जब माता-पिता लड़ते हैं, तो सिर्फ रिश्ता नहीं टूटता- बच्चे का बचपन भी टूटता है

The Sootr | Aug 24, 2026, 12:45 IST
parent conflict child mental health
माता-पिता के आपसी झगड़े और घरेलू तनाव बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करते हैं। शोध के अनुसार, इससे बच्चों में डिप्रेशन, बेचैनी और घबराहट का खतरा तेजी से बढ़ता है।

पति-पत्नी यानी माता-पिता के झगड़ों के बीच बचपन अक्सर बिखर जाता है। और फिर ऐसा बचपन पनपता है, जो कभी खिलना चाहिए था, खुशबू देना चाहिए था; लेकिन समय बीतने के साथ उसी बचपन के काँटे बड़े होकर दर्द देने लगते हैं।



दरअसल, वैज्ञानिक शोध लगातार यह दिखाते हैं कि बचपन का तनाव और माता-पिता के बीच लगातार संघर्ष बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य पर लंबे समय तक असर डाल सकता है। व्यक्ति की मानसिक संवेदनशीलता पर genes के साथ-साथ पारिवारिक वातावरण, तनाव और बचपन के अनुभवों का प्रभाव पड़ता है।



एक systematic review और meta-analysis में माता-पिता के बीच संघर्ष को बच्चों और किशोरों में depressive symptoms से महत्वपूर्ण रूप से जुड़ा पाया गया है। एक अन्य meta-analysis में parental conflict और youth anxiety के बीच भी सकारात्मक संबंध पाया गया।



और इसका कारण सिर्फ यह नहीं है कि अगर मेरे पिता को तनाव है तो मुझे भी तनाव होगा। असली कारण यह है कि तनाव हमारे संबंधों को प्रभावित करता है। और जब संबंध प्रभावित होते हैं, तो उसका सबसे गहरा असर अक्सर बच्चों पर पड़ता है।



तनाव का भविष्य पर होता है असर

जिन बच्चों के माता-पिता उनके सामने लड़ते हैं, उनमें डर, असुरक्षा, चिड़चिड़ापन, आत्मविश्वास की कमी और लगातार तनाव जैसी समस्याएँ देखने को मिल सकती हैं। यह असर उनके जीवन के दूसरे हिस्सों में भी दिखाई दे सकता है-स्कूल, कॉलेज, नौकरी और आगे चलकर उनके अपने रिश्तों और शादी में भी।



क्योंकि बच्चा सिर्फ माता-पिता की बातें नहीं सुनता, वह उनके रिश्ते को देखकर रिश्तों की भाषा सीखता है।



एक केस, जो सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है



मेरी बेटी को मानसिक तनाव है- पिता

मेरे पास एक केस था। 12-14 साल की एक लड़की के पिता का मेरे पास फोन आया। उन्होंने अपनी बेटी के बारे में बताया और कहा-“मेरी बेटी को मानसिक तनाव है। वह सिगरेट पीती है। क्या आप उसे ठीक कर सकते हैं?”



मैंने उस लड़की के साथ उसके माता-पिता को भी बुलाया। उनसे बातचीत हुई। कुछ दिनों की काउंसलिंग के बाद मुझे यह पकड़ में आया कि लड़की की समस्या से ज्यादा बड़ी समस्या उसके माँ और पिता के बीच थी।



दरअसल, माँ का भी बचपन तनाव में बीता था और फिर वही चीज उन्होंने अपनी शादी में भी देखी। पिता का भी बचपन कुछ आसान नहीं था।



तो कुल मिलाकर उनकी शादी सिर्फ दो लोगों की शादी नहीं थी, बल्कि दो तनावग्रस्त लोगों की शादी थी।



वे आपस में लड़ते-झगड़ते थे और वह भी बच्चे के सामने। जब बच्ची हुई, उसके बाद जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, तनाव बढ़ा, मानसिक थकावट और शारीरिक थकावट शुरू हुई। फिर घर में तनाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि बच्चे के सामने मरने-मारने की बातें होने लगीं। माँ ने बच्चे के सामने कई बार आत्महत्या करने की कोशिश भी की। किसी तरह चीजों को संभाला गया।



लेकिन इसका असर बच्ची पर पड़ चुका था।

वह घर में देर से आती थी-12-12, 1-1 बजे तक। या फिर दो-तीन बजे दोस्तों के साथ निकल जाती थी।



कुल मिलाकर बच्चा घर से दूर रहना चाहता था।



और जब बच्चा घर से दूर रहने लगे, माता-पिता का संरक्षण और प्यार महसूस न करे, तो फिर वह ऐसे रास्ते पर जा सकता है जो सहज नहीं होता। वह पढ़ाई से भी दूर होने लगता है।



यहाँ सिर्फ बच्ची की काउंसलिंग पर्याप्त नहीं थी। बच्ची के साथ-साथ माता-पिता की काउंसलिंग भी जरूरी थी।



लेकिन माता-पिता को लगता था कि बच्ची सुधर गई तो उनके जीवन में सब ठीक हो जाएगा।



उन्हें यह समझाना जरूरी था कि बच्ची समस्या का सिर्फ एक हिस्सा है। अगर घर का वातावरण ही तनावपूर्ण रहेगा, तो केवल बच्ची को बदलने की कोशिश समस्या का स्थायी समाधान नहीं देगी।



इसलिए माता-पिता को भी काउंसलिंग दी गई।



यह उदाहरण सिर्फ एक कहानी का नहीं है। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। यह उन बहुत से घरों की कहानी हो सकती है जहाँ माता-पिता के बीच बढ़ते तनाव की वजह से बच्चों का बचपन प्रभावित हो रहा है।



क्या है Conditioning

समस्या सिर्फ आज की नहीं, conditioning की भी है


हम सबकी conditioning बचपन से बनती है। बड़े होते-होते वही conditioning और पक्की हो जाती है।



और लोग उस पर काम करने के बजाय, उसे बदलने के बजाय दूसरों को blame करते रहते हैं।



पति, पत्नी, पिता, पड़ोसी, बच्चे, बच्चियाँ-जब हम लगातार दूसरों को blame करते हैं, तो अपने सुधार की गुंजाइश लगभग खत्म करने लगते हैं।



सुधार की पहली शर्त है-स्वीकार करना और बदलना।



माता-पिता के लिए एक बहुत बड़ा motivation यह हो सकता है कि वे खुद से पूछें-



“मैं खुद को क्यों बदलूँ?”



इसका एक उत्तर हो सकता है-



“ताकि मेरे बच्चे की परवरिश अच्छी हो पाए।”



लेकिन यह चेतना आसान नहीं होती।



फिर भी घर का कोई एक व्यक्ति अगर बदलने की कोशिश करता है, तो उसका असर परिवार के दूसरे सदस्यों पर भी पड़ता है। बदलाव अक्सर एक व्यक्ति से शुरू होकर पूरे परिवार के वातावरण को प्रभावित कर सकता है।



तो ऐसे में करें क्या?

1. बच्चों के सामने न लड़ें

सबसे पहली बात-बच्चों के सामने नहीं लड़ना है। किसी भी सूरत में।



माता-पिता के बीच संघर्ष बच्चे के लिए सिर्फ दो लोगों की लड़ाई नहीं होता। बच्चा उसमें अपनी सुरक्षा, अपना घर और अपना भविष्य भी देखता है।



शोध में interparental conflict और बच्चों में anxiety तथा depressive symptoms के बीच महत्वपूर्ण संबंध पाया गया है।



2. अगर लड़ाई हो गई है, तो उसे repair करें

मान लीजिए गुस्सा हो गया, आवाज ऊँची हो गई, बच्चे के सामने बहस हो गई।



तो कुछ समय बाद-संभव हो तो 24 से 48 घंटे के भीतर-माता-पिता दोनों को communication ठीक करना चाहिए। आपस में बातचीत करनी चाहिए और बच्चे के सामने एक-दूसरे के साथ सामान्य और अच्छा व्यवहार करना चाहिए।



बच्चे को यह message मिलना जरूरी है कि-



“मम्मी-पापा में मतभेद हो सकते हैं, लेकिन उनका रिश्ता सुरक्षित है।”



अगर शुरुआत में यह थोड़ा बनावटी ही क्यों न लगे, फिर भी बच्चे के सामने लगातार तनाव का माहौल बनाए रखने से बेहतर है कि माता-पिता अपने व्यवहार को संभालें।



और अगर गुस्सा इतना ज्यादा है कि बातचीत संभव नहीं है, तो कम से कम यह सुनिश्चित करें कि संघर्ष बच्चे के सामने न हो। जरूरत हो तो थोड़ी देर के लिए अलग हो जाएँ, बाहर चले जाएँ, लेकिन बच्चे को उस संघर्ष का दर्शक न बनाएँ।



3. बच्चे को force मत करिए

अगर माता-पिता के बीच ही झगड़े हैं और वे खुद अपने सुधार पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं, तो बच्चे को force करके सुधारने की कोशिश मत करिए।



उसे बार-बार यह मत कहिए-



“तुम गलत संगत में हो।”



“तुम देर से क्यों आती हो?”



“तुम पढ़ाई क्यों नहीं करती?”



“तुम्हें समझ क्यों नहीं आती?”



बहुत ज्यादा force करने से कई बार बच्चा समस्या से निकलने के बजाय माता-पिता से ही दूर होने लगता है।



इसके बजाय बच्चे के सामने किस्से-कहानियाँ रखिए। कोई उदाहरण दीजिए। किसी दूसरे व्यक्ति की कहानी के माध्यम से कोई बात समझाइए। कई बार बच्चा सीधे दिए गए उपदेश को reject कर देता है, लेकिन कहानी के भीतर छिपी बात उसके मन में बैठ जाती है।



4. बच्चे से पूछताछ नहीं, संवाद करिए

बच्चे से यह पूछना कि “स्कूल में क्या हुआ?”, “दोस्तों के साथ क्या हुआ?”, “कहाँ गए थे?”, “किसके साथ थे?”-यह जरूरी हो सकता है, लेकिन हर बातचीत को interrogation मत बनाइए।



उससे संवाद करिए।



प्यार से बात करिए।



सबसे बड़ी बात-उसे सुनने की कोशिश करिए।



कई बार बच्चे को सलाह नहीं चाहिए होती। उसे सिर्फ कोई ऐसा व्यक्ति चाहिए होता है जो उसकी बात बिना तुरंत judge किए सुन सके।



Parent-child communication और emotional support को Adolescentsrisk behavior के संदर्भ में protective parenting का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है।



5. बच्चे की दुनिया में शामिल हों

अगर बच्चे को कोई खेल पसंद है, उसके साथ खेलिए।



उसे कोई मनपसंद dish पसंद है, कभी उसके साथ वह बनाइए या खाइए।



उसका कोई मनपसंद काम है, उसमें उसके साथ involve होइए।



क्यों?



क्योंकि इससे आपके और बच्चे के बीच bonding बनेगी।



धीरे-धीरे संवाद बनेगा। और जब उसे यह महसूस होगा कि माता-पिता सिर्फ उसे सुधारने के लिए उसके पास नहीं आते, बल्कि उसके साथ समय बिताने और उसकी दुनिया समझने के लिए भी आते हैं, तो उसके मन की चीजें थोड़ा-थोड़ा करके बाहर निकलना शुरू होंगी।



6. बच्चे को हमेशा समझाते मत रहिए

यह बहुत महत्वपूर्ण बात है।



बच्चे को हर समय समझाना बंद करिए।



ज्यादा समझाएँगे तो बच्चा irritate होगा और आपसे दूर जाने लगेगा।



जितना हो सके, उसे सुनिए और समझिए।



फिर थोड़ा ठहरकर जवाब दीजिए।



आपका जवाब निर्देश देने वाले व्यक्ति की तरह नहीं, दोस्ताना अंदाज़ में होना चाहिए।



बच्चे को यह महसूस होना चाहिए कि-



“मेरे माता-पिता मेरे खिलाफ नहीं हैं। वे मेरे साथ हैं।”



यही भावना धीरे-धीरे trust बनाती है।



7. घर के माहौल को बदलना शुरू करिए

बच्चे को बदलने से पहले घर का माहौल बदलने की कोशिश करिए।



क्योंकि अगर बच्चा रोज घर में तनाव देख रहा है और आप उससे कह रहे हैं कि “तुम शांत रहो”, तो वह बात उसके लिए बहुत कम अर्थ रखेगी।



बच्चे को वही सबसे ज्यादा प्रभावित करता है जो वह रोज देखता है।



इसलिए माता-पिता अगर खुद अपने व्यवहार, communication और relationship पर काम करना शुरू करें, तो उसका असर बच्चे पर भी पड़ेगा।



8. जरूरत पड़े तो expert की सलाह लीजिए

और अंत में-हर चीज अपने आप ठीक हो जाएगी, ऐसा जरूरी नहीं है।



अगर घर में लगातार संघर्ष है, बच्चा घर से दूर रहना चाहता है, नशे की शुरुआत हो चुकी है, पढ़ाई और व्यवहार में बड़ा बदलाव आया है, या बच्चा लगातार तनाव में है, तो expert की सलाह लेना बेहतर है।



घर की बात को हर जगह फैलाने के बजाय किसी योग्य mental-health professional या family therapist से confidential तरीके से बात की जा सकती है।



क्योंकि हर समस्या का एक system होता है और हर system को समझे बिना सिर्फ एक व्यक्ति को बदलने की कोशिश कई बार पर्याप्त नहीं होती।



बच्चे को सुधारने से पहले घर को सुरक्षित बनाइए।



बच्चे को समझाने से पहले उसे सुनिए।



और बच्चे को बदलने से पहले खुद में बदलाव शुरू करिए।



क्योंकि बच्चे को सिर्फ अच्छी शिक्षा नहीं चाहिए।



उसे एक ऐसा घर चाहिए, जहाँ उसे यह भरोसा हो-



“मेरे माता-पिता भले ही परफेक्ट न हों, लेकिन उनके बीच जो भी हो, मैं सुरक्षित हूँ। मैं सुना जाता हूँ। मैं प्यार किया जाता हूँ। और मेरा घर मेरे लिए डर की जगह नहीं, सुरक्षा की जगह है।”



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