरीक्षण का करेंगे रिव्यू?

पर, इन सबका नतीजा ये हुआ कि मंत्रीजी जो हकीकत देखने आए थे। वो हकीकत खुलकर उनके सामने नहीं आ सकी। जाहिर तौर पर मंत्री राकेश शुक्ला ने इंस्पेक्शन के बाद कुछ निर्देश भी दिए होंगे।



हमारा सवाल बस इतना है कि क्या वो दोबारा कभी इसी अस्पताल के इंस्पेक्शन के लिए जाएंगे और ये रिव्यू करेंगे कि उन्होंने जो जो निर्देश दिए थे उसका क्या हुआ। क्या अस्पताल के अमले ने उन पर अमल किया है। क्या उसके बाद मरीजों को आराम मिला है या बेहतर सुविधाएं मिल रही हैं।



हां एक सवाल और क्या मंत्रीजी ने ये जानने की कोशिश की कि जिस अस्पताल से फिनाइल की तेज महक आनी चाहिए वहां रूम फ्रेशनर की महक कैसे आ सकती है। या जो नजारा कैमरे में कैद हुआ उसे मंत्रीजी देख ही नहीं पाए या देखकर भी अनदेखा कर दिया। इन सब सवालों के जवाब राकेश शुक्ला को जरूर देने चाहिए।



क्या अस्पतालों की हालत सुधरेगी?

हम यहां कुछ और खबरों का जिक्र भी करना चाहेंगे। वैसे राकेश शुक्ला अशोकनगर के प्रभारी मंत्री हैं। प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री नहीं हैं। पर बात उनके मार्फत निकली है तो प्रदेश के सरकारी अस्पतालों पर छोटी सी जानकारी साझा करनी जरूरी है। ताकि जिले के प्रभारी मंत्री या जिम्मेदार मंत्री उन्हें ठीक करने की कोशिश जरूर कर सकें।



रविवार यानी कि कल ही भिंड के जिला अस्पताल में बड़ा हादसा हुआ है। जिला अस्पताल के स्पेशल न्यू बॉर्न केयर यूनिट की छत भरभारकर गिर पड़ी। जिसकी वजह से तीन महिलाएं और एक नवजात घायल हो गया है। इस घटना के बाद माताएं बुरी तरह घबरा गईं और रोते हुए भी नजर आईं। क्या अब तक किसी मंत्री ने इस घटना पर सुध ली।



सरकारी अस्पतालों की ये लापरवाहियां भी...

सागर जिले में स्थित बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में इससे भी बुरा हादसा हो चुका है। यहां एक प्रसुता यानी कि डिलिवरी के लिए आई महिला की मौत हो गई। घटना के बाद उसके परिजनों ने आरोप लगाया कि वो दो घंटे तक लेबर पेन में तड़पती रही, लेकिन अस्पताल से किसी ने सुध नहीं ली।



ये आरोप भी लगे कि उसे एक इंजेक्शन दिया गया। जिसके बाद उसकी तबियत इतनी बिगड़ी कि उसकी मौत ही हो गई। क्या किसी मंत्री ने अस्पताल के हालात और परिजनों की सुध ली।



ऐसे ही एक नहीं कई मामले सामने आए हैं। जिनसे जुड़ी खबरें 'द सूत्र' पर भी प्रकाशित की गई हैं। अप्रैल में बैरागढ़ के सिविल अस्पताल में एक नवजात की मौत हुई। बुरहानपुर के जिला अस्पताल में 55 साल की महिला की इलाज के दौरान मौत हो गई। जिसकी जांच के आदेश दिए गए।



कोतमा के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में एक शख्स की इलाज न मिलने से मौत हो गई। परिजन ने यहां तक बताया कि डॉक्टर को बार-बार बुलाया, लेकिन वो नहीं आए। इस मामले के भी मजिस्ट्रियल जांच के आदेश हुए थे। क्या किसी ने अब तक ये सुध ली है कि इन मामलों का क्या हुआ। क्या उन अस्पतालों के या केंद्रों के हालात सुधरे या अब तक सब वैसा ही चल रहा है।



भोपाल स्थित हमीदिया अस्पताल तो बेहद बड़ा भी है। यहां एक नवजात का डेथ सर्टिफिकेट तक जारी कर दिया गया, लेकिन बाद में बच्चा जिंदा निकला। गनीमत है कि दफन होने से पहले ही उसका दिल धड़क उठा वर्ना अनर्थ भी हो सकता था।



यहां दो नवजातों के जले हुए शव मिलने की शिकायत तक हो चुकी है। क्या अब तक किसी सरकारी नुमाइंदे ने राज्य स्तरीय सरकारी अस्पतालों के हालात की सुध ली है।



मंत्री का दौरा नहीं, जरूरी है कार्रवाई!

हम ये बिलकुल नहीं कहते कि मंत्री का दौरा गलत है, लेकिन कभी कभी दौरा करना उसे रिकॉर्ड करना और सोशल मीडिया पर अपलोड करना ठोस कार्रवाई के लिए काफी नहीं है। ऐसा करके एक अच्छा सोशल मीडिया इवेंट क्रिएट किया जा सकता है। वाहवाही लूटी जा सकती है, लेकिन जमीनी कार्रवाई नहीं करवाई जा सकती।



जो मंत्री इंस्पेक्शन पर जाते हैं। वो समय-समय पर रिव्यू करते रहेंगे। तब ही जमीन पर हालात बेहतर होंगे। क्योंकि बेहतर स्वास्थ्य सुविधा, साफ और अच्छी हवा पर सिर्फ मंत्री या वीआईपी का हक नहीं है। उन्हें वोट देने वाली जनता का भी कुछ अधिकार है। जिसे भुलाया जाना किसी सरकार की सेहत के लिए फायदेमंद नहीं हो सकता।



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