1991 से जारी है खोज, अबूझमाड़ की जमीन का सच अब तक अधूरा
Raipur। छत्तीसगढ़ का अबूझमाड़ सिर्फ नक्सलवाद का गढ़ नहीं रहा, बल्कि यह पिछले 35 वर्षों से भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे बड़ी अनसुलझी पहेलियों में से एक भी बना हुआ है। 1991 से सरकारें यह पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि आखिर इस विशाल अनसर्वेक्षित क्षेत्र की जमीन का वास्तविक स्वरूप क्या है। किस हिस्से को राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज किया जाए, कौनसी भूमि वन क्षेत्र मानी जाए, गांवों की वास्तविक सीमाएं कहां हैं और पारंपरिक कब्जों का स्वरूप क्या है। इन सवालों का अंतिम जवाब आज भी सरकारी फाइलों में दर्ज नहीं हो पाया है।
लगभग 6,000 वर्ग किलोमीटर में फैला अबूझमाड़ देश के सबसे बड़े अनसर्वेक्षित इलाकों में गिना जाता है। यह वह क्षेत्र है जहां दशकों तक न तो व्यवस्थित राजस्व नक्शे तैयार हो पाए और न ही अधिकांश गांवों की भूमि का वैज्ञानिक अभिलेखीकरण हो सका। यही वजह है कि आज भी यहां बड़ी संख्या में ऐसे गांव हैं जिनकी जमीन का पूरा राजस्व रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है।
1991 से शुरू हुई तलाश
अबूझमाड़ की जमीन का सच खोजने की पहली गंभीर कोशिश 1991 में हुई थी। इसके बाद 2013 और 2017 में भी सर्वेक्षण अभियान चलाए गए। लेकिन नक्सली प्रभाव, सुरक्षा चुनौती और दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण ये प्रयास आगे नहीं बढ़ सके।
2019 में भी राज्य सरकार ने आईआईटी रुड़की के सहयोग से व्यापक सर्वे की योजना बनाई, लेकिन उस समय भी हिंसा और सुरक्षा परिस्थितियों के कारण काम पूरा नहीं हो पाया। एक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी ने हाल ही में स्वीकार किया कि करोड़ों फूंकने के बाद भी 1991, 2013, 2017 और 2019 के प्रयास निर्णायक परिणाम तक नहीं पहुंच सके।
आईआईटी रुड़की की एंट्री
अबूझमाड़ में 2017 में राजस्व विभाग और आईआईटी रुड़की के सहयोग से अबूझमाड़ में पहली बार तकनीक आधारित भूसर्वे शुरू किया गया था। इससे पहले हवाई सर्वेक्षण और सेटेलाइट आधारित मैपिंग कर प्रारंभिक नक्शे तैयार किए गए थे। उन्हीं आंकड़ों के आधार पर गांवों और भूमि का जमीनी सत्यापन शुरू हुआ।
उस समय जीपीएस आधारित सर्वे, डिजिटल मैपिंग और भूमि सीमांकन की प्रक्रिया अपनाई गई थी। इसके बाद आईआईटी रुड़की ने राष्ट्रीय भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम के तहत अबूझमाड़ समेत नक्सल प्रभावित इलाकों के गांवों की केडस्ट्रल मैपिंग पर भी काम किया।
2018 में प्रकाशित रिपोर्टों में बताया गया था कि आईआईटी रुड़की की टीम सेटेलाइट तकनीक और आधुनिक भू मानचित्रण प्रणाली के जरिए उन गांवों को नक्शों पर दर्ज करने का काम कर रही थी जो दशकों से औपचारिक मानचित्रों में स्पष्ट रूप से दर्ज नहीं थे।
अब नई टेक्नोलॉजी से सर्वे
जनवरी 2026 में छत्तीसगढ़ सरकार और आईआईटी रुड़की के बीच हुए समझौते के बाद अबूझमाड़ का अब तक का सबसे बड़ा और व्यापक सर्वे शुरू हुआ है। आईआईटी रुड़की को लगभग 6 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र और सैकड़ों गांवों का डिजिटल भू मानचित्रण तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई है।
इसके लिए हाई-रिजॉल्यूशन सैटेलाइट इमेजरी, जीआईएस, जीपीएस, जियो-रेफरेंसिंग और रिमोट सेंसिंग तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। लगभग 70 सदस्यीय तकनीकी और फील्ड टीम इस कार्य में लगी हुई है। सर्वे के तहत गांवों की सीमाएं निर्धारित की जाएंगी, भूमि खंडों को खसरा नंबर दिए जाएंगे और पहली बार विस्तृत राजस्व नक्शे तैयार किए जाएंगे।
इसके बाद आपत्तियां आमंत्रित की जाएंगी, सत्यापन होगा और आखिर में रिकॉर्ड को राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया जाएगा। इस संबंध में नारायणपुर कलेक्टर नम्रता जैन ने कहा कि अबूझमाड़ के सर्वे के लिए आईआईटी रुड़की हमें टेक्निकल सपोर्ट दे रहा है
बाकि प्रशासन की पूरी टीम सर्वे कार्य को गंभीरता से ले रही है। हम अब तक 65 गांवों की सीमाएं तय कर चुके हैं। बाकि गांवों, जंगल और राजस्व जमीन के सर्वे का काम तेजी से चल रहा है। सर्वे होने के बाद स्थिति काफी स्पष्ट हो जाएगी।
पहली बार पता चलेगा अबूझमाड़ का भूगोल
अबूझमाड़ की कहानी केवल एक सर्वेक्षण की कहानी नहीं है। यह उस प्रशासनिक विफलता और चुनौती की कहानी भी है, जिसमें 35 वर्षों तक लगातार प्रयासों के बावजूद राज्य एक विशाल भूभाग का अंतिम राजस्व और भू-अभिलेखीय सच तय नहीं कर पाया। 1991 से शुरू हुई यह यात्रा अब 2026 में अपने सबसे महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंची है। मुद्दा यह नहीं है कि सर्वे शुरू हुआ या नहीं।
मुद्दा यह है कि क्या आईआईटी रुड़की और आधुनिक तकनीक वह काम कर पाएंगे जो पिछले 35 वर्षों में नहीं हो सका। यदि यह सर्वे सफल होता है, तो पहली बार अबूझमाड़ का वास्तविक भूगोल, भू-अधिकार और भूमि रिकॉर्ड सरकारी दस्तावेजों में दर्ज होगा। और यदि यह प्रयास भी अधूरा रह गया, तो अबूझमाड़ की यह पहेली आने वाले वर्षों तक फिर सरकारी फाइलों में भटकती रह सकती है।
IMP FACTS
अबूझमाड़ में भूमि सर्वे की शुरुआत 1991 में हुई।
यह सर्वे अब तक 35 साल से जारी प्रयास बना हुआ है।
पूरा क्षेत्र लगभग 6,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है।
सर्वे के प्रमुख प्रयास 1991, 2013, 2017 और 2019 में हुए।
2017 में पहली बार तकनीकी आधार पर सर्वे शुरू किया गया।
2019 में आईआईटी रुड़की के साथ सहयोग योजना बनी।
अब 2026 में डिजिटल सर्वे का सबसे बड़ा चरण शुरू हुआ है।
लगभग 70 सदस्यीय तकनीकी टीम काम कर रही है।
अब तक करीब 65 गांवों की सीमाएं तय की जा चुकी हैं।
इसमें GIS, GPS, सैटेलाइट और रिमोट सेंसिंग तकनीक का उपयोग हो रहा है।
पहली बार खसरा नंबर और पूरा राजस्व रिकॉर्ड तैयार करने की प्रक्रिया चल रही है।
FAQ
- अबूझमाड़ सर्वे कब शुरू हुआ?
इसकी शुरुआत 1991 में हुई थी ताकि इस अनसर्वेक्षित इलाके का राजस्व रिकॉर्ड तैयार किया जा सके। - यह क्षेत्र कितना बड़ा है?
अबूझमाड़ लगभग 6,000 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ एक दुर्गम और अनसर्वेक्षित इलाका है। - इसमें कौन-सी तकनीक इस्तेमाल हो रही है?
अब सर्वे में GIS, GPS और सैटेलाइट तकनीक का उपयोग किया जा रहा है ताकि सटीक डिजिटल नक्शा बन सके।
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