News Strike: OBC आरक्षण पर जबलपुर हाईकोर्ट में सुनवाई से पहले महाआंदोलन की तैयारी
News In Short
- 2018 से ओबीसी आरक्षण का मुद्दा कोर्ट में अटका है।
- 10 मई को भोपाल में ओबीसी महाआंदोलन होने जा रहा है।
- सुप्रीम कोर्ट ने दो याचिकाओं को खुद सुनवाई के लिए लिया।
- 87-13 फॉर्मूला ओबीसी आरक्षण के समाधान की कोशिश है।
- 8 सालों से इस मुद्दे पर फैसले में देरी हो रही है।
News In Detail
News Strike | न्यूज स्ट्राइक:तारीख पर तारीख... फिर अदालत के चक्कर और फिर तारीख पर तारीख। डायलॉग जरूर फिल्मी है, लेकिन प्रदेशभर के ओबीसी समुदाय के लिए ये हकीकत बन चुका है। पर अब इन तारीखों से इस समुदाय के सब्र का घड़ा भर चुका है। जिसके छलकने की तारीख मुकर्र हो चुकी है।
जी हां अब इस मामले में और तारीखें न मिलें, इसलिए ओबीसी समुदाय ने आंदोलन की तारीख खुद तय कर ली है। लेकिन क्या आंदोलन से इस अटकी हुई प्रक्रिया पर कोई हल निकल पाएगा। शायद ये इतना आसान नहीं है। इस मसले से ताल्लुक रखने वाले भी यही सलाह दे रहे हैं।
भोपाल में ओबीसी का महाआंदोलन
आने वाली दस मई को यानी कि दो दिन बाद मप्र की राजधानी में बड़ा आंदोलन होने जा रहा है। इस आंदोलन की जानकारी ओबीसी महासभा के राष्ट्रीय समिति के सदस्य कमलेंद्र ने सोशल मीडिया पर साझा की है। उनकी पोस्ट में लिखा है कि ओबीसी युवाओं के साथ खिलवाड़ बंद हो।
अब और धोखा नहीं चलेगा। सालों से सिर्फ तारीख और कानूनी उलझने ही दी जा रही हैं। उन्होंने सरकार पर भी सवाल उठाए हैं कि सरकार अगर सचमुच प्रतिबद्ध है तो पूरी ताकत से 27 फीसदी आरक्षण क्यों नहीं लागू करती है।
थोड़े पोयेटिक अंदाज में ये भी लिखा है कि चुप्पी नहीं संघर्ष होगा। अब अन्याय नहीं जवाब होगा। भोपाल की धरती पर हक की हुंकार होगी। 27 फीसदी हमारा अधिकार नहीं किसी का उपकार। ये सब सुनकर लगता है कि आंदोलन बेहद उग्र होने वाला है।
इसे कमलेंद्र ने महाआंदोलन बताया है, लेकिन आंदोलन वाकई कितना बड़ा होगा ये कहना मुश्किल है। क्योंकि पोस्ट के आखिर में खुद कमलेंद्र ने लिखा है कि हर छात्र, युवा, किसान, कर्मचारी से अपील है कि वो बड़ी संख्या में इस आंदोलन का हिस्सा बनने आए।
ये खबर भी पढ़ें...
27% ओबीसी आरक्षण का संघर्ष
दस मई को क्या होता है। भोपाल की सड़कों पर ओबीसी समुदाय अपनी कितनी ताकत दिखा पाता है। ये जरूर देखने और समझने वाली बात होगी। फिलहाल हम आपको पूरा माजरा भी बता देते हैं।
क्या है ये 27 प्रतिशत का मामला जो बार-बार सिर उठाकर ओबीसी समुदाय के आंदोलन या नाराजगी का रूप ले लेता है। जिस पर अक्सर राजनीति होती है तो कभी कोई ठोस नतीजा या कार्रवाई भी हो ही जाती है।
कोर्ट में मचे घमासान की कहानी
ओबीसी आरक्षण का ये मुद्दा शुरू हुआ 2018 में बनी कमलनाथ सरकार के बाद। जिसमें कई पेंच फंसे और कई बार इस मुद्दे ने हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट के बीच टप्पे भी खाए। हाल ही में इस मामले में उम्मीद की किरण तब दिखी थी जब सुप्रीम कोर्ट ने दो मामलों को सुनावाई के लिए खुद ही बुलवा लिया था।
असल में सर्वोच्च अदालत ने ओबीसी आरक्षण मामले से जुड़े सारे केस हाईकोर्ट को वापस भेज दिए थे, लेकिन दो मामलों को खुद रिकॉल किया। वो मामले भी बताते हैं और आपको स्टेप बाय स्टेप सब समझाते हैं।
ये खबर भी पढ़ें...
अदालतों में उलझा 28% का सपना
मप्र में पहले ओबीसी आरक्षण सिर्फ 14 फीसदी ही हुआ करता था। साल 2018 में कमलनाथ सरकार बनी और ऐलान हुआ कि इस आरक्षण को 28 फीसदी किया जाता है, लेकिन कमलनाथ सरकार में रहते हुए इसे इंप्लीमेंट कर पाते उससे पहले ही इसके खिलाफ कुल 103 याचिकाएं अदालत में लग गईं।
इन याचिकाओं में से कुछ में ये दावा भी किया गया कि कुल आरक्षण पचास फीसदी से ज्यादा नहीं होना चाहिए, लेकिन ओबीसी को 27 फीसदी आरक्षण लागू हुआ तो आरक्षित वर्ग की सारी सीटें मिलाकर रिजर्वेशन पचास फीसदी से ज्यादा हो जाएगा।
यही हाल प्रमोशन प्रक्रिया में आरक्षण मामले का भी हुआ। आरक्षण के मुद्दे पर पेंच अटका तो सरकार भी खुद को ओबीसी हितैषी साबित करने में जुट गई और 54 मामले लेकर खुद सुप्रीम कोर्ट चली गई। सुप्रीम कोर्ट में भी सुनवाई चलती रही और प्रक्रिया टलती रही।
सुप्रीम कोर्ट में उलझा पेचीदा मामला
इसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने सारी याचिकाएं हाईकोर्ट को ही लौटा दीं। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने दो याचिकाओं को खुद रिकॉल किया। दीपक कुमार पटेल बनाम मप्र शासन और हरिशकर बरोदिया बनाम मप्र शासन, ये वो दो याचिकाएं हैं जो सुप्रीम कोर्ट के पास हैं।
यानी अब इस मामले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट दोनों जगह अलग-अलग सुनवाई हो रही है, लेकिन नतीजे पर पहुंच पाना मुश्किल हो रहा है। इस प्रक्रिया में इतने पेंच हैं कि अंदाजा लगाना मुश्किल है।
दिलचस्प बात ये है कि जब भी कोई हल निकाला जाता है। तब उस पर अमल होने से पहले उस सॉल्यूशन के ही खिलाफ और याचिकाएं दायर हो जाती हैं और मामला अटक जाता है ढाक के वही तीन पात पर।
ये खबर भी पढ़ें...
समझिए, क्या है 87-13 का फॉर्मूला
मध्यप्रदेश सरकार ने भी समय-समय पर इस पर रास्ता निकालने की कोशिशें जारी रखी हैं। इसका एक हल पहले सरकार के स्तर पर निकाला गया था। वो हल था 87-13 का फॉर्मूला। ये फॉर्मूला समझना भी आसान नहीं है। इसे हम आपको आसान भाषा में समझाते हैं।
मान लीजिए सरकार 100 पदों पर भर्ती शुरू करती है। सौ में से 87 फीसदी पदों पर भर्ती पुराने फॉर्मूले से होगी। जो सालों से चला आ रहा है। अब बचे तेरह पद।
इन तेरह पदों पर सशर्त भर्ती होती है। शर्त ये कि यदि अदालत ओबीसी आरक्षण के खिलाफ फैसला देती है तो उन 13 फीसदी पदों पर काम करने वाले कर्मचारियों कौ नौकरी छोड़नी होगी। अब बताइए ऐसी रिस्क भला कौन लेना चाहेगा, इसलिए कई विभागों में 13 फीसदी पद भर ही नहीं पाते हैं।
ओबीसी आरक्षण: 8 सालों का लंबा संघर्ष
अब इस मामले को अदालतों में घसीटते-घसीटते आठ साल से ज्यादा का वक्त होने वाला है, लेकिन जब लगता है कि मामला अंजाम तक पहुंचने वाला है। बस तभी कुछ ऐसा होता है कि ओबीसी समुदाय को फिर सदमा लगता है।
16 अप्रैल की सुनवाई में ये तय माना जा रहा था कि आरक्षण का मसला किसी अंजाम तक पहुंच ही जाएगा। इस सुनवाई को आखिरी सुनवाई माना जा रहा था, लेकिन फिर कुछ दस्तावेजों की कमी के चलते फैसला मुल्तवी कर दिया गया।
अब हाईकोर्ट ने सुनवाई के लिए तीन तारीखें तय की हैं। ये तारीखें हैं 13, 14 और 15 मई। यानी हम कह सकते हैं कि इसी महीने के दूसरे हफ्ते में ये केस अंजाम तक पहुंच सकता है। शायद इसलिए ओबीसी समुदाय ने आंदोलन के लिए दस मई की तारीख चुनी है। ये उनका शक्तिप्रदर्शन भी कहा जा सकता है।
ये खबर भी पढ़ें...
अब नतीजा या फिर वही... नई तारीख
हालांकि, कमलेंद्र की पोस्ट पर ही कुछ यूजर्स ने ये कमेंट किया है कि आंदोलन से ज्यादा इस बात पर ध्यान देना चाहिए कि केस मजबूती से रखा जाए और नतीजा सामने आए। दम तो साहब इस राय में भी बहुत है।
अब देखना ये है कि सुनवाई की ये तीन तारीखें वाकई ओबीसी आरक्षण के इतिहास में तारीख के रूप में दर्ज होती है या फिर उन्हें एक नई तारीख मिलती है और इंतजार की घड़ियां बढ़ जाती हैं।