आदि परब में दिखी आदिवासी संस्कृति व परंपराओं की झलक, देशभर के कलाकारों ने पेश की कला

The Sootr | Mar 21, 2026, 14:30 IST
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नवा रायपुर में आयोजित 'आदि परब' ने छत्तीसगढ़ की 43 जनजातियों की समृद्ध संस्कृति, कला और पारंपरिक वेशभूषा को वैश्विक मंच प्रदान किया, जिसे गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज किया गया है।

Raipur. छत्तीसगढ़ की राजधानी के पास नवा रायपुर में आयोजित आदि परब ने इस बार जनजातीय संस्कृति की अनोखी और जीवंत तस्वीर पेश की है। 13 और 14 मार्च को आदिम जाति अनुसंधान एवं प्रशिक्षण संस्थान परिसर में हुए इस दो दिवसीय आयोजन में परंपरा, कला, पहनावा और जीवन शैली का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने हर किसी को प्रभावित किया है।



इस आयोजन में छत्तीसगढ़ की 43 जनजातियों के साथ मध्यप्रदेश, तेलंगाना, ओडिशा, महाराष्ट्र और झारखंड से आए जनजातीय कलाकारों ने भाग लिया। एक ही मंच पर इतने बड़े स्तर पर जनजातीय समुदायों की भागीदारी अपने आप में खास रही। आयोजन का उद्देश्य जनजातीय पहचान को मजबूत करना, सांस्कृतिक विरासत को सहेजना और पारंपरिक ज्ञान को आगे बढ़ाना था।



आदि परब की थीम “परंपरा से पहचान तक” रखी गई थी। इस थीम को हर गतिविधि में साफ देखा जा सकता था। कार्यक्रम में पारंपरिक वेशभूषा, लोक कला, हाट-बाजार और व्यंजनों के जरिए जनजातीय जीवन की झलक सामने आई। पहली बार ऐसा हुआ, जब 43 जनजातियों के परिधान एक साथ प्रदर्शित किए गए।



प्राकृतिक रंगों, स्थानीय संसाधनों और हाथों से बने कपड़ों से तैयार ये परिधान सिर्फ पहनावा नहीं थे, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ी जीवन शैली का संदेश दे रहे थे। यह आयोजन इस बात का उदाहरण बना कि आधुनिक समय में भी परंपराएं किस तरह जीवित हैं और अपनी पहचान बनाए हुए हैं।



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चित्रकला में दिखा जीवन दर्शन

आदि परब के तहत “आदि रंग– जनजातीय चित्रकला महोत्सव” भी आयोजित किया गया। इसमें कलाकारों ने अपनी पारंपरिक चित्रकला के जरिए जल, जंगल और जमीन से जुड़े जीवन को उकेरा। इन चित्रों में पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति के साथ संतुलन और जनजातीय जीवन दर्शन की झलक साफ दिखाई दी।



यह महोत्सव सिर्फ कला प्रदर्शन नहीं था, बल्कि एक संदेश भी था कि प्रकृति के बिना जीवन अधूरा है। चित्रकला प्रतियोगिता में 155 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। विजेता प्रतिभागियों को पुरस्कृत भी किया गया।



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हाट-बाजार में दिखा लोक जीवन

कार्यक्रम में “आदि-हाट जनजातीय शिल्प मेला” भी खास आकर्षण रहा। यहां छत्तीसगढ़ के जनजातीय हस्तशिल्प, वनोपज और पारंपरिक उत्पादों की प्रदर्शनी और बिक्री की गई। 14 समूहों ने अपने स्टॉल लगाए, जहां लोगों को हस्तशिल्प के साथ पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद भी मिला। बांस शिल्प, घरेलू उपयोग की वस्तुएं और स्थानीय खाद्य सामग्री ने लोगों का ध्यान खींचा। इस हाट-बाजार ने यह भी दिखाया कि जनजातीय समाज की कला और हुनर आज भी जीवित है और बाजार में अपनी जगह बना सकता है।



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मुख्यमंत्री ने किया समापन

आदि परब के समापन कार्यक्रम में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय शामिल हुए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार जनजातीय समाज के विकास और उनके भविष्य को बेहतर बनाने के लिए लगातार काम कर रही है। उन्होंने कहा कि बस्तर क्षेत्र में अब हालात तेजी से बदल रहे हैं और शांति तथा विकास का माहौल बन रहा है।



उन्होंने विश्वास जताया कि आने वाले समय में प्रदेश नक्सलवाद से मुक्त होकर आगे बढ़ेगा, जिससे जनजातीय समाज में खुशहाली आएगी। मुख्यमंत्री ने इस आयोजन को छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता का प्रतीक बताया और आयोजन से जुड़े सभी लोगों को बधाई दी।



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100 सीटर छात्रावास का लोकार्पण

इस आयोजन को एक और खास पहचान मिली, जब “आदि परब” की चित्रकला और परिधान को ‘गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड’ से सम्मानित किया गया। यह उपलब्धि छत्तीसगढ़ की जनजातीय संस्कृति को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाली है।



इस मौके पर मुख्यमंत्री साय ने टीआरटीआई परिसर में 5 करोड़ रुपए की लागत से बने 100 सीटर छात्रावास का लोकार्पण भी किया। इसका उद्देश्य जनजातीय युवाओं को बेहतर शिक्षा और शोध के अवसर देना है।



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संग्रहालयों में सजी विरासत

कार्यक्रम के दौरान यहां मौजूद संग्रहालयों की भी चर्चा रही। एक संग्रहालय शहीद वीर नारायण सिंह की जीवनगाथा को समर्पित है, जबकि दूसरा जनजातीय जीवन के विभिन्न पहलुओं को दर्शाता है।



इन संग्रहालयों में जन्म, विवाह और मृत्यु से जुड़े संस्कारों के साथ पारंपरिक परिधान और रीति-रिवाजों को विस्तार से दिखाया गया है। यह प्रयास नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने में मददगार साबित हो रहा है।



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योजनाओं से जुड़ता जनजातीय समाज

मुख्यमंत्री साय ने कहा कि राज्य में जनजातीय समाज के विकास के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के तहत हजारों बसाहटों का विकास किया जा रहा है।



पीएम जनमन योजना के जरिए विशेष पिछड़ी जनजातियों तक सड़क, आवास और बुनियादी सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं। वहीं नियद नेल्लानार योजना के माध्यम से नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बुनियादी सेवाएं पहुंच रही हैं।


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