NEWS STRIKE: ब्राह्मण बयान से लेकर लोधी नाराजगी तक, क्या फंस गए प्रीतम लोधी?
ब्राह्मणों पर विवादित बयान देने के बाद प्रीतम लोधी की बीजेपी में वापसी हो गई, लेकिन अब लगता है उनकी मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। अब जो पार्टी से छुट्टी हुई तो कमबैक के आसार भी कम हो जाएंगे। क्योंकि अब उनके ही समाज ने उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
जिस समाज के दम पर बेतुके बयान और धमकियों के बावजूद बीजेपी में टिके हुए थे। अब वही समाज प्रीतम लोधी की सियासत पर गाज गिरवा सकता है। उनकी अपनी विधानसभा सीट पर उनकी खिलाफत शुरू हो चुकी है।
प्रीतम लोधी के बयान से मचा था बवाल
प्रीतम लोधी का नाम सुनते ही आपको कौन सा बयान याद आता है। 17 अगस्त 2022 में उन्होंने ब्राह्मणों पर विवादित टिप्पणी की थी। वो आपको जरूर याद होगी।
प्रीतम लोधी ने कहा था कि भागवत कथा वालों को महिलाएं घर से घी, शक्कर, गेहूं और चावल चुरा चुराकर अर्पित करती हैं और ये बाद में रफूचक्कर हो जाते हैं। उन्होंने इससे भी ज्यादा विवादित बोल बोले थे। जिसके बाद पूरा मामला प्रीतम लोधी वर्सेज धीरेंद्र शास्त्री हो गया था।
वापसी के बाद बदले प्रीतम के तेवर
प्रीतम लोधी के इस बयान से ब्राह्मण समाज की नाराजगी बढ़ी और बीजेपी उनको निष्कासित करने पर मजबूर हो गई, लेकिन तब सियासी हवाएं प्रीतम लोधी के पक्ष में थीं। सो लोधी की वापसी भी पूरे सत्कार के साथ हुई।
शायद तब से प्रीतम लोधी को ये लगने लगा कि वो पार्टी के लिए बहुत जरूरी है। इस गुरूर ने उनकी जुबान और रुआब दोनों को बेलगाम कर दिया। ऐसे-ऐसे बयान आए कि कभी उन पर गुस्सा आए तो कभी उन्हें सुनकर ही शर्मसार हो जाएं।
बयानों से घिरे प्रीतम लोधी
एक मामले में अफसर को ललकारते हुए उन्होंने कहा कि करैरा क्या उसके डैडी की है। ये मामला और बयान भी खूब सुर्खियों में रहा। चंद रोज पहले उन्होंने एक कार्यक्रम में कृष्ण और शिशुपाल का जिक्र किया और कहा कि किसी की भी 99 गालियां तक सुनी जाएंगी उसके बाद उसकी डेंटिंग पेंटिंग कर दी जाएगी।
अगस्त में एक सभा में उन्होंने महिलाओं पर आपत्तिजनक बात कही। उन्होंने कहा कि डाक बंगले पर महिलाओं को पहुंचा देंगे। खुद नहीं आएंगे। इसके आगे जो प्रतीम लोधी ने कहा। उसे हम खुद भी स्क्रीन पर बताने से बचना ही बेहतर समझेंगे।
अब अपने ही गढ़ में घिरे प्रीतम लोधी
अब ये विवाद प्रीतम लोधी के लिए मुश्किल बन चुके हैं। क्योंकि उनकी विधानसभा में उन्हीं के वोटर्स अब सड़क पर उतर आए हैं। शायद उन्होंने 99 गलतियों वाले बयान को गंभीरता से ले लिया और ये जता दिया कि अब प्रतीम लोधी की गलतियां बर्दाश्त के बाहर हैं।
यहां एक बात और याद दिला दें। ब्राह्मणों पर विवादित बयान के बाद बीजेपी ने उन्हें निष्कासित किया और फिर खुद ही वापसी कराने के लिए भी मजबूर हुई। तो इसके पीछे की एक वजह सिर्फ लोधी वोटर्स थे। जिनका पिछोर में खासा दबदबा है और प्रीतम लोधी इस सीट पर जीत की गारंटी बन गए थे। अब वही लोधी समाज प्रीतम लोधी के खिलाफ सड़क पर है।
पिछोर में लोधी समाज का शक्ति प्रदर्शन
पिछोर में लोधी समाज की एक बड़ी रैली हुई जिसमें कई मांगे रखी गईं। इसमें मुख्य मांगे थीं अवैध शराब के कारोबार पर रोक लगाई जाए। सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार भी लोधी समाज के निशाने पर रहा।
जातिगत भेदभाव और बाहरी तत्वों की वजह से क्षेत्र में बढ़ता तनाव और किसानों की मांगे इस रैली में खासतौर से उठाई गईं। इसके अलावा राशन दुकानों की व्यवस्था सुधारना, सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहतर करना, जंगली जानवरों से फसलों की सुरक्षा और राजस्व मामलों का समय पर निराकरण का मुद्दा भी उठा।
हालांकि, आयोजकों ने ये साफ कर दिया कि ये रैली खालिस समाज से जुड़ी रैली है। इसका सियासत से कोई लेना देना नहीं है, लेकिन इसे प्रीतम लोधी से नाराजगी के रूप में ही देखा जा रहा है।
चूंकी प्रतीम लोधी ही क्षेत्र के विधायक हैं और सत्ताधारी दल बीजेपी से नाता भी रखते हैं। इसलिए लोगों की ऐसी समस्याएं दूर न होना विधायक की ही नाकामी मानी जाएगी। लोधी समाज की रैली की वजह से इसे मौजूदा विधायक के प्रति लोधी समाज की नाराजगी के रूप में ही देखा जा रहा है।
क्या प्रीतम लोधी से नाराज है समाज?
हालांकि, हर घटना के दो पहलू हो सकते हैं। इसलिए इस रैली को लोधी समाज के शक्ति प्रदर्शन के रूप में भी देखा जा रहा है। क्या रैली के जरिए लोधी समाज ये संदेश दे रहा है कि वो क्षेत्र में पहले ही की तरह एकजुट है। या उसे वाकई मौजूदा विधायक प्रीतम लोधी के लिए नाराजगी के तौर पर देखा जाए।
अगर ये नाराजगी ही है तो क्या अब बीजेपी अपने बड़बोले या विवादित बयान देने वाले विधायके के खिलाफ एक्शन ले सकेगी। क्या अगले चुनाव में उनका टिकट काटा जा सकेगा। या फिर प्रीतम लोधी फिर बीजेपी की मजबूरी बन जाएंगे।
लोधी वोट बैंक की सियासी मजबूरी
इस मजबूरी का सियासी गणित भी समझ लीजिए। पार्टी के उमा भारती और प्रहलाद पटेल जैसे दिग्गज नेता लोधी समाज से ही आते हैं। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बड़े नेताओं का छोटे नेताओं को सपोर्ट रहता ही है।
याद कीजिए प्रतीम लोधी के निष्कासन के बाद लोधी समाज में नाराजगी बढ़ रही थी और उस समय उमा भारती ने भी एक सभा में ये कह दिया था कि इस बार ये नहीं कहूंगी कि बीजेपी को ही वोट दें। आप जिसे ठीक समझें उसे ही वोट दें। समाज के कार्यक्रम में कही गई इस बात के मायने बीजेपी खूब समझती है।
लोधी वोटों का बड़ा सियासी असर
लोधी समाज के मतदाता भले ही पूरे प्रदेश में नौ फीसदी के करीब हों, लेकिन उनका दबदबा कम से कम 60 से 65 सीटों पर दिखाई देता है। जहां वो खेल को उलट पलट सकते हैं।
विंध्य की कुछ सीटें और बुंदेलखंड की कई सीटों पर लोधी समाज के वोटर्स दमदार साबित होते हैं। खास बात ये है कि लोधी समाज पर अगर मप्र में कोई असर पड़ता है तो वो यूपी में भी दिखाई देता है। उमा भारती के ही एक पुराने बयान को माने तो यूपी में करीब 150 सीटों पर लोधी समाज निर्णायक भूमिका में होता है।
चुनाव तक तय होगा सियासी रुख
यही वजह है कि बीजेपी जो भी फैसला लेगी वो सोच समझकर ही लेगी। वैसे भी इस रैली का असर क्या चुनाव तक रहेगा। ये भी हो सकता है कि तमाम नाराजगी को दरकिनार कर पिछोर को लोधी समाज एकजुट हो जाए। क्योंकि जातिगत ध्रुविकरण भी चुनाव में आम बात होती है।
ऐसा हुआ तो समाज का वोट अपने समाज के जनप्रतिनिधि को ही जाएगा। एक रैली की वजह से भले ही सियासी हलचलें बढ़ गई हों। पर अभी यही कहा जा सकता है कि चुनाव तक ऊंट की करवट ये तय करेगी कि अपने बड़े बोले विधायक के लिए बीजेपी क्या फैसला लेगी।
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