News Strike: PM की अपील के बाद पेट्रोल का इस्तेमाल घटाने पर जोर, अफसरों पर भी लागू होंगी शर्तें?
ऐसे समझें पूरा मामला...
- पीएम ने पेट्रोल बचाने की दो बार अपील की।
- मंत्री और सीएम ने काफिले घटाए।
- वर्क फ्रॉम होम और नो व्हीकल डे लागू।
- अफसरों के गाड़ियों पर करोड़ों रुपए खर्च।
- कार पूलिंग से अफसर पेट्रोल बचा सकते हैं।
News Strike |न्यूज स्ट्राइक:पेट्रोल के दाम बढ़ने के बाद आप भी नए सिरे से बजटिंग कर ही रहे होंगे। एक तो पेट्रोल महंगा उस पर पीएम की अपील की इस्तेमाल कम करें। राजनीतिक गलियारों में तो इसका खूब असर दिख रहा है, लेकिन अफसरों की लाइफस्टाइल में क्या बदलाव आया है।
ये आपने सोचा है। मंत्रियों के लंबे काफिलों पर सबकी नजर है, लेकिन अफसरों की कितनी गाड़ियां चल रही हैं। लाट साहब की मिसेज जब डॉगी को घुमाने निकलती हैं तो बड़े ठाठ से गाड़ी लेकर ही जाती हैं। बच्चे को स्कूल छोड़ना हो तो गाड़ी। एक्टिविटी क्लास जाना हो तो गाड़ी और तो और सब्जी लेने के लिए भी फोर व्हीलकर ही निकलता है।
प्रदेश में अफसरों की गाड़ियों पर करोड़ रुपए खर्च होते हैं। आपको हैरानी होगी ये जानकर कि कई अफसर अलॉटेट व्हीकल से ज्यादा गाड़ियां लेकर घूम रहे हैं।
नेताओं ने काफिले घटाए, पेट्रोल बचाने की अपील
पीएम ने दो बार पेट्रोल का इस्तेमाल कम करने की अपील क्या की। कई स्टेट से अलग-अलग खबरें आने लगीं। हर दूसरे दिन एक नेता का वीडियो वायरल होता है। जिसमें ये जताया जाता है कि उसने अपने काफिले से गाड़ियां कम कर दी हैं।
मध्यप्रदेश के सीएम समेत दोनों डिप्टी सीएम और कई मंत्री काफिले से गाड़ियां घटा चुके हैं। मप्र के अलावा दिल्ली, यूपी, गुजरात, राजस्थान के सीएम अपने काफिले की गाड़ियां घटा चुके हैं और अन्य मंत्रियों को भी ऐसा करने के लिए निर्देशित कर चुके हैं।
पेट्रोल बचाने से लेकर वर्क फ्रॉम होम की कवायद
हम इस पहल को एप्रिशियेट करते हैं। आम जनता पेट्रोल की तंगी या बढ़ती कीमत को झेले उससे पहले मंत्रियों ने एक एग्जाम्पल सेट करने की पूरी कोशिश की है। इसमें कोई दो राय नहीं है। पीएम ने पेट्रोल बचाने के लिए वर्क फ्रॉम होम की भी अपील की थी। कुछ राज्यों ने इस पहल को भी आदेश माना और तुरंत उसे लागू कर दिया।
दिल्ली में फ्यूल सेविंग केंपेन चल पड़ा है। जिसका नाम है मेरा भारत मेरा योगदान। इसके तहत 90 दिन तक हर हफ्ते में दो दिन वर्क फ्रॉम होम होगा। एक दिन नो व्हीकल डे के रूप में मनाया जाएगा और मंडे मेट्रो के नाम से मेट्रो का सफर होगा।
इस पहल पर विपक्ष भी सरकार के साथ दिखा। कल प्रियंका गांधी और राहुल गांधी का एक साथ जाता हुआ वीडियो खूब वायरल हुआ। कार पूलिंग का वो भी एक अच्छा उदाहरण था।
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नेताओं के काफिले के अजब नजारे
इन सबके बीच मध्यप्रदेश में थोड़े अजब नजारे देखने को मिले। एक तरफ पीएम मोदी की अपील पर अमल हो रहा था। दूसरी तरफ प्रदेश के कुछ नेता कारों के काफिले के साथ शक्ति प्रदर्शन करते हुए भी नजर आए।
करीब नौ जगह से ऐसी तस्वीरें आईं जिनमें नेता गाड़ियों के काफिले के साथ नजर आए। किसान मोर्चा के भिंड जिला अध्यक्ष सज्जन सिंह यादव करीब सौ गाड़ियों के साथ दिखे। वो खुद बग्घी पर सवार थे। वीडियो वायरल होते ही उन्हें पद से हटा दिया गया है।
नेताओं के काफिले में कितनी गाड़ियां
पाठ्यपुस्तक निगम का अध्यक्ष बनने के बाद सौभाग्य सिंह ठाकुर करीब 700 गाड़ियों के साथ उज्जैन से भोपाल आए। उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी किया गया। वो सिर्फ स्पष्टीकरण देकर फारिग हो सकते हैं।
प्रीतम सिंह लोधी 12 मई को 200 गाड़ियों के साथ मंदिर पहुंचे। टिकेंद्र प्रताप सिंह भी किसान मोर्चा का अध्यक्ष बनने के बाद 60 से 70 कारें लेकर जिला कार्यालय पहुंचे।
बताया गया कि उनके साथ गाड़ियां ज्यादा थीं, लेकिन कुछ वाहन आधे रास्ते से ही लौटा दिए। बीजेपी ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष पवन पाटीदार दो दर्जन गाड़ियों के साथ चंबल दौरे पर निकले।
सिंगरौली विकास प्राधिकरण के नवनियुक्त अध्यक्ष वीरेंद्र गोयल तीस से ज्यादा गाड़ियों के साथ निकले। हालांकि, वो खुद ई रिक्शे में सवार थे। लेकिन तीस गाड़ियों के काफिले को कैसे जस्टिफाई कर सकते हैं।
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महिला अध्यक्ष काफिले से लगा जाम
महिला आयोग की नई नवेली अध्यक्ष रेखा यादव भी गाड़ियों का लंबा चौड़ा काफिला लेकर छतरपुर स्थित बीजेपी कार्यालय पहुंची। इस वजह से लंबा ट्रैफिक जाम भी हुआ।
मंत्री दर्जा प्राप्त सत्येंद्र भूषण सिंह और राकेश सिंह जादौन खुद ई-रिक्शा से कार्यालय पहुंचे, लेकिन उनके साथ लंबा काफिला भी पहुंचा। इस बीच मंत्री गौतम टेटवाल का वीडियो भी वायरल हुआ जो बस से ही एक सारंगपुर से पचोर गए और फिर स्कूटी से बाकी का सफर तय किया।
सबका अपना-अपना अंदाज है अपने-अपने तरीके हैं। लेकिन सबके लिए ये समझ लेना भी बहुत जरूरी है कि पेट्रोल को लेकर स्थिति गंभीर है और किफायत से इस्तेमाल करना वाकई जरूरी है।
राजनेताओं पर लगाम, अफसर भी सोचें
आम लोग तो दाम बढ़ता देखकर ही किफायती हो जाते हैं। राजनेताओं पर भी लगाम कसी ही जा रही है। अब बात करते हैं उस सवाल की जो हमने शुरुआत में पूछा था। जानते हैं बीच में काफी लंबी बात कर चुके हैं, लेकिन सवाल पर लौटना बहुत जरूरी है।
इस कटौती की चर्चा के बीच मप्र के अफसरों पर क्या असर पड़ेगा। क्या अफसरों की अफसरशाही में कमी आएगी या गाड़ियों की आदि हो चुकी उनकी फैमिली के ठाठ कुछ कम होंगे। ये सब बहुत सोचने वाली बात है।
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अफसरों की गाड़ी का चौंकाने वाला खर्च
हम आपको एक बहुत ताजा रिपोर्ट बताते हैं। पीएम मोदी की अपील के बाद ही मीडिया हाउसेस ने गाड़ियों से जुड़ी फेक्ट फाइंडिंग शुरू की और हालात बेहद चौंकाने वाले मिले।
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में 600 से ज्यादा लग्जरी गाड़ियां हैं जो किराए पर चल रही हैं। इन गाड़ियों पर हर महीने 25 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। जिस तरह हर स्तर के राजनेता के लिए गाड़ियों का काफिला तय है। उसी तरह अफसरों के लिए भी वित्त विभाग ने नियम साफ बता रखे हैं।
नियम के अनुसार प्रदेश में सीएस या सीएस लेवल के अधिकारी भी 18 लाख रुपए से ज्यादा की गाड़ी किराए पर नहीं ले सकते, जबकि प्रदेश के कई अफसरों के पास 35–35 लाख रुपए तक की गाड़ी किराए पर है। जैसे इनोवा क्रिस्टा।
एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पीडब्लयूडी के उपयंत्री, नगरीय विकास और आवास विभाग के उप संचालक, पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के ज्वाइंट डायरेक्टर, आरटीओ और तहसीलदार स्तर के भी कई अफसर यही गाड़ी इस्तेमाल कर रहे हैं।
अफसरों की गाड़ियों के खर्च पर सवाल
कुछ कलेक्टर ऐसे हैं जिनके पास दो-दो सरकारी गाड़ी है। खासतौर से जो दो-दो प्रभार संभाल रहे हैं। वो अफसर दो-दो वाहन भी रख रहे हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि एक वाहन अफसर के लिए तैनात होगा और दूसरा वाहन फैमिली की ड्यूटी अदा करता ही होगा और सरकारी गाड़ी की बात छोड़ दें तो पर्सनल गाड़ियां भी कम नहीं हैं। जिनमें पेट्रोल तो डलता ही होगा।
तो क्या सरकारी अफसर राजनेताओं की तरह पेट्रोल का इस्तेमाल करने जैसा कोई एग्जाम्पल सेट नहीं करेंगे। जो गाइडलाइन सारे राजनेताओं के लिए है, मजबूरी ही सही आम आदमी भी किफायती हो रहा है।
तो क्या अफसरों के ठाठ में कोई कमी आएगी। क्या उन्हें परिस्थितियों को समझते हुए पेट्रोल का इस्तेमाल कम करने पर विचार नहीं करना चाहिए। कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि साहेब के ऑफिस जाने के बाद सरकारी वाहन का घर के पर्सनल कामों में इस्तेमाल न हो।
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कार पूलिंग के बारे में भी सोचें अफसर
और हां, कार पूलिंग की बात भी करते चलते हैं। अगर आप भोपाल की कॉलोनियों से वाकिफ हैं तो आप ये जानते ही होंगे कि चार इमली, 74 बंगला जैसे इलाके हैं जहां अफसरों को बंगले अलॉट हैं।
बहुत सारे अफसर एक ही ऑफिस जाते हैं यानी कि मंत्रालय या उसके आसपास स्थित सतपुड़ा या विंध्याचल बिल्डिंग। क्या ये सारे अफसर कार पूलिंग करके ऑफिस नहीं जा सकते। कई बार तो ऐसा भी नजारा दिखा है कि पति पत्नी दोनों अफसर हैं। और दोनों अलग-अलग गाड़ी से एक ही बिल्डिंग में जाते हैं।
क्या ऐसी अफसर फैमिली एक साथ एक कार में ऑफिस नहीं जा सकते। ये बहुत अच्छा मौका है सारे अफसरों के पास, इस बारे में सोचने का और एक अच्छा एग्जाम्पल सेट करने का। पर सवाल ये है कि क्या वो ऐसा कर पाएंगे। या सरकार उन पर लगाम कसने के लिए कोई तरीका निकाल पाएगी।